कैंसर से जुडी महत्वपूर्ण जानकारी : सत्य एवं भ्रांति (Cancer in Hindi)

कैंसर शब्द बड़ा ही भयानक शब्द है । नाम सुनते ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। कैंसर को एक लाइलाज रोग माना जाता है। जनसामान्य की कैंसर के बारे में जानकारी नगण्य है और इसी नगण्य जानकारी की वजह से कैंसर को असाध्य और खतरनाक रोग समझ लिया गया है। आम आदमी को यह जानना आवश्यक है कि कैंसर एक रोग नहीं बल्कि अनेकानेक रोगों का एक समूह है। शरीर में जैसे अन्य अनेक रोग होते हैं, उसी प्रकार कैंसर है।

कैंसर क्या है, इससे इतना डर क्यों लगता है ? :

सभी जीवित प्राणी आदि का निर्माण कोशिकाओं से होता है। कई कोशिकाएँ मिलकर एक ईकाई की तरह कार्य करती रहती हैं। कोशिकाओं का विभाजन होना, नई कोशिकाएँ बनना यह नियमित तरीके से होता रहता है। परंतु जब कोई कोशिका अनियमित तरीके से बढ़नी शुरू हो जाए तो इस कोशिका द्वारा कैंसर की संभावना बनती है। कोशिकाओं में जब गुणसूत्रीय बदलाव आता है तो इनकी वृद्धि अनियंत्रित हो जाती है और इनमें विभाजन इतनी तीव्र गति से होता है कि इनकी संख्या बढ़ती जाती है और एक कोशिका गाँठ, अर्बुद या रसोली का रूप ले लेती है। दूसरे शब्दों में कैंसर कोशिकाएँ अमरत्व प्राप्त कर लेती हैं।

इन कोशिकाओं का शरीर के लिए कोई उपयोग नहीं होता है। कैंसर की कोशिकाओं में परजीविता का गुण होता है। कैंसर ग्रसित मनुष्य को भोजन मिले न मिले कोई फर्क नहीं पड़ता है मगर कैंसर की कोशिकाएँ अपनी वृद्धि के लिए आवश्यक पोषण पोषित अंगों से प्राप्त करती रहती है आक्रमण कर उन्हें नष्ट करने लगती हैं। इससे डर लगने का कारण आधुनिक चिकित्सा के इलाज से है, आधुनिक चिकित्सा के पास इसका उपचार खर्चीला, पेचीदा व भययुक्त है।

कैंसर के मुख्य प्रकार क्या है ? :

कैंसर मुख्यतः चार तरह का हो सकता है –

  1. यदि कैंसर की शुरुआत उपकला उत्तक या कोशिकाओं (एपिथीलियल टिश्यू) से होती है तो यह कारसीनोमा (carcinoma) कहलाता है। उपकला कोशिकाएँ त्वचा, स्तन, फेफड़े, मुख, गर्भाशय, ग्रीवा, मलाशय आदि में पाई जाती है।
  2. संयोजी उत्तक (मिजोथीलियम) जैसे हड्डियाँ,मांसपेशियाँ, तंतु आदि से उत्पन्न कैंसर को सारकोमा (Sarcoma) कहते हैं।
  3. जब कैंसर रक्त निर्माण करने वाली ईकाई, कोशिका या लिम्फ ग्रंथियों से होता है, उसे ल्यूकेमिया या लिम्फोमा कहते हैं। यह अस्थि मज्जा, मुँह, गला, रक्त आदि में होता है।
  4. कभी-कभी सामान्यतः भ्रूण में पाई जानेवाली कोशिकाएँ जन्म के पश्चात भी बनी रहती हैं। यह कैंसर वंशानुगत होता है जिसे ‘टेराटोमा’ कहते हैं।

हर स्वरूप के कैंसर का व्यवहार भिन्न-भिन्न होता है। कुछ कैंसर रोग तेजी से फैलते हैं तो कुछ कैंसर रोग स्थानीय होते हैं, जो कि अपने ही क्षेत्र तक सीमित रहते हैं।

