मनुष्य अपना भोजन नहीं बनाते :

इस पृथ्वी पर ईश्वर या प्रकृति के बाद कोई श्रेष्ठ रचना है तो वह है – मनुष्य। उसने अपना बहुत बड़ा भौतिक संसार बनाया है। वह फसलें पैदा करता है। और अपने खाने योग्य पदार्थ आदि बड़ी मात्रा में उत्पन्न करता है। फिर भी कहा जाता है कि मनुष्य अपना भोजन स्वयं नहीं बनाते।
यह सच भी है। मनुष्य का भोजन वनस्पति-जगत तैयार करता है। वह उसे ‘पकाकर खाता है।
मनुष्य तो क्या यदि हम कहें कि प्राणियों में पशु-पक्षी आदि भी अपना भोजन स्वयं नहीं बनाते तो यह अत्युक्ति नहीं होगी।
सभी जीव-जंतु तथा प्राणी अपना भोजन वनस्पति-जगत से प्राप्त करते हैं और जीवित रहने के लिए किसी न किसी प्रकार से वनस्पति-जगत पर ही आश्रित रहते हैं।
कुछ प्राणी ऐसे हैं जो जब भी खाते हैं, मांस ही खाते हैं। इन्हें शुद्ध मांसाहारी प्राणी कहा जाता है। इनमें सिंह और अन्य हिंसक जीव–बाघ, तेंदुआ, सफेद शेर आदि प्राणी शामिल हैं। अनेक कीट-भक्षी प्राणी भी मांस पर ही जीवित रहते हैं। ये जिन प्राणियों को खाते हैं, वे प्राणी शाकाहारी होते हैं। शाकाहार से उनके शरीर में मांस बनता है और मांसाहारी उसे खाते हैं। इस प्रकार मांसाहारियों के शरीर में भी ‘मांस’ अंततः ‘शाकाहार’ से ही बनता है।
इसीलिए यह माना जाता है कि चाहे कोई शाकाहारी हो या मांसाहारी वह अंततः ‘शाकाहार’ पर ही आश्रित होता है। इस प्रकार सभी जीवधारी अंततः वनस्पति-जगत पर ही आश्रित रहते हैं।

हर प्राणी के मांस का विश्लेषण करने पर आपको यही परिणाम मिलेगा कि प्रारंभ में वह घास-पात ही था। इस संसार में जीव ही जीव का भोजन है। छोटे-छोटे कीट पौधों का रस पीते हैं और जीवित रहते हैं; मेढक आदि उनको खा जाते हैं; मेढकों को साँप खा जाते हैं; साँपों को गरुड़ आदि पक्षी खा जाते हैं; और यह क्रम चलता ही रहता है। जीव, जीव का भोजन बनते रहते हैं। अंततः हर जीव अपने शरीर में मांस बनाता है और यह मांस किसी न किसी प्रकार से घास-पात वनस्पति-जगत का अंग या अंश ही होता है।
जिस दिन पृथ्वी पर से वनस्पति, पेड़-पौधे आदि समाप्त हो जाएँगे उस दिन ‘जीव-जगत’ भी समाप्त हो जाएगा।
इस वनस्पति-जगत की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ये न केवल स्वयं अपने लिए भोजन बनाते हैं और जीवित रहते हैं, वरन् दूसरों के लिए भी भोजन बनाते हैं; एक तरह से उनका पालन-पोषण करते हैं और उन्हें भी जीवित रखते हैं।सारी सृष्टि वनस्पति-जगत की किसी न किसी प्रकार से ऋणी अवश्य होती है। इस अर्थ में वनस्पति-जगत संसार की सबसे श्रेष्ठ रचना कही जा सकती हैं।

शाकाहारी घास-पात खाते हैं :

