आदि शंकराचार्य जी का जीवन परिचय | Biography of Adi Shankara

तेजस्वी बालक का जन्म :

अब से लगभग साढ़े बारह सौ वर्ष पूर्व केरल प्रान्त के एक ग्राम में एक बालक का जन्म हुआ जो असामान्य विद्या बुद्धि से सम्पन्न
था । जैसे अब भी कोई-कोई बालक जिसको वैज्ञानिकगण ‘प्रोडिजी’ कहते हैं चार-पाँच वर्ष की आयु में ही कई भाषाओं का अथवा गणित, काव्य, संगीत आदि उच्च विद्याओं का ज्ञाता बन जाता है, उसी प्रकार इस बालक ने भी सात वर्ष की आयु में ही अनेक शास्त्रों का अध्ययन कर लिया था ।

उसकी अद्भुत विशेषता को सुनकर देश के बड़े-बड़े विद्वान् और वहाँ का विद्यानुरागी राजा भी उनको देखने तथा उनकी अगाध विद्या के सम्बन्ध में फैली जनश्रुति कहाँ तक सत्य है, इसकी जाँच करने को आये । उन सबने इतनी छोटी आयु में इतना ज्ञान प्राप्त कर लेना एक दैवी चमत्कार ही समझा और वे उनको सम्मानपूर्वक नमस्कार करके चले गये।

अल्पायु योग :

ऐसे आश्चर्यजनक बालक का समाचार सुनकर कुछ ज्योतिषी भी यह जिज्ञासा लेकर आये, देखें किन ग्रहों के प्रभाव से उसे ऐसी अपूर्व शक्ति प्राप्त हो सकी। उन्होंने कुण्डली में स्थित ग्रहों की स्थिति को एक बहुत बड़े महापुरुष के योग्य तो पाया, पर साथ ही उसमें उनको एक बात ऐसी खेदजनक भी दिखलाई पड़ी जिससे उनकी मुखमुद्रा शोकपूर्ण हो गई । यह देखकर बालक की माता ने आशंकित होकर इसका कारण पूछा तो उन्होंने बड़े संकोच से कहा कि “वैसे तो ये दैवी ज्ञान से मंडित एक महापुरुष ही हैं, पर ग्रहों के फलानुसार इनकी आयुष्य केवल ८ वर्ष की है । अगर ये तपस्या करें तो वह आयुष्य ८ वर्ष और बढ़ सकती है।

माँ से संन्यास की आज्ञा :

वह बालक जिनका नाम शंकर था पहले ही देश और धर्म की सेवा के लिये अपना जीवन अर्पण करना चाहते थे । अब इस भविष्यफल के प्रकट हो जाने पर उन्होंने अपनी माता से अपनी मनोभिलाषा कह सुनाई । पर घर में कोई और उत्तराधिकारी न होने से वे इसके लिये तैयार न हुईं।
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तब बालक शंकर ने एक उपाय से काम लेना सोचा । कुछ समय बाद जब वे अपनी माता के साथ किसी पर्व के अवसर पर नदी में स्नान करने गये तो तैरते-तैरते पकारने लगे कि मुझे मगर ने पकड़ लिया और खींचे लिये जाता है । इस पर माता भी कुहराम मचाने लगी । शंकर ने कहा- “माता यदि तू मुझे शिवजी के लिये अर्पण कर दे तो वे मेरी रक्षा कर सकते हैं।” पुत्र की प्राण रक्षार्थ माता ने वैसा ही मान लिया और शंकर तैरकर घाट पर आ गये । उन्होंने कपड़े बदल कर माता को प्रणाम किया संन्यास ग्रहण करने के लिए सद्गुरु की सेवा में जाने की आज्ञा मांगी ।

गोविन्दपाद आश्रम में वेदान्त अध्ययन :

माता बहुत रोई-कलपी, पर धर्म के लिये जीवन अर्पण कर देने वाले शंकर उसके निर्वाह की उचित व्यवस्था करके नर्मदा की तरफ चल दिये। वहाँ तक कई सौ मील का जंगली और पहाड़ी मार्ग अतिक्रम कर सकना एक छोटे बालके के लिये असम्भव जान पड़ता था, पर दृढ़वती शंकर किसी कष्ट या भय की चिन्ता न करके निरन्तर यात्रा करते हुए वहाँ पहुंच गये । उस स्थान पर एक बहुत प्राचीन योगी गोविन्दपाद का आश्रम था जो वेदान्त शास्त्र के पूर्ण ज्ञाता माने जाते थे। शंकर ने उनसे दीक्षा ग्रहण की और दो वर्ष तक वेदान्त का अध्ययन किया । इसके पश्चात् गुरुजी ने शंकर को काशी जाकर धर्म और वेदान्त मत का प्रचार करने की आज्ञा दी और स्वयं महासमाधि ले ली।

