हार्ट अटैक व हृदय रोग से बचने के उपाय | Dil ki Bimari se Bachne ke Upay in Hindi

हृदय : शरीर का सबसे महत्वपूर्ण अंग

हृदय हमारे शरीर का सिर्फ भौतिक अंग ही नहीं बल्कि हमारी भावनाओं, संवेदनाओं और अनुभूतियों से सम्बन्धित केन्द्र भी है। यही कारण है कि जहां आहार-विहार का अच्छा या बुरा प्रभाव, भौतिक अंग ‘हृदय’ पर पड़ता है वहीं हमारे आचार-विचार का भी अच्छा या बुरा (जैसा आहार विहार या आचार विचार हो वैसा) प्रभाव हमारे इस संवेदना केन्द्र’ अथवा भावना केन्द्र’ रूपी ‘हृदय’ पर पड़ता है, इसलिए हृदय रोग के उत्पन्न होने में हमारे आहार-विहार का ही नहीं बल्कि आचारविचार का भी भारी हाथ रहता है लिहाजा हृदय रोग से बचने के लिए इन दोनों पहलुओं पर बराबर ध्यान देना निहायत जरूरी हो जाता है। हृदय रोग से बचाव करने के लिए, पहले हमें उन कारणों पर विचार करना होगा जो हृदय रोग उत्पन्न करने वाले होते हैं।

हृदय रोग से बचाव में आहार-विहार का महत्व :

आयुर्वेद ने बचाव और चिकित्सा के विषय में ऐसी मार्के की बात कही है जो संसार के किसी भी चिकित्सा शास्त्र ने शायद ही कही हो। कहा है-

संक्षेपतः क्रिया योगो निदान परिवर्जनम्

अर्थात् – चिकित्सा का पहला कदम यह है कि अपथ्य आहार-विहार और रोग उत्पन्न
करने वाले जिन कारणों से रोग उत्पन्न हो रहा हो पहले उनका पूरी तरह त्याग कर दिया जाए। इस सिद्धान्त के अनुसार हृदय रोग के बारे में विचार करते हैं। हृदय रोग उत्पन्न करने में, अपथ्य आहार-विहार से भी ज्यादा अपथ्य आचार-विचार का प्रभाव कारण सिद्ध होता है क्योंकि कोई भी कार्य, कारण के बिना होता नहीं।

कारणाऽभावात्कार्याऽ भावः‘ के अनुसार अगर कारण न हो तो कार्य भी नहीं हो सकता।
अगर कोई कार्य हो रहा है या हुआ है तो उसका कारण भी अवश्य ही होगा और जब तक कारण बना रहेगा तब तक कार्य भी होता ही रहेगा। कारण न हो या कारण खत्म हो जाए तो कार्य भी नहीं होगा यानी कार्य होना बन्द हो जाएगा। आयुर्वेद इसीलिए उन कारणों को त्यागने की सलाह दे रहा है जो रोग उत्पन्न करने का काम कर रहे हों। यह चिकित्सा का तो पहला कदम है ही साथ ही बचाव अभियान’ की बुनियाद भी है। अंग्रेजी में कहा है – Prevention is better than Cure यानी इलाज कराने की अपेक्षा रोग से बचाव करना ज्यादा अच्छा होता है। हमारे यहां भी नीति में कहा है-

प्रक्षालनाद्धि पंकस्य दूरादस्पर्शनं वरम्

अर्थात् – कीचड़ में पैर डाल कर बाद में पैर धोने से तो यही अच्छा है कि पैर को कीचड़ से बचाया जाए। अब जिस हृदय को रोगी होने से बचाने के बारे में चर्चा की जा रही है उसकी रचना और कार्य प्रणाली के बारे में जानकारी प्रस्तुत करते हैं।

हृदय की संरचना और कार्य प्रणाली : Hriday Kaise Kaam Karta Hai in Hindi

इतना तो सभी जानते हैं कि हृदय हमारे सीने में बायीं तरफ़ स्थित होता है और प्रतिपल लगातार यानी बिना रुके धड़कता रहता है। शरीर-शास्त्र के अनुसार, यह शरीर में रक्तसंचार करने वाला एक ऐसा अंग है जो एक मुट्ठी के आकार के बराबर, 280 से 340 ग्राम तक के वज़न का होता है। शरीर शास्त्र से सम्बन्धित प्रसिद्ध ग्रन्थ Principles of Anatomy and Physiology के चौदहवें संस्करण के पृष्ठ 456 से एक उद्धरण साभार उद्धृत कर रहे हैं –

The heart is the centre of the cardio vascular system, It is hallow, muscular organ that weighs about 342 grams (11 oz.) and beats 100000 times a day to pump blood through over 60,000 miles of blood vessels.

