(१) जो औषधि उत्तम देश में पैदा हुई हो, श्रेष्ठ दिन में उखाड़ी गई हो, थोड़ी-सी देने से भी बहुत गुण करने वाली हो, ज्यादा देने से नुकसान न करती हो, ऐसी औषधि, विचार-पूर्वक समय पर दी जाय, तो गुण करती है।

(२) विन्ध्याचल के आस-पास पैदा होने वाली दवाएँ तासीर में गर्म और हिमालय में होने वाली शीतल-स्वभाव होती है, यानी उनमें गर्मी का अंश अधिक होता है और इनमें शीतलता अधिक होती है। अपने रहने के स्थान से उत्तर दिशा की दवाएँ लेनी चाहिये। हिमालय हम लोगों के उत्तर में है, इसलिए जहाँ तक हो, हिमालय की दवाएँ संग्रह करनी चाहिए।

(३) जो औषधि सर्प की बॉवी, घूरे या मैले स्थान, श्मशान, अनूपदेश, ऊसर धरती या रास्ते में पैदा हुई हो, अथवा जिसमें कीड़े लग रहे हों अथवा जो गर्मी या सर्दी से व्याप्त हो-ऐसी औषधि न लेनी चाहिए क्योंकि वैसी औषधि से कोई लाभ नहीं होता।

(४) शरद् ऋतु में औषधियों में रस होता है, इस लिए सब कामों के लिए ऐसी ऋतु में औषधियाँ लेनी चाहिए; परन्तु वमन-विरेचन की दवाएँ वसन्तु ऋतु के मध्य में लेनी चाहिये।

(५) जिन वृक्षों की जड़ें बहुत मोटी हों, उनकी छाल-मात्र लेनी चाहिए; जिनकी जड़े छोटी और पतली हों, उनका सर्वांग लेना चाहिये। जैसे बड़, नीम आदि की छाल; विजयसार आदि का सार; तालीसपत्र आदि के पत्ते; त्रिफला आदि के फल लेने चाहिए।

(६) किसी की जड़, किसी का कन्द, किसी के पत्ते, किसी के फल, किसी के फूल, किसी का सर्वांग [सारे भाग], किसी का सार, किसी की छाल ली जाती है। याद रखो, चीते की जड़, जमीकन्द या सूरन का कन्द, नीम और अडूसे के पत्ते, त्रिफले के फल, धाय के फूल, कटेरी का सर्वांग [जड़, छाल, पत्ते सब], खैर का सारांश और दूध वाले वृक्षों की छाल ली जाती है। किसी समय अगर नीम के पत्ते नहीं मिलते, तो उसकी छाल ही ले ली जाती है। बेल का कच्चा फल और अमलताश का पका फल लिया जाता है।

(७) शास्त्र में कोई योग या नुसखा आप ऐसा लिखा देखें, जिसमें किसी औषधि का अंग स्पष्ट न लिखा हो, यानी अमुक औषधि की छाल, पत्ते, फल, फूल, सार प्रभृति क्या लिया जाय, तो जहाँ औषधि का अंग न लिखा हो, वहाँ आप उसकी जड़ लीजिए। जहाँ औषधि का वज़न न लिखा हो, कि अमुक औषधि तौल में इतनी लेनी चाहिये, वहाँ आप सब औषधियों को बराबर-बराबर ले लो। जहाँ पात्र या बर्तन न लिखा हो, वहाँ आप मिट्टी का बर्तन लीजिये। जहाँ यह न लिखा हो, कि औषधि किस समय ली जाय, वहाँ आप प्रात:काल यानी सवेरा समझिये। द्रव्य न लिखा हो, वहाँ जल लीजिये।

(८) सभी कामों में नये पदार्थ लेने चाहिए; किन्तु बायबिडंग, पीपल, गुड़, चावल, घी, शहद, पान और कॉजी-ये सब पुराने ही अधिक गुणकारी होते हैं। इनको एक साल बाद पुराना समझना चाहिए।
नोट -* सुश्रुत में पुराने गुड़ के सम्बन्ध में लिखा है :
पित्तघ्नो मधुरः शुद्धो वातघ्नोऽसूकप्रसादनः।
स पुराणोऽधिक गुणो गुडः पथ्यतमः स्मृतः ॥

