गर्भवती महिला के आहार संबंधी जरुरी बातें | Diet During Pregnancy

गर्भवती महिला का आहार : Garbhvati Mahila ka Aahar in Hindi

pregnant women ko kya khana chahiye –

बच्चा होने वाला है यह खबर मिलते ही सबसे पहले माँ का उत्तम पोषण कैसे होगा, इसके बारे में गंभीरतापूर्वक सोचना चाहिए। इसके लिए माँ के आहार में ज्यादा-से-पोषण मूल्य होने चाहिये, यह तो स्पष्ट है क्योंकि गर्भ का पोषण पूरी तरह से माँ पर निर्भर करता हैं ।

ज्यादातर सुबह जी मिचलाना, उल्टियाँ होना, खाने के पदार्थों की गन्ध सहन न होना, इस सबका परिणाम गर्भवती पर अच्छा नहीं होता।। बहुत कम खाना खाया तो शरीर में पहले से ही जो ऊर्जा होती है, उसका इस्तेमाल किया जाता है। उससे शरीर की जरूरत पूरी की जाती है, किंतु इससे शिशु का पोषण नहीं होता और माँ का वजन भी कम होने लगता है। कमजोरी आती है। इस वक्त उल्टियाँ, जी मिचलाना आदि होता है। इस समय डॉक्टर की सलाह से दवाइयाँ लेना आवश्यक है। उसके लिये कम खाना, खाली पेट रहना उपाय नहीं है। कई बार इसी कारण दूध, पानी, फलों का रस ऐसे द्रवयुक्त पदार्थ शरीर में कम जाते हैं और उल्टियों द्वारा बाहर आते हैं। अगर ऐसा बहुत दिन चलता रहा तो गर्भजल पहले से ही कम होता है। यह परिस्थिति सातवें-आठवें माह में हानिकारक होती है। इसलिए जी मिचलाना, उल्टियाँ, भूख न लगना आदि समस्याओं का उपचार तुरन्त करें।

गर्भवती स्त्री यानी दो जीवों की देखभाल तथा पोषण ! ऐसा कहा जाता है। माँ और शिशु का पोषण सही तरीके से हो, इतना आहार तो लेना ही चाहिए। क्योंकि केवल गर्भ या शिशु का पोषण करना और उसे जन्म देना ही माँ का कर्तव्य नहीं है बल्कि आगे चलकर कम-से-कम-से-कम साल–भर तक शिशु को दूध पिलाने के लिए माँ का आहार पोषक होना ही चाहिये।

दिन में कम-से-कम बार कुछ-न-कुछ खाना और दो बार दुध पीना जरूरी है। चार बार खाने में दो बार नाश्ता (सुबह शाम) / शाम शामिल है। नाश्ते में विभिन्न व्यंजन ले सकते हैं। उसमें उपमा, हलवा, थालीपीठ, डोसा, इडली, धिरडे, आप्पे, पिठा, कभी-कभी सैंडविच आदि। लेकिन जो भी खायें, वह गरम और ताजा हो। धनिया, नारियल जिसमें डाल सकते हों, उसमें डालें। क्योंकि कम मात्रा में लगने वाले पोषण तत्व उसमें से मिलते हैं।

जिन्हें ज्यादा जलन, जी मिचलाना, उल्टी जैसी तकलीफ ज्यादा होती हो, वे बेकरी के पदार्थ, खमीर वाले (डोसा/इडली) व्यंजन कम खायें या न खायें तो बेहतर हैं।

सुबह उठने के बाद और सोते समय कम-से-कम दो बार दुध पियें। उसमें भी सुबह का दूध पूरा कप या गिलास एक-साथ पीने के बजाय थोड़ा थोड़ा करके पियें तो उल्टियों की समस्या कम होती है। रात के दूध में शतावरी कल्प जैसी औषधि डालने से ताकत बढ़ेगी और प्रसव के बाद दूध ज्यादा आने में भी मदद होगी।

