महर्षि अरविन्द का जीवन परिचय (संक्षिप्त जीवनी)

देश एवं धर्म साधना के साधक महर्षि अरविन्द – जीवन परिचय :

स्वामी विवेकानन्द ने मानव अन्तरात्मा को जाग्रत करने के लिए जो प्रबल प्रयत्न किए थे उनका प्रभाव सारे भारतवर्ष पर विशेषतया बंगाल पर पड़ा । अध्यात्म कायरों या भगोड़ों की बपौती नहीं वरन् शूरवीरों और सत्पुरुषों की जीवन नीति है, यह उपदेश करते हुए स्वामी जी देशव्यापी प्रचार कार्य में लगे थे । तेजस्वी नवयुवक उनसे बहुत प्रभावित हुए । धर्म, संस्कृति समाज और राष्ट्र के प्रति निष्ठा पैदा करना और मानवता के महान् उत्तरदायित्त्वों को समझते हुए महापुरुषों जैसी जीवन-नीति के लिए भावनाशील व्यक्तियों को तैयार करना स्वामी जी का लक्ष्य था । उस कषाय वस्त्रधारी महात्मा ने भारत के सच्चे सपूत की तरह उस अध्यात्म का प्रसार किया जिससे मृतकों में भी जीवन उत्पन्न होता है ।

स्वामी रामदास ने जिस प्रकार यवन काल में सारे महाराष्ट्र को जाग्रत करके स्वतन्त्रता संग्राम के सैनानी पैदा किये थे उसी प्रकार स्वामी विवेकानन्द ने देश भर में, विशेषतया बंगाल में ऐसी लहर उत्पन्न की, जिससे प्रभावित होकर भावनाशील लोग गौरवास्पद जीवन जीने के लिए आतुर हो उठे । यही भावना बंगाल के क्रान्तिकारी आन्दोलन के रूप में फूटी । यह प्रकट तथ्य है कि अंग्रेजों के विरुद्ध क्रान्तिकारी संघर्ष में बंगाल ही अग्रणी रहा ।

जन्म एवं शिक्षा :

आत्मदर्शी नेताओं द्वारा झकझोर कर जाग्रत की गई नई पीढ़ी भारत के अतीत को वापस लाने के लिये जिन दिनों छटपटाहट अनुभव कर रही थी, उन्हीं दिनों १५ अगस्त, १८७२ में कलकत्ता में अरविन्द का जन्म हुआ । उस समय स्वराज्य की बात करना भी अपराध था पर अरविन्द की सतत् साधना फलित हुई । ७५ वर्ष के तप ने ठीक उनके जन्म दिन पर ही भारत में अपना पूर्ण स्वतन्त्रता का लक्ष्य प्राप्त कर लिया ।

अरविन्द के पिता सुप्रसिद्ध सिविल सर्जन डॉक्टर कृष्णघन घोष, अपने इस बालक को उच्च शिक्षा दिलाकर सरकार में कोई बड़ा अफसर बनाना चाहते थे । अतएव ७ वर्ष की आयु में ही इंग्लैण्ड पढ़ने भेज दिया । १८ वर्ष की आयु में उसने सिविल सर्विस की परीक्षा दी और आई. सी. एस. प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कर ली । इस अवधि में अपने निरन्तर अध्यवसाय के द्वारा उन्होंने अंग्रेजी के अतिरिक्त जर्मन, लैटिन, ग्रीक, फ्रेंच और इटली की भाषाओं में निपुणता प्राप्त कर ली।

आई. सी. एस. पास करने पर उन्हें भारत सरकार द्वारा कोई उच्च पद दिया जाने वाला था । पर उनका जन्म गुलामी का पट्टा बाँधकर ऐश-आराम की जिन्दगी बिताने के लिए नहीं हुआ था । उन्हें कुछ बड़े काम करने थे । सोचा यदि अफसरी मिल गई और फिर उसी में फँस गए तो प्रलोभन के बन्धन तोड़कर बाहर निकलना कठिन होगा । अतएव घुड़सवारी की परीक्षा देने से इन्कार कर दिया, इस प्रकार वे जानबूझ कर असफल बनने के लिए अड़ गये।

क्रान्तिकारी आन्दोलन की नींव :