बाल-संन्यासी की काशी यात्रा :

जिस समय यह बाल-संन्यासी अपने वयोवृद्ध गुरु भाइयों के साथ काशी पहुंचे और वेदान्त के गूढ़ रहस्यों का प्रवचन करने लगे तो वहाँ एक हलचल मच गई और लोगों का समूह उनके दर्शनार्थ आने लगा । यद्यपि उनका शरीर बालक का था पर ज्ञान और बुद्धि पूर्ण प्रौढ़ता को प्राप्त हो चुके थे । वे बड़े-बड़े पंडितों के प्रश्नों का उत्तर देकर उनकी शंकाओं का समाधान करते और अन्य सब मतों का निराकरण करके वेदान्त-मत का प्रतिपादन करते ।

शंकराचार्य निर्गुण सिद्धांत के अनुयायी थे और वेदांत सिद्धान्त के अनुसार संसार को मिथ्या और माया समझने का भाव उनके भीतर इतना प्रबल हो चुका था कि वे भारतीय जनता में प्रचलित सगुणोपासना की तरफ कभी तनिक ध्यान नहीं देते थे। वे सदा आत्मस्वरूप की भावना करके इस प्रकार कहते रहते –
निर्गुणो निष्क्रियो नित्यो निर्विकल्पो निरंजनः ।
निर्विकारो निराकारो नित्यं मुक्तोऽस्मि निर्मलः ॥
अहमाकाशवत् सर्वं बहरंतर्गतोऽच्युतः ।
सत्यं ज्ञानमनन्तं यत्परं ब्रह्माहमेव तत् ॥

अर्थात- मैं सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण से रहित हूँ । मैं शरीर इन्द्रिय प्राण और अन्त:करण की क्रिया से रहित हूँ. तीनों काल में मेरा अस्तित्व है, समस्त विकल्पों और काम-क्रोध आदि विकारों से रहित हूँ, आकार रहित हूँ, अविद्या रूप मल से रहित हूँ। मैं तो आकाश तत्त्व के समान सब प्राणियों में व्याप्त हूँ । देश, काल और वस्तु के परिच्छेद से रहित जो परब्रह्म है वही मैं हूँ।”

यह निर्गुण-भावना उनमें उस समय ऐसी दृढ़ हो गई थी कि एक मात्र निर्विकल्प समाधि के सिवाय भक्ति, उपासना आदि अन्य किसी साधन की तरफ वे बिल्कुल ध्यान नहीं देते थे । विश्व-कल्याण की भावना चित्त में कभी-कभी अवश्य उत्पन्न होती थी, पर वह भी जगत् को ‘असत्’ समझने की भावना से दब जाती थी । गुरु की आज्ञा को स्मरण करके शिष्यों तथा जनता को वेदान्त-सिद्धांत का उपदेश अवश्य देते थे, पर यह कार्य भी वे यन्त्रवत् कर रहे थे । यह भाव एक मुमुक्ष की दृष्टि से अवश्य सराहनीय था, पर संसार में उनको सत्य-धर्म के प्रचार और उसकी रक्षा का जो कार्य करना था उसमें सहायक न होकर बाधक ही था ।

भगवान् विश्वनाथ का चांडाल के रूप में श्री शंकर को उपदेश :

पर काशी एक ऐसा ज्ञान-केन्द्र है जहाँ सदा शास्त्र चर्चा ही चलती रहती है और सब प्रकार के मतों का प्रतिपादन करने वाले भिन्नभिन्न प्रकार से धर्म का प्रतिपादन करते रहते हैं । वहाँ श्री शंकराचार्य के सम्मुख दो-एक ऐसी घटनायें हुईं जिनसे उनको अपने वेदान्त सिद्धान्त को व्यावहारिक रूप देना पड़ा । एक प्रसिद्ध घटना इस प्रकार बतलाई जाती है कि एक दिन जब वे गंगातट की ओर जा रहे थे उनको सामने से एक चांडाल आता दिखाई दिया जिसके साथ चार बड़े कुत्ते थे और जो मद्य के नशे में झूमता-झामता चला आ रहा था। उससे स्पर्श हो जाने की आशंका से श्री शंकर ने कहा- “रास्ते के एक तरफ होकर चलो और मेरे जाने के लिए स्थान को छोड़ दो ।’