आपको यह जानकर बिलकुल आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि शाकाहारी घास-पात ही खाते हैं। शाकाहारी गेहूँ, जौ, जई तथा मक्का आदि का उपयोग अधिक करते हैं। ये भोजन के अनिवार्य खाद्य पदार्थ हैं।
ये सब घास-पात की श्रेणी के पौधे खेतों में हम जो अनाज बोते हैं उसे नुकसान पहुँचानेवाले हलके किस्म के पादपों को हम साधारण भाषा में घास-पात कहते हैं। ये हमारे द्वारा बोए जानेवाले अन्न का अधिकांश खाद, बीज, पानी आदि अपने काम में ले लेते हैं तथा हमारे द्वारा खाद्य पदार्थ देनेवाली फसलों को तरह-तरह से नुकसान पहुँचाते हैं। इसलिए हम इन्हें घास-पात की संज्ञा देते हैं। किसान इन्हें ‘खरपतवार’ कहते हैं। इसे खेतों से निकालने की क्रिया को ‘निंदाई-गुड़ाई’ कहते हैं।
इस घास-पात में कुछ घास-पात जहरीले किस्म के भी होते हैं। परंतु सभी प्रकार के घास-पात हमें एक लाभ पहुँचाते हैं – और वह है – ये ढालू जमीन में मिट्टी को कटने से रोकते हैं। अतः ये भूमि-कटाव को रोकने में हमारी सहायता करते हैं।
इस प्रकार अनुपयोगी कहे जानेवाले घास-पात भी हमें कुछ न कुछ लाभ अवश्य पहुँचाते हैं।
इस घास-पात से पूरा संसार भरा हुआ है। हमें चारों तरफ जमीन से लगी हुई जो हरियाली दिखाई देती है वह इसी घास-पात के कारण होती है।
गन्ना और बाँस भी एक प्रकार की घास ही हैं। परंतु ये डंठलधारी या गाँठधारी घास होती हैं। खस भी एक प्रकार की घास ही है जो गरमी के दिनों में हमें ठंडक देती है। इन सबमें गेहूँ, मक्का, जौ और जई से अधिक उपयोगी और कोई घास नहीं होती। ये सब हमारे भोजन के अंग हैं।

आज भी हम कंद-मूल-फल खाते हैं :

पौधे चीनी से स्टार्च या माँड बनाते हैं। यह अतिरिक्त स्टार्च उनकी जड़ों में इकट्ठा होता रहता है। इसी से चिकनाई तथा पेड़-पौधों के अन्य खाद्य पदार्थ भी बनते हैं। पेड़-पौधे अपना खाद्य पदार्थ जिस तेजी से बनाते हैं उसका वे उस तेजी से उपयोग नहीं कर पाते । वह उनकी जड़ों, डंठलों, बीजों और पत्तियों में जमा होता रहता है।
हम लोग बहुत बड़ी मात्रा में पौधों द्वारा इस प्रकार से जड़ों में जमा किया गया खाद्य पदार्थ या खाद्य भंडार खाते हैं।
आइए, यह भी जान लें कि उन वस्तुओं या पदार्थों के नाम क्या हैं? ये हैं। गाजर, मूली, कंद, अरबी, आलू, अदरक, शकरकंद, हलदी आदि ।

पौधों से हरा-भरा है यह संसार :

कहते हैं, सावन के अंधे को चारों ओर हरा-भरा ही दिखाई देता है, परंतु वास्तविकता तो यह है कि आदमी किसी भी ऋतु में अंधा हो, उसे चारों और हरा-भरा ही दिखाई देगा।
यह संसार हरीतिमा या हरे रंग से भरा हुआ है। जिस प्रकार आकाश नीले रंग से भरा हुआ है और उसका यह रंग समुद्रों तक में प्रतिबिंबित होता है, उसी प्रकार यह पृथ्वी हरे रंग से भरी हुई है और इसमें सर्वत्र हरे रंग की ही प्रधानता है।

पौधे अपना भोजन स्वयं बनाते हैं और यह रासायनिक कारखाना उनके अंगों में छिपा होता है। ये पौधे धरती में से पानी और हवा में से कार्बन डाइऑक्साइड ग्रहण करते हैं। फिर ये सूर्य से शक्ति प्राप्त कर अपने अनोखे कारखाने में ‘ग्लूकोज’ नामक चीनी बनाते हैं। यह चीनी के समान मीठा नहीं होता। ग्लूकोज बनाने के बाद पौधे उसे माँड अर्थात स्टार्च में परिवर्तित करते हैं। यह स्टार्च पानी में घुल जाता है और पौधे द्वारा, अपने तने की नन्ही-नन्ही नलियों में से होकर, जड़ में पहुँचा दिया जाता है। यह वहाँ जमा होता रहता है।
इस माँड-निर्माण के साथ हरा पौधा सेल्यूलोज भी बनाता है। इस प्रकार पौधे ग्लूकोज, माँड या स्टार्च तथा सेल्यूलोज बनते हैं। उनकी यह क्रिया प्रकाश-संश्लेषण कहलाती है। संसार के सभी हरे पौधे अपना भोजन प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया द्वारा ही बनाते हैं।
इस प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया में एक और रासायनिक क्रिया होकर पौधे में हरीतिमा या क्लोरोफिल का निर्माण होता है जिसके कारण ही पौधे हरे दिखाई देते हैं। इन्हीं हरे पौधों के कारण यह संसार हरा-भरा दिखाई देता है।
इस सिलसिले में यह भी जान लें कि –
1.प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया पौधे सूर्य के प्रकाश में करते हैं। सूर्य का प्रकाश इस कार्य में उन्हें ‘शक्ति’ देता है।
2. इस क्रिया के दौरान पौधे हवा में से कार्बन डाइऑक्साइड सोखते हैं।
3. इस क्रिया में उनके शरीर में से ऑक्सीजन निकलती है।
4. यह क्रिया करते समय जड़ों द्वारा चूसा हुआ पानी तने में से होकर ऊपर आता है।

