चमेली के औषधीय गुण, फायदे और उपयोग – Chameli ke Aushdhiy Gun, Upyog aur Fayde

Last Updated on January 12, 2023 by admin

चमेली क्या है ? : 

पूरे भारत में चमेली की बेल आमतौर पर घरों और बगीचों में लगाई जाती है जिसके फूलों की खुशबू बड़ी मादक और मन को प्रसन्न करती है। उत्तर प्रदेश के फर्रूखाबाद, जौनपुर और गाजीपुर जिले में इसे विशेषतौर पर अधिक मात्रा में उगाया जाता है। सुपरिचित बेल होने के कारण सभी लोग इसे पहचानते हैं। चमेली के फूल सफेद रंग के होते हैं। लेकिन किसी-किसी स्थान पर पीले रंग के फूलों वाली चमेली की बेलें भी पायी जाती हैं। चमेली के फूल, पत्ते तथा जड़ तीनों ही औषधीय कार्यों में प्रयुक्त किये जाते हैं। इसके फूलों से तेल और इत्र (परफ्यूम) का निर्माण भी किया जाता है।

चमेली का विभिन्न भाषाओं में नाम :

संस्कृतसौमनस्यायनी
हिन्दीचमेली
मराठीचंबेली
गुजरातीचंबेली
अंग्रेजीजास्मीन
लैटिनजेस्मिनम मिल्टफ्लोरम

चमेली के औषधीय गुण (Chameli ke Gun)

  • रंग : चमेली के पत्ते हरे और फूल सफेद रंग के होते हैं।
  • स्वाद : इसका स्वाद तीखा और सुगन्धित होता है।
  • स्वरूप : चमेली की बेल वन, उपवन, बागों और पुष्प वाटिकाओं में पाये जाते हैं। इसकी कली लंबी डंडी की होती है और फूल सफेद रंग के होते हैं।
  • स्वभाव : इसकी प्रकृति ठण्डी होती होती है।
  • तुलना : चमेली की तुलना नरगिस से जा सकती है। 
  • चमेली के उपयोग से मन प्रसन्न रहता है।
  • इसके रस को पीने से वात और कफ दस्त के द्वारा बाहर निकल जाता है। 
  • यह शरीर को चुस्त-दुरुस्त करती है तथा वात और लकवा में लाभकारी है। 
  • इसकी सुगन्ध दिमाग को शक्तिशाली बनाती है। 
  • यह बालों को सफेद कर देती है।
  • इसके तेल का लेप लिंग पर करने से शीघ्रपतन दूर होता है।

सेवन की मात्रा : 

औषधि के रूप में चमेली की 10 ग्राम तक की मात्रा का उपयोग करना चाहिए।

विभिन्न रोगों में चमेली के फायदे और उपयोग (Chameli ke Fayde aur Upyog)

1. मुंह के छाले: चमेली के पत्तों को मुंह में रखकर पान की तरह चबाने से मुंह के छाले, घाव व मुंह के सभी प्रकार के दाने नष्ट हो जाते हैं।

2. मसूढ़ों के दर्द में: चमेली के पत्तों से बने काढ़े से बार-बार गरारे करते रहने से मसूढ़ों के दर्द में लाभ मिलता है।

3. त्वचा रोग:

  • चमेली के फूलों को पीसकर बनी लुगदी को त्वचा रोगों (जैसे दाद, खाज, खुजली) पर रोजाना 2-3 बार लगाने से त्वचा रोग ठीक हो जाते हैं।
  • चमेली का तेल चर्मरोगों की एक अचूक व चामत्कारिक दवा है। इसको लगाने से सभी प्रकार के जहरीले घाव, खाज-खुजली, अग्निदाह (आग से जलना), मर्मस्थान के नहीं भरने वाले घाव आदि अनेक रोग बहुत जल्दी ही ठीक हो जाते हैं।
  • चर्मरोग (त्वचा के रोग) तथा रक्तविकार से उत्पन्न रोगों में चमेली के 6-10 फूलों को पीसकर लेप करने से बहुत लाभ मिलता है।

4. नपुसंकता और शीघ्रपतन: चमेली के पत्तों का रस तिल के तेल को बराबर की मात्रा में मिलाकर आग पर पकाएं। जब पानी उड़ जाए और केवल तेल शेष रह जाए तो इस तेल की मालिश शिश्न पर रोजाना सुबह-शाम करना चाहिए। इससे नपुंसकता और शीघ्रपतन नष्ट हो जाता है।

5. खूनी बवासीर: चमेली के पत्तों का रस तिल के तेल की बराबर की मात्रा में मिलाकर आग पर पकाएं। जब पानी उड़ जाए और केवल तेल शेष रह जाए तो इस तेल को गुदा में 2-3 बार नियमित रूप से लगाएं। इससे खूनी बवासीर नष्ट हो जाती है।

6. मासिक-धर्म की रुकावट (नष्टार्तव) : चमेली के पत्ते, फूल व जड़ सभी को बराबर मात्रा में लेकर पानी में उबालकर काढ़ा बनाते हैं। इसे छानकर लगभग आधा कप की मात्रा में सुबह-शाम पीना चाहिए। इससे नष्टार्तव (मासिक धर्म की रुकावट) नष्ट हो जाता है।