चांडाल ने उनकी बातों की तरफ कुछ ध्यान न दिया और चलते चलते कहने लगा- “कौन किसको स्पर्श करता है ? सर्वत्र एक ही वस्त है उसके सिवाय और क्या ? किसके स्पर्श से भयभीत होकर तुम दब कर चल रहे हो ? आत्मा तो किसी को स्पर्श नहीं करती। जो आत्मा तुम में है वह मेरे भीतर भी है । फिर तुम किससे दर जाने की कह रहे हो ? मेरी देह को या मेरी आत्मा को ? इन शब्दों को सुनते ही शंकर का ब्रह्मज्ञान सच्चे व्यावहारिक स्तर पर पहुंच गया और उन्होंने मन ही मन उस चांडाल को एक. गुरु समझ कर प्रणाम किया ।अनेक लोग इस घटना को सुनकर कहने लगे कि स्वयं भगवान् विश्वनाथ ने चांडाल के रूप में श्री शंकर को उपदेश दिया था और उनको केवल सिद्धान्त पर न अड़े रहकर वह मार्ग दिखलाया था जिससे वे जनमत को अपने साथ लेकर धर्म-स्थापना का कार्य कर सकें।

वैदिक धर्म का प्रचार :

इसके पश्चात् शीघ्र ही उन्होंने अपना जीवन कार्य आरम्भ कर दिया । वे अपने प्रमुख शिष्यों के साथ बदरिकाश्रम चले गये और ब्रह्मसूत्र पर अपना प्रसिद्ध शारीरिक भाष्य लिखा । इसके साथ ही ग्यारह प्रमुख उपनिषदों तथा श्रीमद्भगवद्गीता पर भी भाष्य रचे । ये तीनों ग्रन्थ ‘प्रस्थानत्रयी’ के नाम से प्रसिद्ध हो गये और ऐसी परम्परा पड़ गई कि जो धर्म-प्रचारक पहले इन तीनों पर ऐसे ही विद्वतापूर्ण भाष्यों की रचना करके अपने मत का प्रतिपादन कर सके वही ‘आचार्य’ की पदवी का अधिकारी माना जाय ।

आदि शंकराचार्य और मंडन मिश्र :

जब श्रीशंकर ने भारतवर्ष में प्रचलित बौद्ध, जैन आदि अवैदिक मतों के खण्डन का झण्डा उठाया तो उनसे कहा गया कि उनसे भी पहले इस कार्य की घोषणा श्री कुमारिल भट्ट कर चुके हैं । वे उनसे भेंट करने प्रयाग पहुंचे, पर परस्थितिवश कुमारिल भट्ट उनसे प्रभावित होकर भी उनका साथ न दे सके और उसी समय देह त्याग दी । पर वे कह गये कि आप महिष्मती नगरी में जाइये, जहाँ मेरा शिष्य मंडन मिश्र रहता है जो मुझ से भी अधिक विद्वान् है । वह आपके कार्य में सहयोग करेगा । वास्तव में मंडन मिश्र उस युग का भारत प्रसिद्ध विद्वान् तथा पण्डित था । श्रीशंकर ने शास्त्रार्थ करके उनको अपना सिद्धांत मनवा दिया और उसके पश्चात् अन्त समय तक वही उनका सबसे बड़ा सहायक रहा ।

बौद्धों को परास्त करके वैदिक मत का उत्कर्ष साधन करने पर भी शंकर को पाशुपत, शाक्त, तांत्रिक, शैव, माहेश्वर, वैष्णव आदि हिन्दू धर्म के बहुसंख्यक सम्प्रदाय वालों का भी मुकाबला करना पड़ा, जिन्होंने धर्म के विकृत रूप का प्रचार करके जनता को कुमार्गगामी बना रखा था । इसमें से उग्र भैरव नाम का एक कापालिक बदला लेने की नीयत से प्रकट में आचार्य का शिष्य बन गया और एक दिन मौका पाकर उनको मारने लगा । पर अन्य शिष्य उसकी तरफ से सावधान रहते थे इसलिए उसी समय पद्मपाद रक्षा करने को पहुंच गया और उसने कापालिक का वहीं वध कर डाला । इसी प्रकार जब वे राजा सुधन्वा को साथ लेकर प्रचार कर रहे थे तो कर्नाटक में कापालिकों के महन्त कुचक्र ने अपने सैकड़ों सशस्त्र अनुयायियों को लेकर उन पर आक्रमण किया । पर राजा सुधन्वा सावधान था और उसने अपनी सेना के द्वारा उनको मारकर भगा दिया ।

आदि शंकराचार्य के द्वारा चार मठों की स्थापना :

जब वे समस्त भारत में धर्म-प्रचार करके आसाम पहुंचे तो शाक्त मत के आचार्य अभिनव गुप्त से मुकाबला हुआ । यद्यपि परास्त होकर प्रकट में उनका वह शिष्य बन गया, पर प्रतिहिंसा वश उसने कोई गुप्त प्रयोग करके इनके शरीर में भगन्दर की व्याधि उत्पन्न कर दी। अन्य अनुयायियों ने इलाज या अन्य कोई उपाय करने की बार-बार सम्मति दी, पर आचार्य ने इसको अपना प्रारब्ध मानकर कोई प्रयत्न नहीं किया और अपने कार्य को यथासम्भव शीघ्र पूरा करके धर्म के नाम पर प्रसन्नतापूर्वक जीवन की इतिश्री कर ली । उस अवसर पर उन्होंने अपने शिष्य वर्ग को अन्तिम उपदेश देते हुए कहा-