हीनताग्रस्त मस्तिष्क दूसरों के अन्धानुकरण में अपनी बड़ाई समझते हैं । जैसा कि आज अंग्रेजों के चले जाने पर भी उनके रहनसहन, आहार-विहार, भाषा, भेष, नकल बनाने में अपना बड़प्पन अनुभव करते हैं । अरविन्द ऐसे ओछे न थे । १८ वर्ष वे इंग्लैण्ड में रहे और उन्होंने अंग्रेजों के जातीय गौरव और उपयुक्त गुणों को सीखा, स्वतन्त्र देश में रहकर उन्हें स्वतन्त्रता प्राणप्रिय लगने लगी। भारत लौटे तो उनके कण-कण में भारत को इंग्लैण्ड जैसा स्वतन्त्र, सम्पन्न और प्रबुद्ध बनाने की आकांक्षा भरी हुई थी।

अरविन्द की प्रतिभा और व्यक्तित्व से बड़ौदा नरेश बहुत प्रभावित हुए और उनकी नियुक्ति शिक्षा शास्त्री के रूप में हो गई। १३ वर्षों तक वे प्रधानाध्यापक और वाइस प्रिंसिपल और निजी सचिव का काम योग्यतापूर्वक करते रहे । इस बीच उन्होंने सहस्रों छात्रों में जातीय जीवन की भावनाएं भरी और उन्हें चरित्रवान देशभक्त बनाया।

इंग्लैण्ड से लौटते ही उन्होंने बंगाल में क्रान्तिकारी आन्दोलन की नींव जमाने का कार्य आरम्भ कर दिया । संगठन के अतिरिक्त प्रचार को माध्यम बनाया । बम्बई के अंग्रेजी साप्ताहिक ‘इन्दु-प्रकाश’ में ‘पुरानों के बदले नये दीपक’ शीर्षक लेखमाला चालू रख कर भारत के नव-निर्माण के लिए प्रत्येक देशभक्त का आह्वान किया । उन दिनों पत्र कम निकलते थे, जो निकलते थे वे चाव से पढ़े जाते थे । इन लेखों का भारी प्रभाव पड़ा और उन्हें अनेकों साथी सहयोगी मिलने लगे । उन्होंने ‘तरुण संघ’ की स्थापना की जिसमें आगे चलकर भारत के कितने ही स्वतन्त्र क्रान्तिकारी संगठन सम्मिलित हो गए । राष्ट्रीय दैनिक ‘वन्दे मातरम्’ के सम्पादक बने और क्रान्तिकारी दैनिक ‘युगान्तर’ का संचालन किया । उन्होंने क्रान्तिकारी योजना बनाने के लिए सुयोग्य विचारकों की एक अनुशीलन समिति’ बनाई जो भारत की और संसार की परिस्थितियों पर गम्भीरतापूर्वक विचार करके योजना तैयार करती और ‘तरुण संघ’ के सदस्य उन्हें कार्यान्वित करने में लग जाते । उन दिनों एक तरह से भारत में स्वाधीनता संग्राम की क्रान्तिकारी योजनाओं का समग्र संचालन वे स्वयं ही कर रहे थे ।

अरविन्द के जीवनोद्देश्य :

अरविन्द के जीवनोद्देश्य का परिचय पाणिग्रहण के दिनों अपनी पत्नी को लिखे गये पत्रों में भली प्रकार मिल जाता है । उन्होंने एक पत्र में अपनी सहधर्मिणी को लिखा-

“तुम चाहो तो मुझे सनकी कह सकती हो, मुझे एक नहीं तीन तरह का पागलपन है । एक पागलपन यह है कि मुझे जो कुछ ईश्वर ने दिया है उसमें से केवल निर्वाह योग्य अपने लिये केवल बाकी सबका सब जनता जनार्दन को लौटा देना चाहता हूँ । इस गये-गुजरे समाज का अंग होते हुये भी यदि मैं अपने इस आराम या संग्रह की बात सोचूँ तब वह मेरे लिये चोरी, बेईमानी की तरह ही एक घृणित काम होगा । दूसरा पागलपन यह है कि मैंने निश्चय किया है कि मैं ईश्वर को प्राप्त करके रहूँगा। आज के सम्प्रदायवादियों के आडम्बरों पर मेरा कोई भरोसा नहीं, तो भी यह पक्की निष्ठा है कि ईश्वर है और उसे कोई भी सच्चा मनुष्य प्राप्त कर सकता है । मैं मार्ग तलाश करूंगा, उस पर चलूँगा और कितना ही श्रम, समय एवं कष्ट क्यों न हो मैं अपना ईश्वर प्राप्त कर लक्ष्य प्राप्ति करके रहूँगा । तीसरा पागलपन यह है कि भारत माता को अपनी सगी माता जैसी भावना से पूजना चाहता हूँ । उसका सच्चा भक्त बनना चाहता हूँ और इस मातृ-भक्ति के लिये बड़े से बड़ा बलिदान करने की प्रसन्नता अनुभव करना चाहता हूँ।”