पहले तीन माह में आहार में दूध, घी, मक्खन की मात्रा ज्यादा हो। सुबह नाश्ते में दूध, चावल खायें। अलग-अलग प्रकार की खीर बनाकर खायें तो भी अच्छा है।

खाने में पूरा आहार लेना चाहिये। सभी प्रकार की दालें, गेहूँ, चावल, दलहन (जैसे मटकी, हरे मुँग, चवली आदि), फल शाक, हरी सब्जी, सलाद, छाछ आदि का समावेश हो। सभी पौष्टिक चीजों का समावेश अवश्य हो।

दाल, चावल, घी, नींबू, कभी-कभी गीली या सूखी चटनी या कभी-कभी नीम का आचार, कभी-कभी भुना पापड़। एक हरी सब्जी, एक फलशाक, सलाद, रोटी, घी, एक कटोरी छाछ आदि पदार्थों का समावेश होगा तो माँ और शिशु दोनों का पोषण अच्छी तरह से होगा।

कभी-कभी खाने में मीठा होगा तो भी चलेगा। सिर्फ वह मौसम के अनुसार होना चाहिए, तो तकलीफ नहीं होगी। मतलब धूप के मौसम में श्रीखंड, आम्रखंड, रसमलाई, ठंड में गुलाबजाम, गाजर का हलवा, गुड़ की रोटी, मूंग का हलवा, लौकी का हलवा और बारिश में सवैय्या, पुरणपोली, हलवा, बासुंदी (रबड़ी) आदि। जिस दिन खाने में मीठा होगा, उस दिन भोजन से पहले ही मीठा खायें इससे मीठा व्यंजन जल्दी हजम हो जायेगा।

रात का खाना जल्दी लेना चाहिए। खाने और सोने के बीच में कम-से-कम दो से ढाई घंटे का अन्तर होना चाहिए। सोने से पहले पाचनक्रिया लगभग पूरी हो जाने के कारण सीने में जलन, खाना गले तक आना आदि समस्याएं नहीं होतीं। रात का खाना हल्का हो। सलाद, रायता, मीठा रात को न लें।

खाना गरम ही खायें। रात को दही-छाछ न लें। कभी-कभी मौसम के अनुसार ज्वार, बाजरे की रोटी, खिचड़ी-कढ़ी खाने में कोई हर्ज नहीं।

कुछ गर्भवतियों को शौच के समय कठिनाई होती है। कभी-कभी बवासीर की समस्या भी होती है। कभी-कभी अखुए निकलना, दुखना, खुजलाना, जलन होना तथा खून निकलना आदि तकलीफें होती हैं। ध्यान रहे कि डॉक्टर की सलाह लिए बगैर कोई भी गोली या चूरन न लें, क्योंकि कभी-कभी गलत दवा लेने से गर्भस्राव, गर्भपात या अकाल प्रसव (premature delivery) की भी सम्भावना होती है। इसलिए इन सबका ध्यान रखना बहुत जरूरी है।

जिन स्त्रियों को चाय-कॉफी पीने की ज्यादा आदत है, तो दिन में 1 बार चाय/कॉफी लेने में कोई हर्ज नहीं, लेकिन इससे ज्यादा चाय-कॉफी लेने से परहेज करें।

फलों का रस सुबह दस बजे या दोपहर 4-5 बजे लें। फलों पर ऊपर से शक्कर न डाले। संतरा, मौसमी कई बार खट्टे होते हैं, उनकी वजह से खाँसी और जलन हो जाती है। अनार का रस विशेष गुणकारी है और उससे खून की मात्रा बढ़ती है। कभी-कभी नारियल पानी भी चलेगा। सब्जियों का रस लेने के बजाय उनका सूप बनाकर पीना अच्छा है। विशेषत: टमाटर, बीट, लौकी, हरी सब्जी, पालक आदि गाजर का उपयोग थोड़ा कम करें। सादे नमक के बजाय सैंधा नमक (उपवास में चलने वाला नमक) का इस्तेमाल करें।

