आयुर्वेद अनुसार तैयार किये हुए भोज्य पदार्थों के गुणधर्म

आयुर्वेद अनुसार भोजन के गुणधर्म :

मुनियों ने जिन पदार्थों में जो गुण कहे हैं, उन पदार्थों के बनाये हुए अन्नों में भी वही सम्पूर्ण गुण होते हैं—सामान्यतया यह कहा जाता है। किसी-किसी अन्न में संस्कार-भेद से दूसरे गुण भी हो जाते हैं; जैसे कि पुराने चावलों का भात हलका होता है, परन्तु वही शाली चावलों का भात खिलता नहीं और चिड़वा भारी होता है। कहीं संयोग (मिलने) के प्रभाव से, गुणों में फर्क हो जाता है; जैसे कि, दुष्ट अन्न भारी होता है और घी भी भारी होता है, परन्तु वही दुष्ट अन्न अगर घी में बनाया गया हो, तो हलका और हितकारी होता है। इसी कारण, आगे, रोजमर्रा काम में आने वाले कुछ तैयार किये हुए, यानी पकाये हुए पदार्थों के गुण लिखते हैं

1-भात-
अग्निकारक, पथ्य, तृप्तिदायक, रुचिकारक और हलका होता है। लेकिन बिना धोये हुए चावलों का, बिना माँड़ निकाला हुआ और ठण्डा भात भारी, रुचिकारक’ और कफकारक होता है।

2-दाल-
मूंग, अरहर, चना और उड़द आदि की दाल, जो नमक-अदरखे आदि के साथ जल में पकाई जाती है, वह विष्टम्भकारी, रूखी और विशेष कर शीतल होती है। भुनी हुई बिना छिलकों की दाल अत्यन्त हलकी होती है।

3-खिचड़ी–
दाल-चावल मिला कर जो खिचड़ी जल में पकाई जाती है, वह वीर्यवर्द्धक, बलदायक, भारी, कफ और पित्त को पैदा करने वाली, दुर्जर, और मलमूत्र करने वाली होती है।

4-खीर-
चतुर मनुष्य अध-औटे दूध में, घी में भुने हुए चावल डाल कर पकाये। जब चावल एक हो जाँय, तब साफ, सफेद बूरा और घी डाले; यही उत्तम खीर है। खीर दुर्जर, पुष्टिकारक और बलदायक होती है।

5- सेमई –
तृप्तिकारक, बल बढ़ाने वाली, भारी, पित्त और वात-नाशक, मल को रोकने वाली, सन्धानकारक और रुचि को उत्पन्न करने वाली होती हैं। मगर इन्हें अधिक न खाना चाहिए।

6- पूरी-
पुष्टिकारक, वृष्य, बलवर्द्धक, अत्यन्त रुचिकारक, ग्राही, पाक में मधुर और त्रिदोषनाशक होती है। बाजार की पूरियाँ, इसके विपरीत बहुत ही नुकसानमन्द होती है।

7-कचौरी-
भारी, स्वादिष्ट, चिकनी और बलकारी होती है। पित्त और खून को बिगाड़ती है और आँखों की रोशनी को कम करती है। तासीर में गरम और बादी-नाशक है। अगर कचौरी घी में बनाई जाय, तो आँखों के लिए फायदेमन्द होती। है और रक्तपित्त का नाश करती है।

8- बड़े-
उड़द की पिट्ठी में नमक, हींग और अदरक मिला, तेल में पका, कर, जो बड़े बनाये जाते हैं, वह बलदायक, पुष्टिकारक, वीर्यवर्द्धक, वायुनाशक और रुचिकारक होते हैं। विशेष कर के लकवे के रोगियों को मुफीद, दस्तावर, कफ़कारी और जिनकी अग्नि प्रदीप्त है, उनको उत्तम होते हैं। मूंग के बड़े छाछ में भिगो कर सेवन करने से हलके और शीतल होते हैं, बल्कि संस्कार के प्रभाव से त्रिदोष नाशक और हितकारी होते हैं।

9-बड़ी-
उड़द की पिट्ठी में हींग, नमक और अदरख मिला कर कपड़े पर बड़ियाँ तोड़ कर सुखा लें। पीछे तेल या कढ़ी में डाल कर पकायें। इन बड़ियों में उड़द के बड़ों के समान ही गुण होते हैं।
पेठे की बड़ियाँ भी गुण में बड़ों के समान होती हैं। विशेषता यही है, | कि ये रक्त-पित्त-नाशक और हल्की होती हैं।