“हे शिष्यो ! अब तुम सब दैवत्य प्राप्त करने और मुमुक्षजनों को उपदेश देने में सदा सावधान रहकर उद्योग करते रहना । तोटक को उत्तर दिशा में ज्योतिर्मठ, पद्मपाद को पूर्व दिशा में गोवर्धन मठ, हसतामलक को पश्चिम दिशा में शारदामठ और सुरेश्वर को दक्षिण दिशा में शृंगेरी मठ की स्थापना करके अपने इस अभेद अद्वैत ज्ञान का प्रचार धैर्य और दृढ़ता से निरन्तर करते रहना चाहिए । अब सब शिष्यों को इन चारों का सम्मान करना चाहिये। अधिकारियों को वैदिक मार्ग में प्रवत्त करना और दूराचारियों का सुधार करना चाहिये।’

चाण्डाल द्वारा उपदेस :

एक दिन वे प्रात:काल नदी में स्नान कर लौट रहे थे कि सहसा एक चाण्डाल से छू गये । स्पर्श होते ही शंकराचार्य कुपित हो उठे और चाण्डाल को अपवित्र कर देने का दोष लगाकर भला-बुरा कहने लगे । चांडाल उनका रोष देखकर हँसा और बोला- महाराज ! संन्यास लेकर सन्त तो बन गये और वेद शास्त्र पढ़ कर पंडित भी। किन्तु आपका तुच्छ देहाभिमान अब भी न गया । इस प्रकार की भेद बुद्धि रहते हुए आप अपने को पूर्ण सन्त मान रहे हैं । यह तो उचित नहीं दीखता । सबके शरीरों में एक आत्मा का निवास है, इस सत्य को प्रतीत किये बिना आपका संन्यास अपूर्ण है, आडम्बर है ।

चाण्डाल की बातों ने शंकराचार्य की आँखें खोल दी । उन्होंने अपनी अपूर्णता समझी और उसे पूरा करने के लिए पुन: घोर साधना में लग गये और अब की बार जब अध्यात्म के सत्य स्वरूप को हृदयंगम कर सके तो तुरन्त ही अपने कर्तव्य पथ पर चल पड़े।

सारे देश में वैदिक धर्म का शंखनाद :

उन्होंने अटक से कटक और कन्याकुमारी से काश्मीर तक की पैदल यात्रा की ।
इस यात्रा में उन्होंने हजारों व्याख्यान दिये । बड़े-बड़े उद्भट विद्वानों से शास्त्रार्थ किया और धर्म के सच्चे स्वरूप को समझनेसमझाने के लिये सभायें आयोजित की । उन्होंने धर्म का प्रचार करने के लिये चिद्विलास, विष्णु गुप्त, हस्तामलक, समित पाणि, ज्ञानवृन्द, भानु गर्भिक, बुद्धि विरंचि त्रोटकाचार्य, पद्यनाम, शद्धकीर्ति मंडन मिश्र, कृष्णदर्शन आदि देश के उद्भट विद्वानों को संगठित किया । वेद धर्मानुयायियों की एक विशाल धर्म सेना बनाई गई और सम्पूर्ण भारत में धर्म-सुधार की हलचल मचा दी । उनके इस अखण्ड प्रयत्न का फल यह हुआ कि जनता के मानस में धर्म सम्बन्धी जो भी भांतियाँ घर कर रही थीं वे सब दूर होने लगी और सारे देश में वैदिक धर्म का शंखनाद गूंजने लगा।

संत का महा निर्वाण :

श्रीशंकराचार्य एक कर्मठ धर्मवीर थे । यद्यपि उनको भगन्दर का फोड़ा निकला हुआ था और वैद्यों की राय थी कि वे आराम से एक स्थान पर रहें उसका उपचार करें अन्यथा यह फोड़ा उनके लिये घातक बन जायेगा । किन्तु श्रीशंकराचार्य आराम से पड़े रहने को तैयार न हुए । उन्होंने स्पष्ट कह दिया कि मेरे शरीर से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण मेरा कर्तव्य है, उसके अपूर्ण रहते हुए मैं किस प्रकार विश्राम ले सकता हूँ।

वे निरन्तर उस कष्ट में भी काम करते रहे और अन्त में तीस वर्ष की अवस्था में जगद्गुरु की पदवी पाकर इस संसार से चले गये।

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