प्राचीन काल में लोक-जीवन वनस्पतिमय था। उस समय मनुष्य के योग क्षेम में वनस्पतियों का महत्त्वपूर्ण स्थान था। यही कारण है कि वैदिक वाङ्मय में औषधि-वनस्पतियों की स्तुति में अनेक मन्त्र उपलब्ध होते हैं। ऋग्वेद का ओषधि-सूक्त तो अति प्रसिद्ध है ही, अथर्ववेद में भी कई स्थलों पर महर्षियों द्वारा वनस्पतियों की स्तुतियाँ की गयी हैं, इसके साथ ही उपनिषदों में भी वनस्पतियों के महत्त्व का वर्णन मिलता है।

मानव ने प्रकृति के साहचर्य से वनस्पतियों का ज्ञान प्राप्त किया और जैसे-जैसे उसकी आवश्यकताएँ बढ़ती गयीं, वैसे-वैसे वनस्पतियों के प्रयोग का क्षेत्र भी बढ़ता गया। वन्य-क्षेत्रों में तो वनस्पतियों का बाहुल्य था ही, ग्रामीण-क्षेत्रों में भी इनकी विशेष प्रतिष्ठा रही। तब अपनी दैनन्दिन आवश्यकताओं की पूर्ति इन्हीं से होती रही। दन्तधावन से लेकर आहार तक तथा शय्या से लेकर वाहनादि जीवन के सभी क्षेत्रों में वनस्पति का प्रयोग होता रहा। स्नान, अनुलेपन, अङ्गराग आदि | प्रसाधनों में भी इनका उपयोग होता था। आहार एवं अन्य लौकिक उपयोग के अतिरिक्त वनस्पतियों का | औषध रूप में प्रयोग भी महत्त्वपूर्ण था।

पृथ्वी पर प्राणियों की उत्पत्ति के साथ ही रोगों का भी प्रादुर्भाव हुआ और तभी से इनके निराकरण के लिये ओषधियों का प्रयोग भी प्रारम्भ हुआ। आयुर्वेद शास्त्र में इन विषयों को बड़े ही सुव्यवस्थित ढंग से प्रतिपादित किया गया है। आयुर्वेद शास्त्र के अन्तर्गत स्थावर-जङ्गम, पर्वतीय, खनिज, वानस्पतिक एवं सामुद्रिक ऐसा कोई भी पदार्थ नहीं है, जिसकी चर्चा औषधीय प्रयोग के रूप में की गयी हो। वनस्पतियों के विषय में एक मन्त्र अथर्ववेद में प्राप्त होता है, जिसका अर्थ है-
‘वनस्पतियों का पिता आकाश, माता पृथिवी है तथा इसके मूल समुद्र में हैं’

यासां द्यौष्पिता पृथिवी माता समुद्रो मूलं वीरुधां बभूव॥ (८।७। २)
तात्पर्य है कि ऊपर की ओर फैलने वाले, पृथ्वी पर फैलने वाले तथा समुद्र में पाये जानेवाले सभी प्रकार के वनस्पतियों का संकेत मिलता है। हमारे महर्षियों, विद्वानों तथा आचार्यों ने प्राचीन काल से ही अपने अपने ढंग से आयुर्वेदीय विषयों का वर्णन करके लोकहितार्थ बहुत ही उपयोगी जानकारियों का संग्रह किया है। इसके पीछे उनकी भावना इस प्रकार थी-
कामये दुःखतप्तानां प्राणिनामार्तिनाशनम्।
अर्थात् मेरी यही अभिलाषा है कि दुःखों से संतप्त प्राणियों का दुःख दूर हो।

