कितने घंटे सोना चाहिए :

साधारणतयः प्रत्येक स्वस्थ व्यक्ति के लिए 6 से 8 घण्टों की अटूट और गाढ़ी नींद पर्याप्त है। जिस प्रकार प्रत्येक प्राणी के लिए अन्न (भोजन) की मात्रा निर्धारित करना मुश्किल है, उसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति के लिए नींद का समय निर्धारण करना भी मुश्किल नहीं है। प्रायः ऐसा देखा जाता है कि एक मनुष्य अपनी नींद कुछ ही घण्टों में पूरी कर लेता है, जबकि दूसरे की कुम्भकर्णी नींद जल्दी टूटती ही नहीं । एक नवजात शिशु प्राकृतिक रूप से, प्रौढ़ व्यक्तियों की अपेक्षा अधिक देर तक सोता है क्योंकि उसकी शरीरवृद्धि के लिए उसकी जीवनीशक्ति को शान्त रूप से कार्य करने की अधिक आवश्यकता पड़ती है ।

साधारणतः एक छोटा बच्चा 15-16 घण्टों से कम नहीं सोता। जन्म के बाद से लेकर कई महीनों तक दुग्धपान करने वाले शिशु को 18 से 20 और कभी-कभी 22 घण्टे तक सोने की नितान्त आवश्यकता होती है। वृद्ध व्यक्तियों को, रोगियों को, प्रसूता स्त्रियों को और दुर्बल लोगों को अन्य लोगों की अपेक्षा अधिक निद्रा की आवश्यकता होती है। स्त्रियों को पुरुषों से अधिक सोना चाहिए तथा गर्भवती स्त्रियों को भी अधिक सोना चाहिए।

वैज्ञानिकों और चिकित्सकों ने जो विविध आयु वर्ग के लोगों के सोने के लिए समय (घण्टे) निर्धारित किए हैं, उसकी तालिका निम्न प्रकार है
kitna sona chahiye - अच्छी सेहत के लिए कितनी नींद जरूरी | How Much Sleep Do We Really Need?

विशेष –

आवश्यकता से अधिक सोना भी रोग को निमन्त्रण देना और आयु को घटाना है। इसी प्रकार बिना नींद पूरी किए बिस्तर छोड़ देना भी रोगों का कारण होता है। अत्यधिक सोने से शरीर में गुरुता (भारीपन) आता है और मेदवृद्धि होने लगती है तथा आलस्य और सुस्ती आती है। सोने के लिए अधिक समय की आवश्यकता पर विशेष ध्यान न देकर हमें गहरी नींद पर ध्यान देना चाहिए क्योंकि 4 घण्टे की गहरी नींद, 8 घण्टे की तन्द्रा से अधिक लाभप्रद एवं स्वास्थ्यवर्द्धक होती है।

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शयन स्थान और बिस्तर कैसा हो ? :

•सोने के स्थान में हमारी आयु का लगभग दो तिहाई भाग व्यतीत होता है, इसलिए उसका स्वच्छ व हवादार होना अत्यावश्यक है। यदि वह स्थान कोई कमरा हो तो उसको पर्याप्त बड़ा होना चाहिए तथा उसमें शुद्ध वायु एवं प्रकाश आने के लिए पर्याप्त खिड़कियाँ और रोशनदान होने चाहिए।

•सोने के कमरे में सामान भरा नहीं होना चाहिए। सोते समय कमरों के दरवाजों और खिड़कियों को बन्द नहीं करना चाहिए।

•सोते समय मनुष्य का मस्तिष्क (सिर) किस दिशा की ओर होना चाहिए ? इसके लिए भी शास्त्रीय विधान है।
मार्कण्डेय-स्मृति में लिखा है कि रात्रि को पूर्व तथा दक्षिण की तरफ मस्तक करके सोने से धन तथा आयुष्य की वृद्धि होती है। पश्चिम की तरफ सिर करके सोने से चिन्ता सताती | है और उत्तर दिशा की ओर सिर करके सोने से प्राणतत्त्व का क्षय होता है। इसलिए दक्षिण दिशा की ओर पैर और उत्तर दिशा की ओर सिर करके कभी भी नहीं सोना चाहिए।