अर्थात् – हृदय, शरीर के हृदयवाही संस्थान का केन्द्र है जो अन्दर से खाली मांस पेशियों से बना लगभग 342 ग्राम वज़न का अंग है जो दिन में एक लाख से अधिक बार धड़कता है और रक्त वाहिनी नसों में, 60 हज़ार मील दूरी के बराबर दौड़ लगाने के लिए, रक्त को पम्प करता है।

यदि हम पूरे जीवन की धड़कनों का हिसाब लगाएं तो हैरान रह जाएंगे कि इस नाजुक दिल को जीवन भर कितनी मेहनत मशक्कत करनी पड़ती है। दिल की धड़कन एक वर्ष में आम तौर पर तीन करोड़ पैंसठ लाख बार से ज्यादा धड़कती है और एक व्यक्ति अगर 80 वर्ष तक जिये तो उसका दिल दो अरब बानवे करोड़ बार धड़केगा यानी एक पल के लिए भी रुके बिना हृदय निरन्तर रूप से तब तक काम करेगा, करता रहेगा जब तक वह व्यक्ति जीवित रहेगा क्योंकि इस धड़कन के बल पर ही रक्त सारे शरीर में दौड़ता हुआ बना रहता है। कमाल की बात यह है कि हम सो जाते हैं तब शरीर को तो विश्राम मिल जाता है पर दिल सोते हुए भी धड़कता रहता है ताकि शरीर की रक्त संचार क्रिया और इससे सम्बन्धित अन्य प्रक्रियाएं यथावत सम्पन्न होती रहें।

अब आप विचार करें कि जन्म से ले कर मृत्यु पर्यन्त लगातार परिश्रम करने वाले हृदय को कमज़ोर और रोगी होना चाहिए या मज़बूत और स्वस्थ होना चाहिए ?

अगर दिल कमज़ोर होगा तो रोग का शिकार होगा ही इसलिए हमें पहले से ही सावधान रह कर ऐसे आहार-विहार और आचार-विचार का पालन करना चाहिए जिससे हृदय के कमज़ोर और रोगी होने की नौबत ही न आये। यहां आयुर्वेद के मतानुसार हृदय रोग से बचने और हृदय रोग होने के कारणों के विषय में आवश्यक, उपयोगी और लाभकारी जानकारी प्रस्तुत की जा रही है।

किन कारणों से होता है हृदय रोग : Heart ki Bimari Kaise Hoti Hai

हृदय रोग (दिल की बीमारी) के बारे में आयुर्वेदिक ग्रन्थों में विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया गया है। भाव प्रकाश में कहा गया है –

दूषयित्वा रसं दोषा त्रिगुणा हृदयंगताः।
हृदि बाधां प्रकुर्वन्ति हृद्रोगं तं प्रचक्षते ।।

अर्थात् – वात पित्त कफ दूषित यानी कुपित हो कर हृदय में रहने वाले रस को दूषित करके, हृदय में नाना प्रकार की पीड़ा पैदा करते हैं, इसे हृदय रोग (Cardiac disease) कहते हैं।
आयुर्वेद ने हृदय रोग उत्पन्न करने वाले प्रमुख कारण इस प्रकार बताये हैं –

अत्युष्ण गुर्वम्ल कषायतिक्तैः श्रमाभिघाताध्यशन प्रसंगैः ।
सचिन्तनैर्वेग विधारणेश्च हृदामयः पंचविध प्रदिष्टः ।।
– योग रत्नाकर

अर्थात् – अत्यन्त उष्ण, भारी, खट्टे, कसैले तथा तिक्त रस वाले पदार्थों का अति सेवन,
अत्यधिक परिश्रम, आघात लगना, भोजन के ऊपर (पचने से पहले) भोजन करना, अति मैथुन, किसी भी तरह की चिन्ता तथा मलमूत्र आदि वेगों को रोकना – इन कारणों से पांच प्रकार का हृदय रोग होता है।
आइये जाने हृदय रोग से बचने के लिए क्या करें ? :

हृदय रोग से बचने के उपाय और तरीके : Dil ki Bimari se Bachne ka Tarika in Hindi

अब हृदय रोग उत्पन्न करने वाले इन कारणों के बारे में खुलासा लेकिन संक्षिप्त चर्चा करते हैं जिससे यह बात साफ़ हो जाएगी कि हृदय रोग से बचने के लिए हमें क्या-क्या करना होगा और क्या क्या नहीं करना चाहिए।

अपथ्य आहार से परहेज करता है हृदय रोग से बचाव

अपथ्य आहार ग्रहण करना जैसे अति उष्ण प्रकृति के पदार्थों का लगातार लम्बे समय तक अति मात्रा में सेवन करना जैसे अण्डा,मांस, शराब, तेज़ मिर्च मसाले वाले, खट्टे, कसैले तीखे स्वाद वाले पदार्थों का सेवन करते रहने से दोष कुपित होते हैं। इससे वात यानी गैस, अम्लपित्त यानी हायपरएसिडिटी – इन दोनों का प्रकोप और संयोग होने पर वायु गरम होकर ऊपर उठती है जिससे हृदय पर दबाव पड़ता है। इसे गैस ट्रबल कहते हैं।

