बोध कथा हिंदी : hindi storie with moral

कई साल पूर्वकी घटना है। मथुरामें होम साहब कलक्टर थे। उनकी मेम मर चुकी थी। केवल पाँच सालका एक लड़का था जेम्स। जब साहबका अन्तकाल आया, तब उन्होंने अपने परम मित्र पं० कमलकिशोर शास्त्री को बुलाया और अपने लड़केका हाथ उनको पकड़ाकर कहा–’डियर शास्त्री ! अब मैं रामके दरबार में जा रहा हूँ। मेरे पास केवल ३ लाख रुपये हैं, सो यह लो। इस लड़के को अपना ही लड़का मानकर खूब पढ़ाना। आई० सी० एस० की परीक्षा जरूर पास करा देना। यही मेरी वसीयत है और यही आपसे अनुरोध है।’

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शास्त्रीजी का मकान देहात में था। आपको जमींदारी से तीस हजार सालाना का मुनाफा था। आपने जेम्स को अपना ही लड़का माना। दैवयोग से शास्त्रीजी का घर संतानहीन था। आपने जेम्सका हिंदू नाम रखा–ललित किशोर पण्डित ! ललित को तीन मास्टर घर पर पढ़ाने लगे। संस्कृत, हिंदी, उर्दू तथा अँग्रेजीकी शिक्षा चालू हो गयी। जेम्स कभी कुर्ता-धोती पहनता तो कभी कमीज-पेंट धारण करता। वह साफ हिंदी बोलने लगा और हिंदू लड़कों के साथ आँख मिचौनी खेलने लगा। वह ललित कहनेपर भी बोलता और जेम्स पुकारने पर भी। उसके दो नाम पड़ गये। वह पण्डितजी को ‘पिताजी’ और पण्डितानीजी को ‘अम्मा’ कहता था। जब ललित ने इन्टेंस पास किया तब पण्डितजी का अन्त समय निकट आ गया। उन्होंने अपनी स्त्री से कहा-‘लो भाई! मैं तो चला ! जयरामजीकी। रोना-धोना मत। ललित को आई० सी० एस० जरूर पास करा देना। उसे विलायत भेज देना। वहाँ वह बी० ए० करके आई० सी० ए० पढ़ेगा। मेरे मित्र होम साहबकी इच्छा जरूर पूरी करना। फिर चाहे सारी जमींदारी क्यों न बिक जाय! उसे अपना ही पुत्र समझते रहना और जेम्स के नाम जो ३ लाख रुपये बैंक में जमा हैं, उन्हें मत छूना।’

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जेम्स विलायत गया। वहाँ वह पाँच सालतक पढ़ता रहा। पहले ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालयसे बी० ए० पास किया, फिर आई० सी० एस० की परीक्षा पास की। उसकी धर्ममाता हजारों रुपये खर्च बराबर भेजती रही। वह उसे पुत्र मानती रही। पुत्रने ५०० रु० मँगाये तो माताने ७०० रु० भेज दिये। मेरा लड़का परदेश में तकलीफ न उठाये। इधर गुमास्ता लोगों ने मुनाफे के रुपयों को अपना ही मुनाफा समझा। कुछ दिया, कुछ का खर्च बता दिया। बाकी का बाकी में डाल दिया–छुट्टी हुई। गाँव में तीन जमींदार और भी थे-मिश्रजी, दूबेजी और लालाजी। उन्होंने पाँच साल में सारी जमींदारी कर्ज दे-देकर रेहन करा ली। बदमाशों ने दो तीन बार चोरी का बहाना कर शास्त्रीजी के मकानका सारा सामान अपने-अपने घरों में मँगवा लिया। बचा केवल मकान और बुढ़िया! उसी समय मि० जेम्स साहब कलक्टर होकर मथुरा
आये। आठ दिन मथुरा रहकर दौरे का हुक्म कर दिया। सबसे पहले आप हरीपुर जा पहुँचे, जहाँ वे ललित बनकर शिशु काल की ललित क्रीडाएँ कर चुके थे। गाँव के बाहर एक बाग में पड़ाव डाला गया। सुबह के समय, धोती-कुरता पहन, छड़ी हाथ में लेकर आप अपनी ‘अम्मा’ के दर्शन करने चले। मकान के भीतर जाकर पुकारा–‘अम्मा!’
‘ललित ! तू आ गया?’-कहती हुई वृद्धा बाहर आयी। माताने लड़के को हृदयसे लगा लिया, प्रेमाश्रु की वर्षा होने लगी। माता और पुत्र दोनों रो रहे थे। पाँच साल बाद मिलना हुआ था।

