बवासीर कैसे होता है ? इसके लक्षण ,प्रकार ,सावधानियाँ और उपाय

प्रश्न–(१) अर्श-रोग का प्रचलित भाषा में क्या नाम है ? अर्श किसे कहते हैं और वह कहाँ होता है ?
उत्तर- संस्कृत में जिसे अर्श कहते हैं, प्रचलित भाषा में उसे ही बवासीर कहते हैं। गुदा में जो मस्से हो जाते हैं, उन्हें ही अर्श या बवासीर कहते हैं। यह रोग गुदा की वलियों या आँटों में होता है।

प्रश्न-(२) अर्श रोग कितने प्रकार का होता है ?
उत्तर–छह प्रकार का-(१) वातज, (२) पित्तज, (३) कफज, (४) सन्नितपातज, (५) सहज और (६) रक्तज।

प्रश्न-(३) अर्श के सामान्य लक्षण क्या हैं ?
उत्तर-इस रोग में दस्त की कब्जियत रहती है, भोजन नहीं पचता, मल कड़ा हो जाता है, गुदा के आँटों में मस्से हो जाते हैं, उनसे कम और ज्यादा खून गिरता है।

प्रश्न–(४) क्या सन्निपातज और सहज बवासीर के लक्षण एक-से ही हैं ?
उत्तर–हाँ, जो लक्षण सन्निपातज अर्श के हैं, वही सहज या जन्म की बवासीर के हैं।

प्रश्न–(५) क्या पित्त की और रक्त की बवासीरों के कारण एक ही हैं ?
उत्तर–हाँ, जिन कारणों से खून की बवासीर होती है, उन्हीं कारणों से पित्त की बवासीर होती है।

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प्रश्न–(६) वातज, पित्तज, कफज, सहज और रक्तार्श के मस्सों में क्या भेद होता है ?
उत्तर-(क) वातज अर्श वाले के मस्से सूखे-से होते हैं। उनसे खून नहीं गिरता, पर एक तरह का दर्द होता है। मस्से काले, लाल, टेढ़े, कड़े, खरदरे, तीखे, फटे मुँह के और बेर, खजूर या कपास के फलों-जैसे होते हैं।
(ख) पित्तज अर्श वाले के मस्सों के मुख नीले, लाल, पीले और सफेदी लिये होते हैं। इनमें से महीन धार से खून चूता है और खून में बदबू आती है। मस्से महीन, कोमल और शिथिल होते हैं।
(ग) कफ़ज अर्श वाले के मस्सों की जड़ गहरी होती है। उनमें मन्दी-मन्दी पीड़ा होती है। मस्से कड़े, गोल, चिकने, भारी, कफ से लिहसे और मणि के समान चमकदार तथा करील या कटहल के काँटों-जैसे अथवा गाय के थन-जैसे होते हैं।
(घ) सहज अर्श वाले के मस्से कठोर, लाल रंग के या पीले-से होते हैं। और उनका मुख भीतर की ओर होता है।
(च) रक्तार्श या खूनी बवासीर वाले के मस्से चिरमिटी-जैसे लाल और बड़ के अंकुरों के समान होते हैं। इनसे गरम-गरम खून निकलता है।

प्रश्न-(७) बवासीर जब होने वाली होती है, तब उसके होने से पहले क्या लक्षण होते हैं ?
उत्तर–भोजन नहीं पचता, अग्नि मन्द रहती है, डकारें बहुत आती हैं, दस्त थोड़ा-थोड़ा होता है, उदर-रोग की शंका होती है, संग्रहणी या पीलिया के लक्षण भी नज़र आते हैं, इत्यादि

प्रश्न-(८) केवल गुदा में दोषों के कोप करने से बवासीर रोग होता है, फिर रोगी का सारा शरीर क्यों कमजोर और काला-सा हो जाता है ?
उत्तर-गुदा के आँटों में मस्से होने से पाँचों प्रकार की वायु, पाँचों प्रकार के पित्त और पाँचों प्रकार के कफ कुपित होते हैं, इसी से सारे शरीर में नाना प्रकार के दु:ख और कष्ट होते हैं।