आयुर्वेदशास्त्र अत्यन्त प्राचीन शास्त्र है। युगों से चली आ रही इस विद्याने भारतीय जनमानस में अच्छी पैठ बना ली है। यद्यपि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के प्रचार-प्रसार से आयुर्वेद-विद्या के अध्ययन-अध्यापन में कुछ रुझान कम हुआ है तथापि वनस्पतियों द्वारा निरापद उपचार के प्रति लोगों की आस्था कम नहीं हुई अपितु बढ़ती ही जा रही है। इस दिशा में सहज सुलभ घरेलू उपचारने लोगों का बड़ा ही उपकार किया है। उनके द्वारा छोटी-मोटी बीमारियों का उपचार स्वतः कर लिया जाता है। जिस प्रकार मौसम की जानकारी के लिये कवि ‘घाघ’ के दोहे अचूक माने जाते हैं, उसी प्रकार परम्परागत रूप से प्रचलित कहावतों में आबद्ध घरेलू नुस्खे भी रोगोपचार के लिये अचूक होते हैं।

बड़ी-बड़ी यान्त्रिक सुविधाओं से सम्पन्न मौसम-विभाग की सूचना भी कभी-कभी गलत हो जाती है। किंतु वर्षों पूर्व रचे घाघ के दोहे आज भी खरे उतरते हैं, इसी प्रकार सुविधापूर्वक उपलब्ध वनस्पतियों एवं गृहसुलभ पदार्थो द्वारा किया गया उपचार भी सर्वदा लाभकारी एवं निरापद सिद्ध होता आया है। यहाँ बुजुर्गों से प्राप्त-ऐसे ही कतिपय दोहों (कहावतों) का संकलन लोकहितार्थ दिया जा रहा है|

दोहों में आयुर्वेदिक नुस्खे :

कब्ज़ दूर करनेके लिये –

‘सर्वेषामेव रोगाणां निदानं कुपिता मलाः’।
अर्थात् सभी रोगोंकी जड़ मलों का कुपित होने से पेट में कब्ज़ का होना है। जब से भारत में मशीन का पीसा आटा एवं नाश्ते में ब्रेड आदि खाने का प्रचलन हुआ है,तबसे यहाँ अधिकांश लोगों के पेट में कब्ज की शिकायत रहने लगी है। कब्ज़ दूर करने के उपायों में कहा गया है
१. हर्र बहेड़ा आँवला भाग एक, दो, चार।
तीनों औषधि लीजिये, त्रिफला कहे बिचार॥

२. प्याला एक गरम पानी में, नीबू लेय निचोड़।
पीओ नित्य कुछ दिन तो कब्ज दूर हो जाय॥

३. सनाय सौंफ मुनक्का, दस-दस ग्राम मिलाय।
गोंद बबूल संग पीसकर लीजे चूर्ण बनाय॥
प्रतिदिन रात्रि के समय दूध साथ पी जाय।
कब्ज पुराना दूर हो उदर विकार मिटाय॥

पेट-दर्द दूर करनेके लिये –

१. गुड़ तोला प्राचीन ले, चूना माशा चार।
दोऊ मिलाकर खाइये देवे दर्द मिटाय॥

२. दो माशा काला नमक, दूनी सोंठ मिलाय।
हरै चौगुनी डालकर लीजै चूर्ण बनाय॥
पानी में खौलाइये, छानो वस्त्र धुलाय।
तीन बार के पियत ही पेट दर्द मिट जाय॥

भूख बढ़ाने एवं मन्दाग्नि दूर करने के लिये –

१. त्रिफला काला नमक को पानी साथ सनाय।
सबहिं बराबर मापकर नीबू रस मिलवाय॥
झरबेरी सी गोलियाँ घोंट पीस बनवाय।
दो गोली सेवन करे भूख बहुत बढ़ जाय॥

कृमि दूर करने के लिये-

बच्चों के पेट में प्रायः कृमि की शिकायत रहती है। कृमि दूर करने के लिये यह सरल उपाय है
१. आधा तोला वजन भर वायविडंग पिसाय।
रत्तीभर शहद संग लीजै, कीट नशाय॥