7. सिर दर्द: चमेली के फूलों का लेप या चमेली का तेल कपाल (मस्तक) पर लगाएं और थोड़ी मालिश करने से सिर दर्द दूर हो जाता है।

8. आंखों का दर्द: आंखों को बंद करके ऊपर से चमेली के फूलों का लेप करने से आंखों के दर्द में आराम मिलता है।

9. वात विकार: चमेली की जड़ का लेप या चमेली का तेल पीड़ित स्थान पर लगाने से वात विकार में लाभ मिलता है।

10. कान से पीप आना: कान में यदि दर्द और पीप निकलता हो तो चमेली के 20 ग्राम पत्तों को 100 ग्राम तिल के तेल में उबालकर तेल की 1-1 बूंद दिन में तीन बार डालने से लाभ मिलता है।

11. डिप्रेशन (मानसिक तनाव): चमेली डिप्रेशन की गुणकारी औषधि होती है।

12. नाक की फुंसियां : चमेली के फूल सूंघने से नाक के अन्दर की फुंसियां ठीक हो जाती हैं।

13. चमेली का तेल : चमेली के फूलों की खुशबू से दिमाग की गर्मी दूर होती है। चमेली का तेल बालों में लगाने से दिमाग में तरावट आ जाती है। तेल बनाने के लिए चमेली के फूलों की तह (परत) एक सूती कपड़े पर बिछाकर इस पर तिलों की पतली सी तह बिछा देते हैं। 2 दिन बाद छलनी से छानकर तिल अलग कर लेते हैं। दुबारा चमेली के फूलों की तह बनाकर फिर तिलों की तह बना लेते हैं। 2 दिन बाद दुबारा तिल को छान लेते हैं और तीसरी बार इसी प्रकार चमेली के फूलों और तिलों का सम्पुट देकर, 2 दिन बाद छानकर तिल निकालकर, इन तिलों का तेल निकाले। यह तेल सिर में लगायें और मालिश करें।

14. चर्म रोगों (त्वचा सम्बंधी रोगों): दांतों का दर्द, पायरिया, घाव और आंखों के रोगों में चमेली का तेल देने से लाभ होता है। यह रक्तसंचार बढ़ाकर स्फूर्ति देता है और मानसिक प्रसन्नता लाता है।

15. चेहरे की चमक: चमेली के 10-20 फूलों को पीसकर चेहरे पर लेप करने से चेहरे की चमक बढ़ जाती है।

16. आंख की फूली: चमेली के फूलों की 5-6 सफेद कोमल पंखुड़ियों को थोड़ी सी मिश्री के साथ खरल करके, आंख की फूली पर लगाने से कुछ दिनों में फूली कट जाती है।

17. पक्षाघात: पक्षाघात (लकवा), अर्दित आदि रोगों में चमेली की जड़ को पीसकर लेप करने तथा तेल की मालिश करने से लाभ मिलता है।

18. पेट के कीडे़: चमेली के 10 ग्राम पत्तों को पीसकर पीने से पेट के कीड़े निकल जाते हैं और मासिक धर्म (माहवारी) भी साफ होता है।

19. उपदंश:

  • 20 मिलीलीटर चमेली के पत्तों का रस और 125 मिलीग्राम राल के चूर्ण को मिलाकर रोजाना सुबह-शाम पीने से 15-20 दिन में उपदंश का नष्ट हो जाता है। पथ्य में सिर्फ गेहूं की रोटी, दूध, चावल और घी एवं चीनी का ही प्रयोग करना चाहिए।
  • चमेली के पत्तों के काढे़ से उपदंश के घाव धोने से लाभ होता है। इसके पत्तों का काढ़ा पेट के कीड़ों को खत्म करता है और इससे पेशाब खुलकर आता है।
  • चमेली के ताजे पत्तों का रस, गाय का घी और राल 20-20 मिलीलीटर मिलाकर पीने से पुराना उपदंश मिट जाता है।

20. बिवाई: चमेली के पत्तों के ताजा रस को पैरों की बिवाई (फटी एड़िया) पर लगाने से बिवाई (फटी एड़िया) ठीक हो जाती है।

21. कुष्ठ :

  • चमेली की नई पत्तियां, इन्द्रजौ, सफेद कनेर की जड़, करंज के फल और दारूहल्दी की छाल का लेप करने से कुष्ठ (कोढ़ को दूर करना) दूर होता है।
  • चमेली की जड़ का काढ़ा बनाकर सेवन करने से कुष्ठ (कोढ़) रोग में लाभ मिलता है।

22. बुखार: चमेली की पत्ती, आंवला, नागरमोथा, यवासा सभी को बराबर मात्रा में लेकर काढ़ा बना लें। इसमें गुड़ मिलाकर दिन में 2 बार 30 मिलीलीटर सेवन करने से बुखार के रोगी के अन्दर रुके हुए रोग जल्द ही दूर हो जाते हैं।