प्रश्न–(९) कौन-सी बवासीर सहज में आराम हो जाती है ?
उत्तर-जो गुदा के बाहरी आँटे में होती है, जिसमें एक दोष का कोप पाया जाता है और जो एक साल से कम दिनों की होती है।

प्रश्न-(१०) क्या गुदा के दूसरे आँटे में और दो दोर्षों से होने वाला अर्श कठिनाई से आराम होता है ?
उत्तर–हाँ, एक साल का पुराना, दो दोषों से होने वाला और दूसरे आँटे में होने वाला अर्श बड़ी कठिनाई से नष्ट होता है।

प्रश्न–(११) कैसी बवासीर असाध्य होती है ?
उत्तर–दोनों दोषों से होने वाली, जन्म की और गुदा के अन्तिम या तीसरे आँटे में होने वाली बवासीर असाध्य होती है। जिस बवासीर में सूजन, मूर्च्छा और श्वास आदि उपद्रव होते हैं, वह भी असाध्य होती है।

प्रश्न–(१२) कैसी बवासीर वाला निश्चय ही मर जाता है ?
उत्तर-सूजन, अतिसार, वमन, शिथिलता, प्यास, ज्वर, अरुचि, गुदा का पकाव और हृदय में दर्द-ये लक्षण जिस बवासीर वाले में हों, वह नहीं जीता।

प्रश्न–(१३) डाक्टर लोग बवासीर के सम्बन्ध में क्या कहते हैं ?
उत्तर–डाक्टर कहते हैं, निकम्मे बैठे रहने, बार-बार दस्तावर दवा खाने, दस्त कब्ज रहने या मूत्रेन्द्रिय की तकलीफ अथवा घोड़े की बहुत सवारी करने से | गुदा के नीचे की खून बहाने वाली नस में गड़बड़ होने से बवासीर होती है।

प्रश्न–(१४) साधारण वैद्यों को इलाज के सुभीते के लिए बवासीर के कितने विभाग करने चहिए ?
उत्तर- दो- (क) बादी, और (ख) खूनी।

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प्रश्न–(१५) खूनी और बादी बवासीरों की क्या पहचान है ?
उत्तर-अगर मस्से सुर्ख हों, और उनसे खून गिरे, तो वह खूनी बवासीर है। अगर मस्सों में पीड़ा, खाज और सूजन बहुत हो, तो बादी की बवासीर है। दस्त की कब्जियत बवासीर का मुख्य लक्षण है। असल मतलब यह है, कि खूनी बवासीर में खून गिरता है और बादी में रोगी को पीड़ा होती है; पर खून नहीं गिरता।

प्रश्न–(१६) वह कौन से तीन रोग हैं, जो परस्पर एक दूसरे के कारण हैं ?
उत्तर–अतिसार, संग्रहणी और बवासीर-ये तीनों एक दूसरे को पैदा करने वाले हैं और तीनों ही गुदा में होते हैं।

प्रश्न–(१७) अतिसार, संग्रहणी और बवासीर-इन तीनों के होने के मुख्य कारण क्या हैं ?
उत्तर–अग्नि का मन्दा होना। अग्नि के बलवान होने से बवासीर आदि रोग नष्ट हो जाते या घट जाते हैं और अग्नि के मन्दी होने से बढ़ जाते हैं; अतः इन तीनों में अग्नि को बलवान करने वाले उपाय करने चाहिए।