कैंसर क्यों होता है ? कैंसर होने के क्या कारण है :

कैंसर रोग कोई महीने या दो महीने की प्रक्रिया नहीं है, यह वर्षों की प्रक्रिया के बाद अपना प्राथमिक रूप तैयार करता है। मनुष्य में कैंसर क्यों होता है। यह निश्चित रूप से कहना कठिन है, फिर भी इसके कई कारण हो सकते हैं जिनमें –

  • वातावरणीय बदलाव,
  • प्रदूषण,
  • अप्राकृतिक रहन-सहन व जीवनशैली,
  • रसायनों का अधिक प्रयोग,
  • गुण सूत्रिय परिवर्तन
  • किसी बीमारी गाँठ या मस्से का लंबे समय तक रहना आदि हो सकता है।

कैंसर मूलतः गुणसूत्रों की असमान्यताओं के कारण होनेवाला रोग है। सामान्य कोशिकाओं में कुछ ऐसे भी गुणसूत्र होते हैं, जो शरीर में होनेवाली गाँठ या ट्यूमर को बनने से रोकते हैं। इन गुणसूत्रों में कैंसर प्रतिरोधी जीन पाए जाते हैं, जो कि शरीर में कैंसर जैसे रोग को निष्क्रिय रखते हैं। जब ये गुणसूत्र निष्क्रिय हो जाते हैं तो शरीर में कैंसर कोशिकाएँ तेजी से बढ़ने लगती हैं और शरीर के किसी भी हिस्से में गांठ या अर्बुद बनने लगता है। चूँकि इन कोशिकाओं पर गुणसूत्र का नियंत्रण नहीं रहता है तो इन कोशिकाओं की वृद्धि अनियंत्रित हो जाती है। गुणसूत्र में कैंसर जीन को ‘आनकोजीन’ कहते हैं।

आनकोजीन के सक्रिय होने के क्या कारण है ? :

आनकोजीन कई कारणों से सक्रिय हो सकते हैं –

  • इसमें मानसिक स्थिति,
  • किसी गाँठ या रोग का लंबे समय तक रहना,
  • कैंसर युक्त माहोल में रहना,
  • रसायनों का अधिक प्रयोग,
  • तंबाकू, धूम्रपान, मदिरा आदि से कोशिकाओं के व्यवहार में परिवर्तन आ जाता है,

परिणास्वरूप कभी-कभी आनकोजींन सक्रिय हो जाते हैं। (5 प्रतिशत गाँठे ही कैंसर की होती हैं।)

कैंसर होने का शक कब करें ? :

  • दीर्घकालीन पाचन संबंधी समस्याएँ कब्ज, अपच, पाइल्स आदि लंबे समय तक बने रहना और अचानक शौचकी आदत में बदलाव।
  • लगातार कफ आना तथा स्वर में परिवर्तन, कभी कभी कफ के साथ रक्त आना।
  • शरीर का कोई भी घाव जो भर नहीं रहा हो और उसमें परिवर्तन नजर आ रहे हों, लगता हो जैसे वह घाव बढ़ रहा है।
  • किसी गाँठ या मस्से में परिवर्तन व उसकी बढ़ोतरी।
  • असामान्य रक्तस्राव व निष्कासन ।
  • महिलाओं के मासिक धर्म का अनियमित व रजोनिवृत्ति के पश्चात रक्तस्रावव स्तन में गाँठ होना।
  • जल्दी थक जाना,
  • कमजोरी अनुभव करना,
  • भूख में कमी,
  • वजन में कमी,
  • मानसिक स्थिति में चिड़चिड़ाहट, झुंझलाहट आदि का होना,
  • सीने में दर्द या साँस लेने में तकलीफ,
  • त्वचा में छोटी-छोटी गाँठे होना या
  • पूर्ण त्वचा पर खाज, खुजली या त्वचा का लाल पड़ जाना।

कैंसर कि जांच कैसे कि जाती है ? :