सचमुच उनकी यह तीनों सनकें अन्तकाल तक बनी रहीं और वे एक साधारण बंगाली से बढ़कर विश्व की महान् विभूति इन सनकों के आधार पर ही बन सके।

अरविन्द घोष की गिरफ़्तारी :

लार्ड कर्जन ने बंगाल को दो भागों में बाँट देने के लिये जो ‘बंगभंग’ योजना रखी उससे सारा देश तिलमिला उठा । बंगाल में उसके प्रतिरोध के लिये सक्रिय आन्दोलन उठ खड़ा हुआ । अरविन्द घोष उसका नेतृत्व करने लगे । विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार, राष्ट्रीय स्वयं सेवकों का संगठन, अदालतों का बहिष्कार, शिक्षा का विस्तार तथा अंग्रेजों को आतंकित करने के अन्य उपाय इस आंदोलन के अंग थे। उन्होंने नेशनल कॉलेज की स्थापना में प्रमुख भाग लिया और मात्र ७५ रु० मासिक वेतन पर काम करते रहे । काँग्रेस में उन्होंने प्रवेश किया और नेताओं की अग्रिम पंक्ति में जा पहुंचे।

सरकार उनके क्रान्तिकारी विचारों और कार्यों से आतंकित हो उठी । २ मई सन् १९०८ को कलकत्ता के मानिक तल्ला बाग में तलाशी हुई, जिसमें बम, पिस्तौल और कारतूसों का भण्डार मिला, चालीस युवक पकड़े गये जिनमें अरविन्द घोष भी थे । अलीपुर षड़यन्त्र केस का यह मुकदमा सेशनजज की अदालत में एक वर्ष तक चला । देशबन्धु चितरंजनदास की योग्यता और परिश्रम से अरविंद इस मुकदमे से छूट गये । पीछे हाईकोर्ट ने हाथ मलते हुए अपने फैसले में लिखा- ‘प्रमुख अपराधी और षड़यंत्रकारी तो इस मुकदमें में अरविन्द घोष थे जिन्हें पहले ही मुक्त कर दिया गया ।’

योगाभ्यास साधना :

जेल में उन्हें एकान्त काल कोठरी में रखा गया, जिसका अनुभव करते हुए उन्होंने लिखा है- “एकान्त में रहने वाला या तो सन्त बन जाता है या फिर पूरा शठ हो जाता है ।” इनके इस कथन की सच्चाई भारत में जहाँ-तहाँ फैले एकान्तवासी ‘शठों’ के रूप में प्रत्यक्ष देखी जा सकती है । पर वे सन्त ही बने ।

कलकत्ता के बमकेस से छुटकारा पाने के कुछ ही समय पश्चात् वे पाण्डिचेरी (मद्रास) चले गये, जिससे वहाँ अंग्रेजी पुलिस की छेड़खानी से बचकर निर्विघ्न रूप से योगाभ्यास कर सकें । आरम्भिक वर्षों में उनको आर्थिक अभाव से अपना समय एक छोटे मकान में व्यतीत करना पड़ा जिसमें स्नान तक की सुविधा न थी। पर १९२० में फ्रांस के प्रसिद्ध दार्शनिक पाल रिचार्ड तथा उनकी पत्नी मीरा रिचार्ड आश्रम में आकर रहने लगे । मीरा एक कुशल महिला थीं, उसकी व्यवस्था से आश्रम की व्यवस्था का बहुत कुछ सुधार हो गया और उसकी आर्थिक दशा भी कुछ वर्षों में संतोषजनक हो गई ।

पूर्ण योग का प्रचार :