प्रश्न-(१८) खूनी बवासीर में भी गुदा से खून गिरता है और रक्तातिसार में भी गुदा से खून गिरता है; फिर कैसे जाना जाय कि यह रक्तातिसार है या खूनी बवसीर ?
उत्तर-खूनी बवासीर गुदा की वलि या आँटे में होती है और रक्तातिसार क्षुद्र आँत में होता है। खूनी बवासीर में लाल-लाल मस्से होते हैं, वह रक्तातिसार वाले के नहीं होते। रक्तातिसार में प्रायः मल के साथ खून गिरता है; किन्तु खूनी बवासीर में मल के पहले या पीछे खून गिरता है। बवासीर में मल के साथ खून बहुत कम गिरता है। दोनों रोगों के खून में ज्यादा फर्क नहीं होता, फिर भी बवासीर का खून चमकदार और खूब सुर्ख होता है।

प्रश्न-(१९) बवासीर के इलाज में वैद्य को विशेष कर किस बात का ख्याल रखना उचित है ?
उत्तर–कह चुके हैं, अतिसार, संग्रहणी, और बवासीर, इन तीनों का मुख्य कारण मन्दाग्नि है। जब अन्न अच्छी तरह नहीं पचता, उसका पृथक्करण नहीं होता, तभी बवासीर होती है। इसलिए वैद्य को वही काम करने चाहिये, जिनसे मेदा बलवान हो, भूख बढ़े और दस्त साफ होता रहे।

प्रश्न-(२०) बवासीर के इलाज में कौन-कौन से उपाय करने होते हैं ?
उत्तर-औषधि खिला कर अग्नि तेज करनी होती है। नश्तर से, क्षार से, लेप से, धूनी से, बफारे से अथवा ऐसे ही और उपायों से मस्सों को गलाते या गिराते हैं।

प्रश्न–(२१) मस्से गिराने के उत्तमोत्तम उपाय क्या हैं ?
उत्तर—(क) वृहत् कासीसादि तैल’ मस्सों पर लगाओ या उँगली में लगा कर मस्सों तक पहुँचाओ अथवा इसी तेल की पिचकारी दो। इस तेल से गुदा के आँटे खराब नहीं होते और मस्से मुरझा जाते हैं।
(ख) परीक्षित लेपों में से कोई-सा लेप करो अथवा बफारा दो या धूनी दो।
(ग) अगर किसी तरह मस्सा न गिरे, तो ‘प्रतिसारणीय क्षार’ से मस्सा गिराओ। पर यह उपाय आखिरी है; क्योंकि इससे मस्से निश्चय ही नष्ट हो जाते : हैं, पर कष्ट होता है।

प्रश्न–(२२) साधारण तौर से खूनी बवासीर में क्या करना चाहिये ? ।
उत्तर—(क) नागकेशर ६ माशे, मिश्री ६ माशे और नौनी घी ९ माशे मिला कर सात दिन खाओ। अगर पुराना रोग हो, तो ज्यादा दिन खाओ।
(ख) ज़मीकन्द का भुरता दही में मिला कर खाओ।
(ग) सवेरे ही बकरी का दूध पियो।
(घ) माठे में पीपल का चूर्ण मिला कर खाओ।
(ङ) नीम की निबौली, कलमी शोरा, रसौत, एलुआ और हरड़-इनको । एक-एक तोले ले कर, मूली के रस में घोट कर जंगली बेर-समान गोलियाँ बना लो। इन गोलियों के खाने से एक दिन में ही खून बन्द हो जाता है और बादी बवासीर एक मास में आराम हो जाती है। परीक्षित है।
(च) नीम की निबौली, बकायन के फल, रसौत, शोधी हुई गगूल, बड़ी हरड़ का छिलका-इन पाँचों को २-२ तोले लो, बड़ी पीपर १ तोले लो, गुलाब के फूल ६ माशे लो और सनाय ६ माशे लो। सबको पीस-कूट और छान कर शेष में शोधी गूगल को मिला दो और खरल में डाल कर ‘त्रिफले के काढ़े’ से घोटो।
घुट जाने पर, १-१ माशे की गोलियाँ बना लो। हर दिन रात को सोते समय दो गोलियाँ खा कर गरम दूध पी लो। इससे बवासीर की सारी शिकायतें रफ़ा हो जाती हैं। परीक्षित है।