अशोकारिष्ट के फायदे ,औषधीय गुण ,सेवन विधि और नुकसान | Ashokarishta Benefits, Uses, Dosage and Side Effects in hindi

अशोकारिष्ट क्या है ? : Ashokarishta in Hindi

नारी-स्वास्थ्य के लिए परम मित्र, नारी रोगों के शोक से नारी को मुक्त करने वाले अशोक वृक्ष की छाल का मुख्य रूप से उपयोग कर प्रसिद्ध आयुर्वेदिक योग ‘अशोकारिष्ट’ बनाया जाता है। इस आयुर्वेदिक दवा का उपयोग रक्तप्रदर, ज्वर, रक्तपित्त, रक्तार्श (खूनी बवासीर), मन्दाग्नि, अरुचि, प्रमेह,शोथ आदि रोगों को नष्ट करने में किया जाता है।
देश के अनेक आयुर्वेदिक निर्माता संस्थान ‘अशोकारिष्ट’ बनाते हैं जो सर्वत्र दुकानों पर उपलब्ध रहता है।

अशोकारिष्ट के गुण व उपयोग :

अशोकारिष्ट स्त्रियों को नारी रोगों से मुक्त कर शोक रहित करता है । उदाहरणार्थ जैसे –

✦ श्वेतप्रदर (Leucorrhoea)
✦ अधिक मात्रा में रक्त स्राव होना जिसे असृग्दर या रक्त प्रदर (Menorhagia) कहते हैं
✦ कष्टार्तव (Dysmenorrhoea)
✦ गर्भाशय व योनि-भ्रंश (Prolapse of Uterus)
✦ डिम्बकोष-प्रदाह (ovaritis,
✦ हिस्टीरिया (Hysteria)
✦ बन्ध्यापन (Infertility)
✦ पाण्डु (Jaundice)
✦ ज्वर (Fever)
✦ रक्त पित्त (Hemoptysis and Hematemesis)
✦ बवासीर (Piles)
✦ मन्दाग्नि (Dyspepsia)
✦ शोथ (सूजन)
✦ अरुचि
आदि रोगों को नष्ट करता है।

रोग उपचार में अशोकारिष्ट के फायदे : Ashokarishta Benefits in Hindi

1- गर्भाशय को बलवान बनाने में अशोकारिष्ट के फायदे – ashokarishta and pregnancy in hindi

अशोकारिष्ट गर्भाशय को बलवान बनाता है और गर्भाशय की शिथिलता से उत्पन्न अत्यार्तव विकार (Polymenorrhoea) को दूर करने में उत्तम कार्य करता है। गर्भाशय के अंदर के आवरण में विकृति, डिम्बवाहिनियों (Fallopian Tubes) की विकृति, गर्भाशय के मुख (Cervix Uteri) पर योनि मार्ग में या गर्भाशय के अंदरया बाहर व्रण (घाव) हो जाने से अत्यार्तव रोग उत्पन्न होता है । इसे नष्ट करने में अशोकारिष्ट उत्तम कार्य करता है।

2- प्रदर रोग में अशोकारिष्ट के फायदे – ashokarishta benefits in leucorrhoea in hindi

आज अधिकांश महिलाएं प्रदर रोग से ग्रस्त रहती हैं। प्रदर रोग पैदा होने के प्रमुख कारण है अति मैथुन, गर्भस्राव, गर्भपात, अपच, अजीर्ण, कमजोरी, अधिक परिश्रम, मद्यपान, अधिक उपवास, अधिक शोक व चिन्ता से ग्रस्त रहना, गुप्तांग पर जोरदार आघात, दिन में सोना, आलस्य, बिल्कुल श्रम न करना, तले हुए, खटाई युक्त और तेज मिर्च-मसालेदार पदार्थों का अति सेवन- इन कारणों से स्त्रियों के शरीर में पित्त प्रकोप और अम्लपित्त की स्थिति बनती है।

इसका प्रभाव रक्त पर होता है और योनि मार्ग से चिकना, लसदार, चावल धोवन जैसी सफेदी लिये हुए स्राव या पीला, नीला, लाल, काला, मांस के धोवन जैसा रक्त गिरने लगता है, इससे दुर्गन्ध भी आने लगती है। परिणामस्वरूप शरीर में दर्द, कमजोरी, कमर व पैरों में दर्द, सिरदर्द, चक्कर आना, बेचैनी व कब्ज आदि शिकायतें हो जाती हैं। इन सबके लिए अशोकारिष्ट का सेवन अत्युत्तम है।