23. विस्फोटक (चेचक): विस्फोटक (चेचक) रोग में चमेली के 10-15 फूलों को पीसकर लेप करने से चेचक के दाने ठीक हो जाते हैं।

24. विसर्प (छोटी-छोटी फुंसियों का दल बन जाना): चमेली के पत्तों और फूलों को पीसकर विसर्प (सांप का काटना), विस्फोट (चेचक) और छाले पर लेप करने से लाभ मिलता है।

25. दांतों का दर्द :

  • दांतों में ज्यादा दर्द होने पर चमेली के पत्ते, मैनफल, कटेरी, गोखरू, लोध्र, मंजीठ तथा मुलहठी को बराबर मात्रा में लेकर पानी के साथ पीसकर लुगदी बना लें। लुगदी की मात्रा से चार गुना तेल और तेल से 4 गुना पानी मिलाकर सबको आग पर पकायें। जब पानी जल जाए तथा तेल शेष बच जाए तो उसे छान लें। रोजाना सुबह-शाम इस तेल को दांतों पर मलने से दांतों का दर्द खत्म हो जाता है।
  • चमेली की पत्तियों को बारीक पीसकर लुगदी बनाकर पीड़ित दांतों के बीच में दबाये रखते हैं। इससे दांतों का दर्द दूर हो जाता है।
  • दांत में दर्द होने पर चमेली के पत्ते चबाने से दर्द ठीक होता है।

26. बालों के रोग :

  • चमेली के पत्ते, कनेर, चीता तथा करंज को पानी के साथ लेकर पीस लें, फिर इनकी लुगदी के वजन से 4 गुना मीठा तेल और तेल के वजन से 4 गुना पानी और बकरी का दूध लें, इन सबको मिलाकर पका लें। जब थोड़ा तेल ही बाकी रह जाये तब इसे उतारकर छान लें। इस तेल को रोजाना सिर पर लगाने से गंजेपन का रोग मिट जाता है।
  • चमेली के तेल को सिर में लगाने से सिर-दर्द ठीक हो जाता हैं।

27. चेहरे के दाग : उंगुलियों के बीच का भाग सड़ जाने पर चमेली के पत्तों को पीसकर उंगुली के सड़े हुए भाग पर बांधने से लाभ होता है।

28. वमन (उल्टी): 10 मिलीलीटर सफेद चमेली के पत्तों के रस में 2 ग्राम कालीमिर्च का चूर्ण मिलाकर थोड़ी-थोड़ी देर में चाटने से उल्टी आना बंद हो जाती है।

29. मूत्ररोग: चमेली के पत्ते का रस निकालकर पीने से पेशाब के रोग दूर हो जाते हैं।

30. भगन्दर: चमेली के पत्ते, बरगद के पत्ते, गिलोय और सोंठ तथा सेंधानमक को गाढ़ी छाछ के साथ पीसकर भगन्दर पर लगाने से भगन्दर ठीक हो जाता है।

31. गिल्टी (ट्यूमर): चमेली की छाल और गन्दे विरोजा को साथ-साथ पीसकर लेप करने से गिल्टी नष्ट हो जाती है।

32. योनि की जलन और खुजली: चमेली के तेल में कपूर को मिलाकर योनि पर लगाने से योनि की खुजली मिट जाती है।

33. दाद के रोग में: पैर के दाद में या किसी भी प्रकार के त्वचा सबंधी रोगों में चमेली के पत्तों को पीसकर लेप करने से फायदा होता है।

34. फीलपांव (हाथीपॉव): चमेली के तेल में नीबू के रस को मिलाकर पीड़ित अंग की मालिश करने से लाभ मिलता है। चमेली का तेल खुजली, छाजन और शीतपित्त आदि त्वचा रोगों में लाभ पहुंचाता है।

35. तुण्डिका शोथ (टांसिल) : 3 ग्राम जीरी और 2 ग्राम गेरू को एक साथ पीसकर पानी के साथ गले पर लेप करने से गले की सूजन और दर्द दूर हो जाता है।

36. गट्ठे (गांठे) बनने पर: चमेली के पत्तों को पीसकर उसका ताजा रस गांठ पर लगाने से या उसे पीसकर उसके चूर्ण को गांठ पर बांधने से गांठ धीरे-धीरे पूरी तरह से ठीक हो जाती है।

चमेली के दुष्प्रभाव (Chameli ke Nuksan)

 चमेली का अधिक मात्रा में उपयोग  करने से गर्म स्वभाव वालों के लिए सिर दर्द में दर्द उत्पन्न हो सकता है।

नोट : चमेली के उपयोग से होने वाले सिर दर्द को दूर करने के लिए गुलाब का तेल और कपूर का तेल उपयोग में लाना चाहिए।

दोषों को दूर करने वाला : बनफ्शाऔर गुलाब के फूल चमेली के हानिकारक प्रभाव को दूर करते हैं।

(अस्वीकरण : दवा, उपाय व नुस्खों को वैद्यकीय सलाहनुसार उपयोग करें)

Leave a Comment

error: Alert: Content selection is disabled!!
Share to...