•कोमल शैय्या जैसे-गद्दे-गद्दियों पर सोना स्वास्थ्य की दृष्टि से हानिकारक है,
विशेषकर बच्चों और बालकों के लिए जिनका शरीर विकास पर होता है, जिनकी नसों
और माँसपेशियों का संगठन हो रहा होता है, जिनके सीना का फैलाव अभी पूरा नहीं हुआ होता है तथा जिनका मेरुदण्ड सुदृढ़ और पूर्ण विकसित नहीं हुआ है। समत्व और कड़े बिस्तर, जैसे–चौकी (तख्त), भूमि आदि पर सोने से मेरुदण्ड सीधा रहता है और पेट तथा छाती के यन्त्रों को समुचित रीति से कार्य करने का अवसर मिलता है और साथ ही श्वास शुद्ध और गम्भीर चलती है।

•वैज्ञानिकों और प्रकृति उपासकों के मतानुसार-पृथ्वी पर सीधे शयन करना उत्तम है क्योंकि पृथ्वी के संयोग से, संस्पर्श तथा सम्पर्क से ही पृथ्वी पर रहने वाले सभी प्राणियों की जीवनीशक्ति की उपलब्धि होती है। पृथ्वी में समस्त रोगों को नाश करने की अद्भुत शक्ति होती है। यदि पृथ्वी पर बिना कुछ बिछाए सोना असुविधाजनक प्रतीत हो तो पृथ्वी पर कुशा से निर्मित आसन, चटाई अथवा पतली चादर डाल लेना चाहिए। जाड़ों की ऋतु में ठण्ड से बचने के लिए रजाई आदि का प्रयोग भी अवश्य करना चाहिए । गीली जमीन पर नहीं सोना चाहिए । रेत अथवा घास वाली जमीन पर सोना आरामदेह होता है। पृथ्वी पर सोते समय तकिया अलग से लगाना ठीक नहीं है, उस जगह की पृथ्वी को ही, सिर की ओर थोड़ा ऊँचा करके उस जगह से ही तकिया का काम लेना चाहिए।

•सोने का उचित समय-प्रकृति तो हमें सूर्योदय से सूर्यास्त तक काम करने तथा सूर्यास्त से सूर्योदय तक सोने का आदेश प्रदान करती है, परन्तु व्यावहारिक दृष्टि से शाम को 9 बजे तक सो जाना और प्रातः 4 बजे जग जाना सर्वोत्तम है। इस सम्बन्ध में एक अँग्रेजी कहावत बहुत प्रसिद्ध है-“Early to bed and early to rise, makes a man healthy, wealthy and wise.” ।

•गर्मियों के मौसम में-दिन में 15-20 झपकी ले लेना बुरा नहीं है, किन्तु अधिक सोना अवश्य हानिकारक है क्योंकि दिन में सोना शरीर में शिथिलता उत्पन्न करता है, पाचन क्रिया को दूषित करता है और शरीर को रोगी बनाता है।

•मध्य रात्रि यानि रात्रि के 12 बजे के पूर्व गाढ़ी नींद ले लेना बहुत ही लाभदायक है। क्योंकि विकारों को उत्पन्न करने वाले स्वप्न जंजाल को उत्पन्न करने वाला तथा चित्त में क्षोभ लाने वाला विकारों का समय विशेषकर मध्यरात्रि के बाद का ही समय होता है।

•शास्त्रों में जो ब्रह्ममुहूर्त में जाग उठने का आदेश-निर्देश हैं, उसका यही रहस्य है। सबेरे जल्दी उठने से आयु में वृद्धि होती है, दृष्टि तीव्र होती है, बुद्धि बढ़ती है तथा धन, यश और अक्षय स्वास्थ्य एवं सौन्दर्य की प्राप्ति होती है।

स्वप्न और स्वास्थ्य:

प्रायः यह देखा जाता है कि अधिक स्वप्न उन्हीं लोगों को दिखाई देते हैं, जिन्हें गहरी नींद नहीं आती। इससे पता चलता है कि अधिक स्वप्न देखना बीमारी का लक्षण है। इसी प्रकार एक ही दृश्य को बार-बार स्वप्न में देखना भी शरीर में किसी गुप्तरोग की उपस्थिति का सूचक है । विद्वान् चिकित्सकों ने स्वप्न के विषय में अन्वेषणों द्वारा पता लगाया है कि भिन्न-भिन्न प्रकार के रोगों से पीड़ित व्यक्ति प्रायः निर्दिष्ट प्रकार के ही स्वप्न देखते हैं।