3- श्वेतप्रदर में अशोकारिष्ट के फायदे –

श्वेतप्रदर में रक्त-स्राव की जगह सफेद रंग का गाढ़ा चिपचिपा और लस्सेदारपानी गिरता है। इस स्राव की उत्पत्ति या तो योनि की श्लेष्मिक कला (Mucous Membrance of Vagina) से होती है या गर्भाशय के अंदर की दीवार से। थोड़ा बहुत रस तो यह कला या त्वचा बनाती ही है, ताकि योनिमार्गतर बना रहे लेकिन अधिक सहवास और कामुक भावना के कारण यह रस अधिक मात्रा में बनने लगता है और बाहर बहने लगता है।

श्वेतप्रदर रोग में वे सभी उपद्रव भी होते जो रक्तप्रदर में होते हैं। उचित आहार-विहार का पालन करते हुए अशोकारिष्ट का सेवन करने से यह रोग दूर हो जाता है।
प्रदर रोग से ग्रस्त स्त्री को सहवास में अति नहीं बल्कि कमी करना चाहिए और कामुक वातावरण तथा चिन्तन तो सर्वथा त्याग देना चाहिए ताकि रोग दूर हो सके।

( और पढ़े – लिकोरिया का रामबाण इलाज )

4- डिम्बकोष प्रदर में अशोकारिष्ट के फायदे –

अधिक सहवास करने वाली या व्यभिचारिणी स्त्रियों को डिम्बकोष प्रदर नामक व्याधि हो जाती है। यह व्याधि मासिक धर्म के दिनों में सहवास करने से होती है। कॉल गर्ल और वेश्याओं को यह व्याधि आमतौर पर हो जाया करती है। इससे पीठ व पेट में दर्द होना, उल्टी होना, योनि मार्ग से पीब निकलना आदि लक्षण, जैसे-जैसे रोग पुराना होता है, वैसे-वैसे प्रकट होते जाते हैं। स्त्री को इस रोग में बहुत कष्ट होता है।
इस व्याधि को नष्ट करने के लिए चंद्रप्रभावटी की 2-2 गोली सुबह-शाम पानी से और दोनों वक्त भोजन के बाद अशोकारिष्ट सेवन करने से लाभ होता है।

5- पेट दर्द में अशोकारिष्ट के लाभ –

यह महिलाओं के मासिक धर्म में पेट दर्द को दूर करने के लिए एक बेहतरीन स्रोत के रूप में काम करता है।

( और पढ़े – पेट दर्द के 41 देसी घरेलु उपचार )

6- कब्ज में अशोकारिष्ट के फायदे –

अशोकारिष्ट फाइबर के एक अच्छे स्रोत के रूप में कार्य करता है जिससे कब्ज जैसी समस्या समाप्त होती है ।

( और पढ़े – कब्ज का 41 रामबाण आयुर्वेदिक इलाज )

7- इम्युनिटी पावर बढ़ाने वाला –

यह समग्र प्रतिरक्षा में सुधार करने और मलेरिया, गठिया के दर्द, जीवाणु संक्रमण, मधुमेह, दस्त आदि रोगों को रोकने में उपयोगी है।

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8- अल्सर से बचाव –

अशोकारिष्ट प्रकृति में सूजन रोधी है जो अल्सर की घटना को कम करने में मदद करता है। इसी प्रकार गर्भाशय या योनि भ्रंश, हिस्टीरिया और पाण्डु रोग से ग्रस्त स्त्रियों के लिए भी अशोकारिष्ट अत्युत्तम औषधि है।

( और पढ़े – अल्सर के लक्षण और घरेलू उपचार )

9- गर्भाशय व योनि भ्रंश में अशोकारिष्ट के फायदे – ashokarishta benefits in Vaginal prolapse in hindi

गर्भाशय व योनि भ्रंश हो तो चन्दनादि चूर्ण आधा चम्मच (3 ग्राम के लगभग) और 250 मिलीग्राम (लगभग 2 रत्ती) त्रिवंग भस्म मिलाकर सुबह-शाम दूध के साथ लें और भोजन के बाद अशोकारिष्ट का सेवन करने से शीघ्र लाभ होता है।

10- पीलिया में अशोकारिष्ट के फायदे – ashokarishta benefits in jaundice in hindi

पाण्डु रोग में अशोकारिष्ट और लोहासव 2-2 चम्मच आधा कप पानी में डाल कर भोजन के बाद सेवन करना चाहिए।

( और पढ़े –पीलिया में क्या खाएं और क्या न खाएं )

अशोकारिष्ट की सेवन विधि :

भोजन के तुरंत बाद पाव कप पानी में दो बड़े चम्मच (लगभग 20 मि.ली.) भर कर अशोकारिष्ट डाल कर सुबह-शाम दोनों वक्त पीना चाहिए।