पाण्डिचेरी के आश्रम में अरविंद का मुख्य लक्ष्य लोगों को एक ऐसी योग प्रणाली की शिक्षा देना था जिससे वे सुनिश्चित रूप से अध्यात्म के उच्च स्तरों तक पहुंच सकें । इसका नाम उन्होंने ‘पूर्ण योग’ रखा था । उनका कहना था कि “विश्व में जितनी भी ह्रास और विकास की क्रियायें चल रही हैं वह परम आत्मा का क्रमबद्ध योग है । इसी अर्थ में श्रीकृष्ण को ‘योगेश्वर’ कहा गया है और ईश्वर की इस शक्ति को ही योगमाया कहते हैं । व्यक्ति विशेष इस योग की ओर अनजाने ही खिंच आता है और बाद में उसे यह मालूम हो जाता है कि उसको इसमें अमुक काम करना है तो फिर वह योग में ‘सचेतन’ होकर हिस्सा लेता है और अनंत के साथ सहयोग का आनंद प्राप्त करने लगता है।”

अपने विचारों तथा योग-प्रणाली का प्रचार करने के लिए उन्होंने आर्य’ नामक मासिक पत्र भी प्रकाशित किया जिसका उद्देश्य था –
(१)अस्तित्व की उच्चतम अवस्थाओं का विधिवत् अध्ययन,
(२) ज्ञान के विशाल समन्वय की रचना । पूर्व और पश्चिम की सभी मानवता विरोधी धार्मिक परंपराओं का परिष्कार ।इस कार्य को बौद्धिक और वैज्ञानिक अनुशासन के साथ पूरा करना ।

भविष्य के स्वप्न :

‘आर्य’ के प्रथम पाँच-छ: वर्षों में जो लेख मालायें प्रकाशित हुईं वे आध्यात्मिक दृष्टि से बहुत महत्त्व की हैं। उनमें से ‘देवी जीवन,’ ‘योग समन्वय,’ ‘वेद-रहस्य,’ ‘मानव एकता का आदर्श,’ ‘सामाजिक विकास का मनोविज्ञान’ आदि कितने ही निबन्ध तो एक स्थायी निधि के समान हैं । श्री अरविंद ने इन निबन्धों तथा अन्य रचनाओं में जो विचार प्रकट किए हैं, वे एक प्रकार से भविष्य के स्वप्न थे । सन् १९४७ की १५ अगस्त को भारतीय स्वततंत्रतादिवस पर उन्होंने कहा था-
“मेरा एक स्वप्न एशियावासियों के पुनरुत्थान और मुक्ति का था, जिससे वे मानव सभ्यता की प्रगति में अपना महान् योग दे सकें। दूसरा स्वप्न था सारे संसार का एक संघ स्थापित होने का, जिसका बाह्य आधार मानव मात्र का श्रेष्ठ, समुज्जवल और शिष्ट जीवन हो।”

कहना न होगा कि ये दोनों बातें अधिकांश में पूरी हो चुकी हैं या उनकी सम्भावना निरंतर बढ़ती जाती है।
आगे चलकर उन्होंने भावी परिवर्तनों की जो रूपरेखा खींची वह भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। उन्होंने कहा-

“जो कुछ प्रयत्न किए जा रहे हैं, उनके मार्ग में आपत्तियाँ आ सकती हैं, उन प्रयत्नों को नष्ट कर सकती हैं, फिर भी अंतिम परिणाम निश्चित है । कारण यह कि एकीकरण ही प्रकृति की आवश्यकता और अनिवार्य गति है । मानव की जड़ता और मूर्खतापूर्ण स्वार्थभाव उसमें बाधक बन सकता है, पर प्रकृति की आवश्यकता और दैवी इच्छा के आगे ये चीजें सदैव टिकी नहीं रह सकतीं। पर इसकी प्राप्ति के लिए केवल बाहरी आधार ही पर्याप्त नहीं है । इसके लिए अंतर्राष्ट्रीय दृष्टिकोण तथा पारस्परिक अनुराग की भी आवश्यकता है । इसका अर्थ यह नहीं कि लोगों की राष्ट्रीय भावना सर्वथा जाती रहेगी, पर वह अपने आप में पूर्णता प्राप्त कर लेगी और उसकी युद्धप्रियता नष्ट हो जायेगी।”