गुड़ ज्यों-ज्यों पुराना होता है अधिक गुण वाला और अति पथ्य होता जाता है। पुराना गुड़ रक्त को प्रसन्न करने वाला, वायुनाशक, पित्त-शान्तकर्ता, मधुर और शुद्ध होता है।

(९) सभी नुसखों में सूखे और नये पदार्थ लेना अच्छा है। अगर कोई चीज़ अभाव-वश गीली लेनी पड़े, तो जितनी लेनी हो उससे दूनी लेनी चाहिए। मगर कुछ दवाएँ ऐसी भी हैं जो सदा गीली ही ली जाती हैं, मगर दूनी नहीं ली जातीं; क्योंकि उनके गीली ही लेने की आज्ञा है। जिनके सूखी लेने की आज्ञा है, वही अगर गीली ली जाएँ, तो दूनी ली जाती हैं।
गिलोय, कुड़ा [कुरैया], अडूसा, पेठा, शतावर, असगन्ध, पियाबाँसा, सौंफ और प्रसारिणी-ये नौ दवाएँ हमेशा गीली ही ली जाती हैं।
अडूसा, नीम, परवल, केतकी (केवड़ा), खिरेंटी, शतावर, सोंठ, कुड़ा, कन्द, गन्धप्रसारिणी, गिलोय, इन्द्र-वारुणी, नागबला, कटसरैया, गूगल और सौंफ-इन्हें गीली ले सकते हैं पर दूनी लेने की ज़रूरत नहीं।

(१०) घी, तेल, जल, क्वाथ, काढा या जुशाँदा, व्यंजन आदि आग पर तैयार करके शीतल हो जाने पर यदि फिर आग पर गर्म किए जाएँ, तो विष के समान हो जाते हैं; इसलिए इन्हें आग पर रख कर फिर दुबारा आग पर न रखो।

(११) अगर पुराने घी की ज़रूरत हो, तो आग पर पके हुए पुराने घी को मत लो। बिना पका पुराना घी उत्तम होता है। पका हुआ पुराना घी हीन-वीर्य यानी निकम्मा होता है। हाँ, तेल कच्चा हो या पका, पुराना अच्छा होता है।

(१२) वन से लाई हुई औषधियाँ एक वर्ष बाद गुणहीन हो जाती हैं। तालीस आदि चूर्ण दो मास बाद कमज़ोर होने लगते हैं, पर एकदम निकम्मे नहीं हो जाते । विजयादि गुटिका, खण्डकादि अवलेह बहुत समय बाद खराब होते हैं; परन्तु पुराने होते-होते गुण-रहित हो जाते हैं। कहा है, वर्षाकाल सिर पर हो कर निकल जाने से घृत-तैल आदि हीनवीर्य हो जाते हैं। जौ, गेहूँ, चना आदि एक साल बाद गुणहीन होने लगते हैं।
गुड़, आसव (कुमार्यासव आदि), सुवर्ण, चाँदी, राँगा, सीसा आदि धातुओं की भस्म, चन्द्रोदय आदि रस जितने पुराने होते हैं, उतने अधिक गुण वाले होते हैं। मतलब यह कि, ये जितने पुराने हों, उतने ही अच्छे हैं।

(१३) यदि आपको किसी रोग के नुसखे में ऐसी औषधि दीखे, जो रोगी के रोग को बढ़ावे, तो आप उसे नुसखों में से निकाल सकते हैं। यदि आपको किसी नुसखे में कोई हितकारी औषधि मिलानी हो तो आप मिला सकते हैं। इसमें कोई हरज नहीं, मगर यह काम आप तभी कीजिये, जबकि आप औषधि-तत्वज्ञ हों।

(१४) जो दवा आप नुसखे के लिए लें, उसे देख लिया करें कि, वह ठीक है या नहीं; क्योंकि आजकल नकली या जाली चीजें बहुत चल गई हैं। हमने काम में आने वाली और जिनमें जाली होने की सम्भावना होती है ।