ज्यादातर मरीजों में रोग की शुरुआत में ज्यादा लक्षण प्रतीत नहीं होते हैं और न ही शरीर में किसी प्रकार का दर्द होता है तथा रोग अंदर ही अंदर धीरे-धीरे बढ़ता रहता है। यदि कोई बीमारी ठीक नहीं हो रही हो तो कारण पता लगाना चाहिए कि वह क्यों ठीक नहीं हो रही है।

कैंसर का पता मैमोग्राफी, सी. टी. स्कैन, एम. आर.आई., बायॉप्सी, खून की जाँच आदि द्वारा पता लगाया जा सकता है।

कैंसर का उपचार कैसे किया जाता है ? :

आधुनिक चिकित्सा पद्धति के पास शल्य क्रिया, रेडियोथेरपी, कीमोथेरपी, हार्मोन चिकित्सा, अस्थिमज्जा प्रत्यारोपण, इम्यूनथेरपी, जीन थेरपी आदि प्रचलित विधियाँ हैं।

1). शल्य चिकित्सा – शल्य चिकित्सा में कैंसरग्रस्त भाग को पूर्णतः बाहर कर दिया जाता है ताकि कैंसर बढ़ने नहीं पाए और नया कैंसर न बनें ।

2). विकिरण चिकित्सा व कीमोथेरपी – विकिरण चिकित्सा में कैंसर कोशिकाओं को विकिरण देकर नष्ट किया जाता है, जिनमें कोबाल्ट 60, लीनियर एक्सीलेटर मशीन, ब्रेकिथेरपी, स्टीरियोटॅक्टिक थेरपी, थ्रीडी कन्फॉर्मल थेरपी व कीमोथेरॅपी। कीमोथेरपी एक इंजेक्शन है, जिसे संपूर्ण शरीर में पहुँचाकर कैंसर कोशिकाओं को नष्ट किया जाता है। विकिरण चिकित्सा व कीमोथेरपी कैंसर कोशिकाओं के साथ-साथ कुछ हद तक स्वस्थ कोशिकाओं को भी नुकसान पहुंचाती है, जिससे रक्त में श्वेत रक्त कणिकाओं की संख्या घटने लगती है, फलस्वरूप रोगी के बाल झड़ने, कब्ज, खुश्की, पेट में जलन, शरीर में तड़पन, जी मितलाना, चक्कर आदि समस्याएं उत्पन्न होने लगती हैं।

3). प्राकृतिक चिकित्सा – प्राकृतिक चिकित्सा उपचार से शरीर में जीनीय परिवर्तन पैदा किए जा सकते हैं, जिससे कैंसर कोशिकाओं का बढ़ना रुक जाए। प्राकृतिक चिकित्सा द्वारा शरीर से विषैले गंदे विजातीय पदार्थों को बाहर निकालने में सहायता मिलती है। जब शरीर से गंदे व विषैले पदार्थ बाहर निकलने लगते हैं तो स्वतः ही नई स्वस्थ कोशिकाओं का जन्म होता है और अंतःस्रावी ग्रंथिओं को हार्मोन स्रावित करने में मदद मिलती है, जिससे कि गुणसूत्र में पाए जानेवाले गुणसूत्र विरोधी जीन सक्रिय होने लगते हैं।

कैंसर बचाव में आहार की अहम भूमिका होती है, यदि आहार में जीवित पदार्थों का सेवन किया जाय तो कैंसर विरोधी जीनों को सक्रिय किया जा सकता है, जिनमें-

  • अंकुरित अनाज,
  • ज्वारे का रस,
  • फल व कच्ची सब्जी,
  • तुलसी,
  • गिलोय,
  • आंवला,

आदि का यदि रोगी पूर्ण पालन करे तो ७० प्रतिशत तक संभावना है कि कैंसर की कोशिकाएँ बढ़ने से रुक जाएँ।

महत्त्वपूर्ण जानकारी :