“एक और स्वप्न है, संसार को भारत की तरफ से आध्यात्मिकता का उपहार, जिसका श्रीगणेश हो चुका है । यह आंदोलन बढ़ता ही जायेगा । जमाने के संकटों के साथ-साथ संसार की अधिकाधिक आँखें उसकी ओर आशा से देख रही हैं और बहुसंख्यक लोग उसके समीप ‘क्रियात्मक ज्ञान प्राप्त करने आ रहे है ।”

श्री अरविंद को संसार का त्याग किये कई वर्ष हो चुके हैं और इस बीच में एक नहीं अनेक ऐसी विशेष घटनाएं हो चुकी हैं जिनसे उपर्युक्त परिवर्तनों की आशा बढ़ती जाती है । जहाँ इस बीच में युद्ध की अभूतपूर्व तैयारियां की गई हैं, वहाँ विश्व संघ का प्रभाव भी बढ़ा है और कई बार उसने महायुद्ध की संभावना को टाला है । अरविंद के कथनानुसार बहुसंख्यक लोगों की जड़ता और स्वार्थ भावना के कारण इस आदर्श की प्राप्ति में बाधाएँ अवश्य पड़ेंगी, पर अंत में नये समाज और संसार का आगमन निश्चित है । वह नया संसार कैसा होगा इसकी भी थोड़ी-सी झाँकी श्री अरविंद ने इन शब्दों में कराई –

“अंतिम स्वप्न है विकास की ओर एक नया कदम, जिससे मनुष्य वर्तमान की अपेक्षा उच्च और विशाल चेतना की ओर अग्रसर हो सके और उन समस्याओं का हल खोज सके, जिनको हल करने में वह आज तक परेशानी और किंकर्तव्यविमूढ़ता का अनुभव करता रहा है । यह एक ऐसा आदर्श है जिसका प्रभाव भारत और पश्चिम के मस्तिष्कों पड़ने लगा है। इस कार्य में अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा अधिक कठिनाइयाँ हैं, पर वे दूर की जा सकती हैं और जगन्नियंता की इच्छा हुई तो ये कठिनाइयाँ बिल्कुल दूर हो जायेंगी । इस कार्य का आरम्भ लक्ष्य सार्वभौम होगा, पर इसका केन्द्र भारत में ही रह सकता है।”

वास्तव में अरविंद घोष ने एक ऐसे नये संसार का स्वप्न देखा था जो आज नहीं है, पर भविष्य में उत्पन्न होने वाला है । वर्तमान संसार अधिकांश में भौतिकवाद पर आधारित है, इसलिए लोगों का ध्यान धन, सम्पत्ति तथा अन्य सांसारिक सामग्री पर रहता है । जब उसमें किसी कारण कमी पड़ती है तभी सब में खींचतानी और कलह होने लगती है, पर भावी जगत का आधार अध्यात्म रहेगा और उसमें बहुत से कार्य आत्मशक्ति से सम्पन्न कर लिए जायेंगे, इसलिए उस समय आजकल के लड़ाई-झगड़ों का अंत हो जायेगा और मनुष्य एक ऐसे उच्च धरातल पर पहुँच जायेगा जिसकी आज कल्पना भी नहीं की जा सकती।

एकांत साधना :

श्री अरविंद की साधना जैसे-जैसे बढ़ती गई वैसे-वैसे ही उनका सम्बन्ध बाह्य जगत से कम होता गया । अंत में उनकी सिद्धि का दिन आ पहुंचा और २४ नवम्बर, १९२६ को उन्होंने संसार से पूर्णरूप से अवकाश ग्रहण कर लिया । उसके पश्चात् उन्होंने किसी से भी मिलना बिल्कुल बंद कर दिया । शिष्यों तथा साधकों का जो मार्गदर्शन करते थे वह ‘माताजी’ (मीरा रिचाड) द्वारा होने लग गया ।

इस प्रकार सन् १९२६ से १९५० तक श्री अरविंद एकांतवाद में एक ऐसी साधना में निमग्न रहे, जिसका उद्देश्य आध्यात्मिक मार्ग के अन्यान्य साधकों को आत्म-साक्षात्कार के मार्ग पर आगे बढ़ाना था । वे स्वयं तो योग के अंतिम लक्ष्य तक पहुँच कर सर्वोच्च स्थिति को प्राप्त कर चुके थे, पर साथ ही अपनी साधना द्वारा एक ऐसा मार्ग भी प्रस्तुत करना चाहते थे, जिस पर चलकर मुमुक्ष व्यक्ति सांसारिक बंधनों को काट कर फेंक सकें । संसार को आगे बढ़ाने के लिए यह एक बहुत बड़ा कदम था ।