२. पत्ती पीसे नीम की लीजै रस निकाल।
आधा तोला पीजिये पेट कीट मिट जाय॥

दाँत स्वस्थ रखने के लिये-

हमारे शरीर में यों तो सभी अङ्गों का अपना-अपना महत्त्व है, किंतु दाँतों का कुछ विशेष ही महत्त्व है। स्वस्थ और सुन्दर दाँत मनुष्य के व्यक्तित्व को सर्वप्रथम प्रभावित करने के साथ-साथ भोजन में स्वाद भी प्रदान करते हैं। निम्नलिखित कहावतों में देखें कि दाँतों को कैसे स्वस्थ रखा जा सकता है

१. चाहो जीवन भर रहे अमर दाँत बत्तीस।
लघुशंका और शौच में बैठा दंती पीस॥

२. त्रिफला, त्रिकूटा तूतिया नमक मिलाये पंच।
दांत वज्र सम होत है माजू फल के संग॥
पुनि छिलका बादाम का दीजै खूब जलाय।
पिपरमिंट कर्पूर संग मंजन लेव बनाय॥

दाँतों के मैल हटाने एवं दाँतोंके कीड़े भगानेके लिये-

१. नमक महीन मिलाइये अरु सरसों का तेल।
नित्य मलें कीड़ा हरै छूट जात सब मैल॥

२. नीम दतूनी जो करै भूनी अन्न चबाय।
दूरबयारी नित करै तिन घर वैद्य न जाय॥

३. लटजीरा दातून जो करे प्रतिदिन जड़ मँगवाय।
वासिद्ध नर होत है स्मरण शक्ति बढ़ जाय॥

मसूढ़ों से खून एवं पायरिया को दूर करनेके लिये-

१. गीली छाल बबूल की लीजे छाँह सुखाय।
दस इलायची डाल के काला नमक पिसाय॥
नीबू रस सो कीजिये, मंजन बारम्बार।
दर्द मसूढ़ों का मिटेनासे दंत विकार॥

३. जो दातून बबूल की नित्य करे मन लाय।
टीस मिटै मजबूत हों पायरिया मिट जाय॥

नेत्ररोगों का उपचार-

१. कालीमिर्च को पीसकर घी बूरा संग खाय।
नेत्ररोग सब दूर हों गिद्ध दृष्टि हो जाय॥

२. मिट्टी के नव पात्र में, त्रिफला रात्रि में डाल।
रोज सबेरे धोय के नेत्र रोग को टाल॥

आँखों की ज्योति बढ़ाने के लिये –

अञ्जनताम्र के एक पात्र में घमिरा रसको निचोय।
रूई साफ भिगोय कर लीजे छाँह सुखाय॥
सरसों तेल मिलाय के आग में देहु जलाय।
ढकिये थाली फूल की काजल लेहु बनाय॥
कालिख सरसों तेल में घिसै उँगली डार।
ऐसे सरल उपाय सो काजल करो तैयार॥
रतौंधी धुंधी खुजली या नेत्र लाल पड़ जाय।
बढ़ रोशनी आँख की सारे रोग नसाय॥

आँखों की लाली, रतौंधी तथा फूलीका उपचार-

आँख कान के मध्य में चूना लेप लगाय।
आई आँख अच्छी करे और ललाई जाय॥

२. भुनी (लावा) फिटकरी लीजिये जल गुलाब में घोल।
आँखों की जलन मिटै ये वैद्यनके बोल॥

३. केशर शहद मिलाय के नेत्रन माहि लगाय।
लाली और गरमी मिटै रोग रतौंधी जाय॥

४. बरगद के दूध में घिस, कपूर लगाओ नैन।
फूली मिटे छोटी बड़ी, और पाओ सुख चैन।

५. शुद्ध शहद में लीजिये, सेंधा नमक मिलाय।
थोड़े दिन ही लगाइये, फूली देय मिटाय॥

खाँसी की दवा-

गाँवों में यह कहावत प्रचलित है-हँसी लड़ाई का घर है और खाँसी सब रोगोंकी जड़ है। अतः खाँसी होने पर अविलम्ब उपचार करना चाहिये। देखिये, खाँसी के उपचार के लिये बुजुर्गों ने कहावतों में क्या कहा है

१. कालीमिर्च महीन पिसावे, आकपुष्प और शहद मिलावे।
भोजन से पहले जो खावे, सूखी खाँसी तुरत मिटावे॥