प्राणियों के लिए प्राणवायु या ऑक्सीजन नितांत आवश्यक होती है। हम ऑक्सीजन ग्रहण करते हैं और नोषजन या कार्बन डाइऑक्साइड त्यागते हैं। हम यह क्रिया चौबीसों घंटे करते हैं। पेड़-पौधे दिन में नोषजन या कार्बन डाइऑक्साइड ग्रहण करते हैं और ओषजन या ऑक्सीजन त्यागते हैं। आपने देखा होगा कि दिन में इसीलिए वृक्षों के नीचे ताजगी व चैन महसूस होता है।
रात में यही पेड़-पौधे ओषजन या प्राणवायु ग्रहण करते हैं और नोषजन छोड़ते हैं। इसी कारण रात में वृक्षों के नीचे उमस-सी महसूस होती है और हमें वह ताजगी नहीं मिलती जो दिन में वृक्षों के नीचे मिलती हैं।
रात में चूँकि पेड़-पौधे नोषजन छोड़ते हैं और वह मनुष्यों के लिए हानिकारक होती है, इसीलिए प्रायः रात में वृक्षों के नीचे सोने की मनाही की जाती है।

करोड़ों वर्षों से ऑक्सीजन उपयोग में है :

करोड़ों वर्षों से पृथ्वी पर जीवन चल रहा है और ऑक्सीजन उपयोग में आ रही है। फिर भी क्या कारण है कि ऑक्सीजन आज तक समाप्त नहीं हुई। जबकि इतनी अधिक संख्या में प्राणियों द्वारा इसे उपयोग में लाने और खराब करने पर तो यह न जाने कब की समाप्त हो गई होती ?
जी हाँ, ऑक्सीजन समाप्त हो गई होती यदि प्रकृति ने पेड़-पौधों की सहायता से ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड के निर्माण का ‘अनूठा जीवन-रक्षक चक्र नहीं बनाया होता। इसमें प्राणी एक ओर ऑक्सीजन काम में लाते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ते हैं, तो दूसरी ओर पौधे कार्बन डाइऑक्साइड का उपयोग करते हैं और अन्य प्राणियों के उपयोग के लिए ऑक्सीजन छोड़ते हैं।
यदि हम वनस्पति, पेड़ और पौधों को किसी भी प्रकार से नष्ट करते हैं तो हम इस क्रम को तोड़ने का प्रकृति-विरोधी बहुत बड़ा अपराध करते हैं जो हमारे ही नाश का कारण बन सकता है। यह अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है।

आज हजारों कल-कारखाने बराबर धुआँ उगल रहे हैं, जिससे हमारे आसपास का वातावरण दूषित होता जा रहा है। इसे वायु-प्रदूषण कहा जाता है। यदि ये कल-कारखाने चलते ही जाते और उतनी ही अधिक संख्या में वृक्षों को भी रोपा जाता तो वायु-प्रदूषण नहीं होता। कारण वृक्ष उक्त क्रम का निर्वाह करते हुए वायु को शुद्ध करते रहते । मनुष्य ने वृक्षों को काटकर कारखाने लगाए, परंतु उन वृक्षों के बदले पुनः दूसरे वृक्ष नहीं रोपे, जिससे अनेक समस्याओं का जन्म हुआ है। इन समस्याओं में वायु-प्रदूषण सबसे प्रमुख है।

पौधे और प्राणी एक-दूसरे पर आश्रित हैं :

पौधे और प्राणी दोनों ही सजीव वर्ग में आते हैं। इस प्रकार वे एक सजीव और सक्रिय संसार या सृष्टि को बनानेवाले हैं। वे एक-दूसरे पर निर्भर हैं।
तितलियाँ पौधे का रस पी जाती हैं परंतु अपने पैरों में ‘परागकण’ ले जाकर उसे दूसरी जगह फैलाती हैं जिससे ये पादप वहाँ भी बढ़ते हैं, उगते हैं और फैलकर नया जीवन पाते हैं।
मक्खी को हम सामान्यतः नुकसानदायक ही मानते हैं परंतु परागकणों को फैलाने में वह बड़ी सहायक होती है। फलों के अंदर बीज होते हैं। अनेक प्राणी फलों और बीजों को खाते हैं। अपने मल त्यागने के माध्यम से वे उन बीजों को अन्यत्र फैलाते हैं जिससे वे बीज वहाँ उपजते हैं। इस प्रकार वे एक नया जीवन पाते हैं। पक्षी भी अपने पंजों में बीजों को इधर से उधर ले जाते हैं।