10- मूंग की बड़ियाँ–
रुचिकारक, हल्की और मूंग की दाल के समान गुण वाली होती हैं।

11-कढी–
पाचक, रुचिकारक, हल्की, अग्निप्रदीपक और कुछ-कुछ पित्त को कुपित करने वाली; कफ, बादी और मल के अवरोध को नष्ट करने वाली होती है।

12- पकौड़ी-
बेसन की पकौड़ियाँ बना कर जो कढ़ी में डाली जाती हैं, वे रुचिकारी, विष्टम्भी, बलदायक और पुष्टिकारक होती हैं।

13-बूंदी के लड्डू-
हल्के, ग्राही, त्रिदोषनाशक, स्वादिष्ट, रुचिकारक, आँखों को हितकारी, ज्वर-नाशक, बलदायक और तृप्तिकारक होते हैं।

14- मोतीचूर के लड्डू –
बलकारक, हल्के, शीतल, कुछ वायुकारक, विष्टम्भी, ज्वर-नाशक तथा रक्त-पित्त और कफ़-नाशक होते हैं।

15-जलेबी–
पुष्टिकारक, कान्तिकारक, बलदायक, धातुवर्द्धक, वृष्य, रुचिकारी और शीघ्र तृप्तिकारक होती है। इसको हाथ से बनाना ठीक है। हलवाइयों की जलेबियों में बहुत-से दोष होते हैं।

16- काँजी–
रुचिकारक, पाचक, अग्निदीपन करने वाली, पेट का दर्द, अजीर्ण और मल-बन्ध नाशक है और कोठे को अत्यन्त शुद्ध करने वाली है।

17- तिलकुट–
तिलों को कूट कर उसमें गुड़ आदि मिलाते हैं, उसे ही तिलकुट कहते हैं। तिलकुट मलकारक, वृष्य, वातनाशक, कफ और पित्तकर्ता, पुष्टिदायक, भारी, चिकना और पेशाब की अधिकता का नाश करने वाला है।

18-खील –
छिलकों सहित जो चावल भाड़ में भूने जाते हैं, उनको लाजा या खील कहते हैं। खीलें मीठी, शीतल, हल्की, अग्नि-प्रदीपक, मल और मूत्र को कम करने वाली, रूखी और बलदायक होती हैं; तथा पित्त, कफ, वमन (कृय होना), अतिसार, दाह, खून-फ़िसाद, प्रमेह, मेद और प्यास का नाश करती हैं।

19-बहरी-
भाड़ में भुने हुए जौ, धानी या बहुरी कहलाते हैं। बहरी बड़ी कठिनाई से पचने वाली, भारी, रूखी और प्यास को लगाने वाली होती हैं; लेकिन प्रमेह, कफ और वमन का नाश करती हैं।

20- हलुआ-
पुष्टिकारक, वृष्य, बलकारक, वात और पित्तनाशक, चिकना, कफकारक, भारी, रुचिकारक और अत्यन्त तृप्तिदायक होता है।

21- गेहूँ की रोटी –
बलकारक, रुचिकारक, पुष्टिकारक, धातु बढ़ाने वाली, वातनाशक, कफ़कारी, भारी और जिनकी अग्नि प्रदीप्त है, उनको हितकारी होती है।

22-बाटी–
पुष्टिकारक और वीर्यकारक है। पीनस, श्वास और खाँसी को आराम करती है।

23- जौ की रोटी–
रुचिकारी, मीठी, विशद, हल्की, मलकारक, वीर्यवर्द्धक, वातनाशक और बलकारी है। कफ-सम्बन्धी रोगों का नाश करती है।

24-बेढ़ई-
बलदायक, वृष्य, रुचिकारक, वातनाशक, गरम, तृप्तिदायक, भारी, पुष्टिकारक, अत्यन्त वीर्यवर्द्धक, मल-भेदक, मूत्र लाने वाली, दूध और मेद को बढ़ाने वाली, पित्त और कफकारक है। गुद-कील (गुदा के मस्से), अर्दित वायु या लकवा और श्वास आदि का नाश करती है।

25-पापड़
अंगारों पर भुना हुआ पापड़ अत्यन्त रुचिकारक, अग्निप्रदीपक, पाचक, रूखा और कुछ भारी है। यह गुण उड़द की दाल के पापड़ों के हैं।
मूंग के पापड़ों में भी यही गुण हैं। विशेषता यही है कि मूंग के पापड़ कुछ हल्के और रुचिकारक होते हैं।

( और पढ़ेभोजन करने के 33 जरुरी नियम )