कैंसर गुणसूत्रों में बदलाव के कारण होता है। मानव के गुणसूत्रों में कोई तीन अरब जीन के जोड़े हैं, इनमें से करीब 1 लाख सक्रिय होकर मनुष्य की संरचना को विकसित व क्रियान्वित रखते हैं। इनमें से 1 जीन कैंसर विरोधी होता है, इन सब जीनों का नियंत्रण मस्तिष्क व अंतःस्रावी ग्रंथियों के पास होता है। जब किसी वजह से अंतःस्रावी ग्रंथियाँ व मस्तिष्क के न्यूरान्स सही ढंग से कार्य नहीं कर पाते हैं तो कभी-कभी कैंसर विरोधी जीन निष्क्रिय हो जाता है। यदि नियमित अभ्यास में 1 घंटा प्रतिदिन ध्यान को दिया जाए तो यह सभी जीनों के सक्रिय होने में मदद देता है, चाहे आप स्वस्थ हों या अस्वस्थ हों। 1 घंटे का ध्यान आपको आशातीत लाभ पहुँचाएगा। ध्यान के दौरान मस्तिष्क से निकलनेवाली अल्फा तरंगें शरीर में घूमकर गुणसूत्रों को संतुलित रखती हैं वह हमारी जीवनशक्ति को बढ़ाती हैं।
यह निश्चित है कि पूर्ण प्राकृतिक जीवन ही आपको कैंसर जैसे रोग से मुक्ति दिला सकता है।

कैंसर से जुड़े भ्रामक तथ्य :

  1. संक्रामक छुआ-छूत।
  2. आहार, व्यायाम से इसका कोई संबंध नहीं है।
  3. कैंसर का मतलब मौत निश्चित है अब इसका कोई उपचार नहीं है आदि।
  4. कैंसर का उपचार कष्टदायक है।
  5. कैंसर अन्य रोगों से खतरनाकरोग है।
  6. कैंसर में मस्तिष्क का कोई स्थान नहीं है।
  7. कैंसर का उपचार केवल विकसित राष्ट्रों में ही उपलब्ध है।

कैंसर से संबंधित सही तथ्य :

  1. कैंसर सिर्फ कोशिकाओं का रोग है, यह संक्रामक नहीं है।
  2. पोषण, व्यायाम, प्राणायाम, सफाई व सकारात्मकता चिकित्सा के मुख्य घटक हैं।
  3. कैंसर को ठीक किया जा सकता है व स्वस्थ जीवन बिताया जा सकता है।
  4. कैंसर का उपचार कतई कष्टदायक नहीं है।
  5. कैंसर अन्य रोगों की तरह ही एक रोग है।
  6. जो कुछ भी शरीर के साथ होता है वह मस्तिष्क को प्रभावित करने की क्षमता रखता है, इसलिए कैंसर रोग में मस्तिष्क की अहम भूमिका है।
  7. कैंसर का उपचार कई प्राकृतिक चिकित्सालयों में उपलब्ध है तथा सरकार एवं संस्थाओं की ओर से भी ये सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं।

कैंसर अधिकाशत: कब होता है ? :

कैंसर अधिकाशतः 40 वर्ष के पश्चात ही शुरू होता है। भारत में मुँह व स्तन कैंसर की संख्या अधिक है, इसके बाद फेफड़े, आमाशय, यकृत, मलाशय, रक्त कैंसर आदि में होता है। भारत में मुँह का कैंसर गुटखा, तंबाकू की वजह से अधिक पाया जाता है।

कैंसर रोग में क्या सावधानी बरतनी चाहिए ? :

  • रोग होने न पाए इसलिए अपना आहार प्राकृतिक वातावरण खुला व ऑक्सीजन युक्त हो।
  • समय-समय पर प्राकृतिक चिकित्सा द्वारा अपने शरीर की सफाई कराते रहना चाहिए ताकि शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बनी रहे ।
  • समय-समय पर फलाहार व रसाहार उपवास लाभकारी हैं ताकि शरीर व मन को विश्राम मिल सके।

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