अशोकारिष्ट के नुकसान : side effects of ashokarishta in hindi

1- यह एसिडिटी और छाती में जलन का कारण हो सकता है ।
2- यदि गलत शिकायत के लिए इसका सेवन किया जाता है, तो लंबे समय तक मासिक धर्म चक्र में देरी हो सकती है।
3- चूंकि इसमें गुड़ होता है, इसलिए यह मधुमेह के रोगी के स्वास्थ्य को खतरे में डाल सकता है ।
4- यह आपके दिल की धड़कन को बढ़ा सकता है और आपके रक्त वाहिकाओं को संकीर्ण कर सकता है ।
5- अनुचित मात्रा में अशोकारिष्ट का सेवन करने के कारण उल्टी या मतली जैसी समस्याएं हो सकती है।

जैसा की हम जानते है अशोकारिष्ट का मुख्य घटक अशोक वृक्ष की छाल है तो आइये जानते है इस पेड के उपयोगी गुणों के बारे में –

अशोक वृक्ष का सामान्य परिचय :

असली अशोक के वृक्ष को लैटिन भाषा में ‘जोनेसिया अशोक’ कहते हैं। यह आम के पेड़ जैसा छायादार वृक्ष होता है। इसके पत्ते 8-9 इंच लंबे और दो-ढाई इंच चौड़े होते हैं। इसके पत्ते शुरू में तांबे जैसे रंग के होते हैं इसीलिए इसे ‘ताम्रपल्लवी’ भी कहते हैं। इसके नारंगी रंग के फूल वसन्त ऋतु में आते हैं जो बाद में लाल रंग के हो जाते हैं अत: सुनहरी लाल रंग के फलोंवाला होने से इसे ‘हेमपुष्पा’ भी कहा जाता है। इसके फल शरद ऋतु में आते हैं जो लंबे जामुन की तरह गोलाकार होते हैं और पकने पर लाल हो जाते हैं। इनके अंदर बीज होता है।

दूसरा नकली वृक्ष आम के पत्तों जैसे पत्तों वाला होता है। इसके फूल सफेद पीले रंग के और फल लाल रंग के होते हैं। यह देवदार जाति का वृक्ष होता है जिसकी लंबाई ज्यादा और छाया हल्की होती है। इस वृक्ष की गर्भाशय पर क्रिया नहीं होती। यह हीनवीर्य होता है अत: इसका सेवन नहीं करना चाहिए क्योंकि लाभ होगा नहीं और अशोक की गुणवत्तापर से सेवनकर्ता का विश्वास उठ जाएगा।

विभिन्न भाषाओं में अशोक वृक्ष के नाम :

संस्कृत – अशोक ।
हिन्दी – अशोक।
मराठी – अशोपक।
गुजराती – आसोपालव ।
बंगाल – अस्पाल, अशोक।
तेलगू – अशोकम्।
तामील – अशोघम्।
लेटिन – जोनेसिया अशोका (JoneciaAsoka).

अशोक के औषधीय गुण :

☛ यह शीतल, कड़वा, ग्राही, वर्ण को उत्तम करने वाला है
☛ यह कसैला और वात पित्त आदि दोषों को दूर करने वाला है
☛ अशोक अपच,तृषा, कृमि , शोषविष तथा रक्त विकार नष्ट करने वाला है।
☛ यह रसायन और उत्तेजक है।
☛ इसका क्वाथ गर्भाशय के रोगों का नाश करता है, विशेषकर रजोविकार (Menorrhagia) को नष्ट करता है। ☛ इसकी छाल रक्तप्रदर रोग को नष्ट करने में उपयोगी सिद्ध होती है ।

स्त्री-रोगों की चिकित्सा में अशोक की छाल के उपयोग :

असली अशोक की पहचान पत्तों के आकार, रंग और फल-फूल के रंग से करके इसकी छाल प्रयोग में ली जाती है क्योंकि स्त्री-रोगों की चिकित्सा के लिए इसकी छाल ही उपयोगी होती है । वैद्यों ने ही नहीं, बल्कि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के शोधकर्ता डॉक्टरों ने भी इसका रासायनिक विश्लेषण करके देखा है और इसकी छाल में हीमैटाक्सिलिन, टेनिन, कैटेकाल, केटास्टेरॉल, ग्लाइकोसाइड, सैपोनिन, कार्बनिक कैल्शियम तथा लौह के यौगिक पाये गये हैं, पर अलकेलाइड और एसेन्शियल आइल की मात्रा बिल्कुल नहीं पाई गई। टेनिनएसिड के कारण इसकी छाल सख्तग्राही होती है, अत: रक्तप्रदर में होने वाले अत्यधिक रजस्रावपर बहुत अच्छा नियंत्रण होता है।

(दवा व नुस्खों को वैद्यकीय सलाहनुसार सेवन करें)