महानिर्वाण :

५ दिसम्बर, १९५० को ७८ वर्ष की आयु में जब उनका देहावसान हुआ तो लोगों ने इसे एक बड़ी क्षति समझा । उस अवसर पर भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने जो उद्गार प्रकट किए थे उनसे श्री अरविंद की महत्ता पर पर्याप्त प्रकाश पडता है –

“श्री अरविंद प्राचीन ऋषियों की भाँति साहसी और निर्भीक विचारक थे । वे केवल विचारक ही न थे साथ ही उन विचारों को कार्य रूप में भी परिणत करते थे। लिखित और मौखिक शास्त्रों का अध्ययन करके उन्होंने अपनी साधना द्वारा उसे और भी दृढ़ रूप दे दिया था । उनके भौतिक शरीर को तो अब कोई देख न सकेगा, पर जो संदेश वे छोड़ गये हैं, वह न केवल भारतवासियों को वरन् सारे संसार को प्रेरणा देता रहेगा। भारत उनकी स्मृति की पूजा और प्रतिष्ठा करता रहेगा और उन्हें महान् मुनियों तथा देवदूतों में स्थान देगा।”

उनकी भावी भारत की परिकल्पना यह थी “हमें देश तथा मानवता के लिए मन प्राण लगाकर अथक परिश्रम करना होगा । अभी तक यह आदर्श एक छोटा-सा बीज मात्र है और जो जीवन इसे मूर्त रूप देता है वह स्वयं एक नन्हा-सा केन्द्र मात्र है, किन्तु हमारी ध्रुव आशा है कि बीज एक महान् वृक्ष बनेगा और केन्द्र एक सदा विस्तृत होती हुई रचना का हृदय होगा । इस विसर्जित होते हुए जगत की अस्त-व्यस्तता में जन्म लेने के लिए नई मानवता संघर्ष कर रही है जो भावना हमें प्रेरणा दे रही है उसमें दृढ़-विश्वास के साथ हम उस नई मानवता का, भावी भारत के ध्वजवाहकों का दर्शन करते हैं । यह विशद भारतीय अध्यात्म ही थके-मादे शरीर का जीर्ण देव संस्कृति का काया-कल्प करके उसे नया जीवन देगा । वह दिन जल्दी ही आएगा।

त्याग का परिणाम :

उस समय भारत में स्वतन्त्रता आन्दोलन जोर पकड़ रहा था। सरकारी शिक्षा संस्थानों में शिक्षा प्राप्त करने का भी बहिष्कार होना आवश्यक था, किन्तु उस समय आन्दोलनकारियों के पास न इतना धन था और न साधन ही थे जिससे वे महाविद्यालय चला सकें । कुछ रुपया इकट्ठा हुआ । महाविद्यालय की रूपरेखा बनाई गई किन्तु, उसके संचालन के लिए भी तो योग्य अनुभवी व्यक्ति की आवश्यकता थी, जो बिना काफी वेतन के सम्भव नहीं था । विद्यालय की ओर से केवल ७५ रु. मासिक वेतन पर संचालक का विज्ञापन किया गया ।

सभी ने सोच रखा था इतने-से वेतन पर कौन अच्छा आदमी आयेगा? सब निराश ही थे कि अचानक एक आवेदन-पत्र आया और वह भी एक योग्य अनुभवी व्यक्ति का जिसकी स्वप्न में भी आशा नहीं की जा सकती थी । बड़ौदा कॉलेज के अध्यक्ष श्री अरविन्द घोष ने, जिन्हें उस समय अन्य सुविधाओं के साथ सात-सौ पचास रुपया मासिक वेतन था, उसे छोड़कर बंगाल में स्थापित इस नव-राष्ट्रीय महाविद्यालय के लिए ७५ रु. मासिक वेतन पर काम करना स्वीकार कर लिया । जहाँ इतना त्याग आदर्श किसी संस्था का संचालक उपस्थित करे वहाँ छात्रों के चरित्र एवं भावनाओं पर क्यों प्रभाव न पड़ेगा? उस विद्यालय के छात्रों ने आगे चलकर स्वतन्त्रता आन्दोलन में भारी भाग लिया और उनमें से कितने ही चोटी के राजनैतिक नेता बने ।

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