२. रत्ती एक वंशलोचन को, सुबह लेव पिसवाय।
शुद्ध शहद के संग चाटिये, खाँसी देय मिटाय॥

कर्ण एवं नासिका के रोगोंका निदान–

पञ्च – ज्ञानेन्द्रियों में कान, नाक तथा आँख का विशेष महत्त्व है। ये अतिसंवेदनशील अङ्ग माने गये हैं। कान-नाक के रोगों से मुक्ति पाने के लिये अनेक कहावतें प्रचलित हैं

१. पीली पात मदार में घृत को देव लगाय।
गरम-गरम रस डालिये, कर्ण रोग मिट जाय॥

२. रस सुदर्शन पात का गरम, कान में डाल।
फोड़ा-फुसी आदि सब मिटे दर्द तत्काल॥

कहा जाता है-‘यदि सौ वर्ष श्रवण-शक्ति बनाये रखना हो तो सरसों का तेल कानों में डालना चाहिये।

१. सूखा फल ले बेल का, खूब महीन पिसाय।
गऊ मूत्र में सानकर हलुआ समान बनाय॥
सरसों तेल मिलाय के लीजै खूब मिलाय।
छान के डालो कान में श्रवणशक्ति बढ़ जाय॥

नाक के रोगों की दवा –

कडुआ तेल नित नाक लगावे।
ताको नाक रोग मिट जावे॥

चर्मरोग-

दाद, खाज, खुजली, फोड़े-फुसियों के लिये कहावतों में बड़े सरल तथा लाभकारी नुस्खे प्राप्त होते हैं

१. जो ताम्र के पात्रमें पिये रोज जल छान।
चर्म रोग सब दूर हो, मनुष्य होय बलवान॥

२. आक बीज पमार के नौसादर अरु खैर।
शोरा गन्धक डाल के करते दाद से बैर॥

३. अरहर दाल जलाय के दधि में देव मिलाय।
पकी खाज पर लेपिये देवे रोग मिटाय॥

४. नीम की पत्ती तोड़कर शहद संग पिसाय।
फोड़ा ऊपर बाँध दे मवको देत बहाय॥

५. चन्दन की तरह घिसें पकी नीम की छाल।
फुसी ऊपर लगाय दें ठीक करे तत्काल॥

दस्त, आँव, पेचिश, बवासीर, उलटी, अनिद्रा आदि रोगों के लिये घरेलू उपाय-

१. हरी दूब को कुचल के रस लीजै निकाल।
आधा तोला पीजिये, आँव दस्त रुकै तत्काल॥

२. जामुन-गुठली पीसकर थोड़ा नमक मिलाय।
पानी के संग पीजिये, खूनी दस्त मिटाय॥

३. इमली पत्ती पीसकर लीजै नमक मिलाय।
मट्ठा के संग पीजिये, पेचिश देय मिटाय॥

४. बिल्वपत्र को पीसकर थोड़ा नमक मिलाय।
दही साथ सेवन करे पेचिश देत मिटाय॥

५. छोटी इलायची पीसकर नीबू रस में मिलाय।
दो-दो घंटेमें पीजिये उल्टी तुरंत बंद हो जाय॥

६. पीपल की दस पत्ती को करेला संग पिसाय।
छान के रस हफ्ता पियें बवासीर मिट जाय॥

अनिद्रा के लिये-

१. गुड़ के संग मिलाय के पीपर मूल जो खाय।
कहे घाघजी जानिये, गहरी निद्रा आय॥

वात व्याधि के लिये-

सोंठ सुहागा सोंचर गांधी, सहिजन के रस बरिया बाँधी।
सत्तर शूल बहत्तर बाई बात मातसे तुरत नशाई॥

नोट :- ऊपर बताये गए उपाय और नुस्खे आपकी जानकारी के लिए है। कोई भी उपाय और दवा प्रयोग करने से पहले आयुर्वेदिक चिकित्सक की सलाह जरुर ले और उपचार का तरीका विस्तार में जाने।