उदाहरणार्थ-राजयक्ष्मा (ट्यूवर क्यूलोसिस) के रोगी को हवा में उड़ने का स्वप्न देखना स्वाभाविक है। हृदय रोगी को स्वप्न में प्रायः भीषण एवं भयानक दृश्य दिखाई देते हैं। निश्चित रूप से तो कह पाना मुश्किल है कि मनुष्य के सभी स्वप्नरोग के सूचक होते हैं, किन्तु यदि लगभग एक प्रकार का ही दृश्य बार-बार दिखाई पड़े तो यह उचित होगा कि ऐसे स्वप्न की उपेक्षा न करके अपने स्वास्थ्य की किसी सुयोग्य चिकित्सक से परीक्षा अवश्य करा ली जाए। हम किस प्रकार का भोजन करते हैं, इसका भी स्वप्न से गहरा रिश्ता है। गोश्त (मीट), मछली खाने वाले व्यक्ति अक्सर रेगिस्तान आदि में प्यास की तड़पन का दृश्य देखते हैं। इसी प्रकार से ठूसकर नाक तक भोजन करने वाले पेटू व्यक्ति को प्रायः ही बुरे स्वप्न दिखाई पड़ते हैं। यह भी देखा गया है कि परिश्रमी व्यक्ति प्रायः कम स्वप्न देखते हैं। इससे यह स्पष्ट है कि शारीरिक परिश्रम या व्यायाम स्वप्नों से मुक्त होने का एक सुन्दर, उचित व उत्तम उपाय है।

निद्रा और रोग निवारण :

विश्राम व शिथिलीकरण की भाँति ही निद्रा (नींद) भी आकाश तत्त्व चिकित्सा के अन्तर्गत रोग निवारण का एक साधन है। रोगों में प्रायः यह कोशिश की जाती है कि किसी
प्रकार रोगी व्यक्ति को नींद आ जाए और जिस रोगी को अच्छी नींद आने लगती है उसके विषय में यह समझा जाता है कि अब उसका रोग बहुत ही जल्दी दूर हो जाएगा ।
डॉ. मेनेन्दर के कथनानुसार-‘‘निद्रा में अनेक आरोग्यदायक गुण हैं। अतः उसे लगभग सभी रोगों की प्राकृतिक चिकित्सा कहना चाहिए।” नींद से शरीर का मल निकलता है और अनावश्यक गर्मी दूर होती है तथा शरीर पुष्ट होता है। निद्रावस्था में साँस जाग्रतावस्था की अपेक्षा अधिक लम्बी और तेज चलती है। जिसके कारण से फेफड़ों के माध्यम से मल और. विष के निकास की क्रिया भी अधिक तीव्र होती है।

रोगावस्था में रोग का कारण विष (विजातीय द्रव्य) सोते समय बहुत कुछ निकल जाता है। रोगी के शरीर में जितना अधिक विष होगा, उतनी ही अधिक नींद उसके लिए आवश्यक होगी । जहाँ शरीर के विषाक्त होने पर 8-10 घण्टे सोना आवश्यक होता है, वहाँ साधारण स्थिति में स्वस्थ व्यक्तियों के लिए 5-6 घण्टे सोना ही पर्याप्त होता है। निद्रा अंगों की क्षतिपूर्ति करती है। नाड़ियों का भी सुधार करती है। निद्रा आहार से अधिक महत्त्व की स्थिति है क्योंकि रोगी को आहार की बिल्कुल जरूरत नहीं होती, किन्तु नींद की उसको न केवल जरूरत ही होती है, बल्कि वह उसके लिए दवा भी है। विषाक्त शरीर वाले अधिक समय तक सोना नहीं टाल सकते, किन्तु जिनका शरीर स्वच्छ और स्वस्थ है, वे कई दिन तक बिना सोए रह सकते हैं। इस तरह निद्रा विषाक्त शरीर वालों के लिए मल निष्कासन का एक प्रभावशाली साधन है।