जो स्त्री एक बार में ही सब नहीं खा सकती, वह दिन में 5-6 बार थोड़ा-थोड़ा करके खाये। तो उल्टियों की परेशानी कम होगी। दोपहर को एक फल खाने से शौच की तकलीफ नहीं होगी।

अनासा पपीता खाने से गर्भपात हो सकता है। इसलिए हमारे यहाँ गर्भकाल में ये फल वर्जित किये जाते हैं। अन्य फल जैसे चीकू, सेब, केला ये पूरे साल-भर चलने वाले फल खाएं। अंगूर, अनार, संतरा, मौसमी मीठे हों तो खायें। आम भी खा सकते हैं। आम से माँ और शिशु दोनों का वजन बढ़ेगा। आम का रस खाना हो तो उसमें घी या दूध डालकर खायें या पियें। उससे आम अच्छी तरह से हजम होगा।

सूखे फल (ड्राइफुट्स) खाना भी अच्छा है, लेकिन उसके लिए अपनी पाचन शक्ति अच्छी होनी चाहिए। क्योंकि ये सब चीजें पचने में भारी रहती हैं। बादाम और अखरोट बुद्धिवर्धक होने के कारण खाए जाएं। मुनक्का और अंजीर से खून की मात्रा बढ़ती है और इससे पेट भी साफ रहता है। मुनक्का रात में पानी में भिगोएं और सुबह खायें तो भी लाभ होता है। कभी-कभी काजू, जरदालु और पिस्ता भी खायें।

शाकाहारी लोगों के भोजन में दाल और दलहन से ही प्रोटीन्स मिलते हैं इसलिए उनकी मात्रा अधिक होनी चाहिए। प्रोटीन्स शरीर के लिए जरूरी है, लेकिन इसके बारे में आयुर्वेदीय दृष्टिकोण क्या है, यह भी समझ लेना चाहिए। दलहन वातवर्धक है अर्थात इससे शरीर में वात बढ़ता है और सूखापन बढ़ता है। इसलिए वह सावधानी से खायें। विशेषत: उसके छिलके ज्यादा तकलीफ देते हैं। दलहन भिगोकर उसमें अंकुर आने के बाद खाने से कम तकलीफ होती है। विशेषतः राजमा, उड़द, हरा-भरा, मटर यह ज्यादा समस्या उत्पन्न करते हैं। हरा मुंग सभी खा सकते हैं। जिन्हें पहले से ही पेट साफ होने की समस्या है, उनके लिए तो दलहन और अधिक कष्टप्रद है। वे लोग दलहन का सूप पी सकते हैं। कभी-कभी हरे मूंग और मोठ की घुघनी बनाकर खायें तो चलता है। घुघनी बनाते समय धनिया, जीरा, खोपरा, धने का इस्तेमाल अवश्य करें। उससे शरीर मे शुष्कता नहीं आती।

दाल की बात करें, तो अधिकतर लोगों के खाने में रोज तुहर और मूंग दाल का इस्तेमाल ज्यादा होता है। चना दाल कभी-कभी सब्जियों में और कभी बेसन के स्वरूप में खायी जाती है। उड़द, मोठ, मसूर, लोबिया आदि दालें ज्यादा खाई जाती हैं। दक्षिण भारत में उड़द दाल का इस्तेमाल ज्यादा होता है। ये सब प्रकार की दालें यदि सही मात्रा में खायें तो कुछ तकलीफ नहीं होती, परंतु जिनको जलन, उल्टियां या पित की पीड़ा है, वे तुहर और भिगोई हुई उड़द दाल न खायें। मूंग, मसूर या फिर दोनों मिलाकर बनायें। दाल में थोड़ा कोकम, लहसुन, मसालों का इस्तेमाल करें, लेकिन खट्टा और तीखा खाने से तबीयत बिगड़ती हो तो ऐसा खाना न खायें, बेहतर होगा।

तली हुई चीजें, तीखा, मसालायुक्त, चाट आदि कम खायें या फिर न खायें।

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