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माता—बेटा! तूने आई० सी० ए० की परीक्षा पास कर ली?
जेम्स–हाँ माताजी! आपकी कृपासे।
माता-आज मैं तुमसे ‘उरिन’ हो गयी! तेरे पिताजी मरते समय कह गये थे कि ललित को विलायत पास करा देना, फिर चाहे जायदाद रहे या न रहे।
माता बैठ गयी और जेम्स उसकी गोदमें सिर रखकर जमीनपर लेट गया। माता उसके सिरपर हाथ फेरती हुई बोली-‘तूने तो पत्रमें लिखा था कि मैंने यहाँ अपना विवाह भी कर लिया है। सो बहू कहाँ है?’
ललित-बहू है बँगले पर। उसने आपको बुलाया है। अब आजसे आपका निवास मथुरा में ही मेरे पास रहेगा। यमुनाजी का रोजाना स्नान कीजिये और द्वारकाधीश के दर्शन कीजिये।
माता—अच्छा बेटा ! बहू यह तो नहीं कहेगी कि मेरा पति अंग्रेज है, फिर उसकी माता हिंदू कैसे हुई ?
ललित–नहीं अम्मा ! मैंने सब हाल समझा दिया है। वह आपकी खूब सेवा करेगी।
माता-तुझे तो भूख लगी होगी?
ललित–हाँ अम्मा! बड़ी भूख लगी है। आपके हाथकी रोटी पाँच साल से नहीं खायी। जब मैं खाना खाने बैठता था, तब आपकी याद आती थी।
माता-तुझे कढ़ी और भात बहुत पसंद था, वही बनाऊँ?
ललित–हाँ, हाँ, हाँ! वही कढ़ी और भात ! |
वृद्धाने एक हाँडी उठायी और मट्ठा लानेके लिये वह पड़ोसी के घर चली गयी। इधर मौका पाकर साहब उठा और उसने सारा मकान देख डाला। कहीं कुछ नहीं रहा। सब सामान यार लोग खिसका ले गये थे। तलवारें, कुर्सियाँ, कपड़े, पलंग कुछ भी न छोड़ा। बदमाशोंने चौका लगा दिया था। साहब को बड़ा सदमा पहुँचा।

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‘पाँच साल बाद आज तृप्ति हुई’ कहकर जेम्स ने भोजन समाप्त किया। फिर बातचीत हुई
जेम्स- माताजी ! जमींदारी तो कायम है?
माता-नहीं बेटा ! कर्ज में सब चली गयी।
जेम्स-कर्ज क्यों लिया गया?
माता-न लेती तो तुझे क्या भेजती ?
जेम्स -और मुनाफा?
माता–कारिंदोंने कहा कि अकाल पड़ गया है। आमदनी वसूल नहीं होती।
जेम्स-आई सी ! अच्छा, घरका सामान कहाँ गया?
माता–तीन बार चोरी हुई थी बेटा !
जेम्स–मेरी वजहसे आप सब तरह बरबाद हो गयी हैं। मेरे कारण आप राजासे फकीर हो गयीं। धिक्कार है मुझे !
माता—नहीं बेटा! मैंने अपने पतिकी इच्छा, तेरे पिताकी इच्छा और तेरी इच्छा को पूरा किया है। मैं आज तुझे देखकर बहुत सुखी हैं। जायदाद का क्या होता ? सारी रियासत बेचकर मैंने तुझको खरीदा है। तू ही मेरी जायदाद है। मुझे अब क्या चाहिये, दो मुट्ठी चावल! सो तू देगा ही। अगर न देगा तो चाहे जिस सदाव्रतसे माँग लाया करूंगी।
जेम्स–राम, राम, यह क्या कहती हो अम्मा !

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पण्डितानीजी को साथ लेकर जेम्स मथुरा चला गया। बँगले में एक खास कमरा सजाकर माताजी के लिये रिजर्व कर दिया गया।
एक नौकरानी और एक नौकर सेवा के लिये कायम किये गये। माताजी की रसोई में जेम्स भी शामिल था। मेम साहब का खाना खानसामाँ बनाता था। मेम साहब ने माताजी को बड़ी ही सुशीलता से माना। सब लोग आनन्दसे रहने लगे।
इसके बाद कलक्टर साहबने दफा ४२० के वारंट जारी किये। हरीपुरके तीनों जमींदार और पाँचों बदमाश तथा सब कारिंदे गिरफ्तार कर लिये गये। एक महीने तक सबको चुपचाप हिरासत में रखा; ताकि कलक्टर की साध्वी माता को ठगनेका मजा मिल जाय। एक दिन जमींदारों ने साहबके पास संदेश भेजा-‘अगर हुजूर चाहें तो हमलोगों का असली रुपया दे दें, ब्याज न दें और सब जमींदारी वापस ले लें। अगर असल रुपया भी न देना चाहें और जमींदारी लेना चाहें तो वह भी मंजूर है। मगर इस ‘बेमियादी बुखार’ से छुटकारा दीजिये।’
उन बदमाशों ने अर्ज किया—“आपके मकान का सामान केवल इसलिये उठा लिया गया था कि वह नष्ट न हो जाय और जब सरकार आयें तब सौंप दिया जाय ! हुक्म दीजिये, सब सामान उसी मकानमें जैसा-का-तैसा सजा दिया जाय! हमलोग आपके पिता शास्त्रीजी के शुभचिन्तक मित्र हैं। लिहाजा चोरी से बचाने के लिये ही ऐसी हरकत की गयी थी। तोबा करते हैं, माफी दीजिये।’
कारिंदोंने कहा-‘जरूर ही पैदावार उन सालों में अच्छी न हुई थी। मगर इस साल पैदावार खूब अच्छी है। उम्मीद है कि बकाया रुपया सब वसूल हो जायगा। एक सालकी मियाद दी जाय ताकि हमलोग अपना-अपना हिसाब चुका सकें।
साहबने सबको छोड़ दिया। रुपया सैकड़ा के सरकारी सूद के हिसाबसे साहबने सब कर्जदारों को चुका दिया।
सारी जमींदारी वापस लेकर साहबने वह सब पण्डितानीजी के नाम करा दी। बदमाशोंने सारा सामान वापस कर दिया। कारिंदोंने सारा गबन धीरे-धीरे जमा कर दिया।
इस कहानी से यह शिक्षा मिली कि ‘मानवताके सामने जातीयता तुच्छ है।’

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