गैस का जब भारी दबाव पड़ता है तो हार्ट-ट्रबल जैसी पीड़ा होती है और रोगी को लगता है कि यह हृदय का रोग यानी हार्ट अटेक है जबकि यह गैस ट्रबल होती है हार्ट टबल नहीं। कोलेस्टेरोल (Cholesterol) बढ़ाने वाले पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए क्योंकि कोलेस्टेरोल बढ़ने से हृदय रोग और हार्ट अटेक होने की सम्भावना निर्मित होती है। इसलिए आहार-विहार के मामले में लापरवाही और अनियमितता से बचना चाहिए ताकि वात-पित्त का प्रकोप न हो और हृदय पर दबाव न पड़े।

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शक्ति और सामर्थ्य से अधिक श्रम बढाता है हृदय रोग का खतरा

हृदय रोग का एक कारण यह भी है ,अपनी शक्ति और शारीरिक क्षमता से अधिक परिश्रम करना । बिना विश्राम किये लगातार शारीरिक और मानसिक रूप से अधिक परिश्रम करने पर हृदय को अधिक रक्त-संचार करने के लिए ज्यादा गति से धड़कना पड़ता है जिससे हृदय पर श्रम का दबाव पड़ता रहता है, हृदय थकावट का अनुभव करने लगता है और कमज़ोर हो कर रोग ग्रस्त हो जाता है इसलिए अपनी शक्ति और सामर्थ्य से अधिक श्रम नहीं करना चाहिए। एक उदाहरण से बात स्पष्ट हो जाएगी । कि कम पूजी खुद व्यापारी को ही नुकसान देती है और ज्यादा पूंजी बाज़ार में साख बना कर लाभ खींच लेती है।
परिश्रम के काम करते हुए यदि मानसिक तनाव, चिन्ता, शोक या क्रोध किया जाएगा तो स्वास्थ्य पर इसका और भी बुरा प्रभाव पड़ेगा।

अनुचित आहार की तरह अनुचित विहार करना भी हृदय रोग उत्पन्न करने में प्रबल कारण होता है और अपनी शक्ति व क्षमता से अधिक श्रम करना अनुचित विहार करना है।

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कामुक विकारी भाव से बचे यह बढाता है हृदयघात (Heart Attack) का खतरा

एक प्रकार का अनुचित विहार आम तौर पर अधिकांश व्यक्ति करते पाये जाते हैं और यह है काम (मैथुन) क्रीड़ा करने में अति करना । आदमी मज़े में आ कर मौत को भूल जाए तो बात जुदा है वरना तो काम क्रीड़ा करना भी एक प्रकार का श्रम ही है और यह भी शरीर को थकाता है, कमज़ोर करता है पर मौज मस्ती के आलम में तत्काल इसका पता नहीं चलता जैसे छाछ गाढ़ी हो तो पानी मिलाने पर फर्क नहीं पड़ता लेकिन बार-बार पानी मिलाया जाए तो छाछ पतली होगी ही, ऐसी ही बात ‘काम’ (Sex) के मामले में अति करने पर पैदा होती है, होती ही है और होती ही रहेगी।

कामवासना (Sexual Desire) का सम्बन्ध ‘वात’ से यानी वायु (Gas) से रहता है। कामवासना का प्रभाव होते ही शरीर-स्थित वात कुपित होता है इसीलिए जैसे ही कोई कामासक्त होता है वैसे ही उसके श्वास (वायु) का वेग बढ़ जाता है। कामुक उत्तेजना वायु के वेग को बढ़ाती हैं और वायु का वेग कामोत्तेजना को बढ़ाता है । श्वास (वायु) के वेग को नियन्त्रित और सन्तुलित करने पर कामावेग (Sexual Excitement) पर नियन्त्रण किया जा सकता है इसलिए यदि शीघ्रपतन का रोगी श्वास के वेग को गहरा और धीमा करने का अभ्यास सिद्ध कर लेता है तो बिना वाजीकारक (यौन शक्तिवर्द्धक) औषधि का सेवन किये भी वह इस व्याधि पर काफ़ी कुछ नियन्त्रण कर सकता है। जो लोग अत्यधिक कामुकता से ग्रस्त रहते हैं उनका वात (वायु) भी कुपित बना रहता है।

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क्रोध, ईर्ष्या की आग से करें हृदय की रक्षा

क्रोध, ईर्ष्या-द्वेष का सम्बन्ध पित्त से रहता है। इन मनोवेगों का प्रभाव होते ही पित्त कुपित होने लगता है इसीलिए जैसे ही कोई क्रोधित होता है वैसे ही उसके शरीर में उष्णता बढ़ने लगती है, जैसे नस-नस में अंगारे भर गये हों जो कि पित्त (अग्नि) के बढ़ने यानी पित्त का प्रकोप होने का ही प्रभाव होता
है। क्रोधी व्यक्ति को ठण्डा पानी पिलाने से उसे राहत और शान्ति का अनुभव इसीलिए होता
है कि इस उपाय से उसकी क्रोधाग्नि वैसे ही शान्त होती है जैसे जलती आग पर पानी डालने से आग बुझती है। क्रोध से जलना, ईया से जलना और द्वेष की आग में झुलसना जैसे मुहावरे इसी आधार पर बनाये गये हैं।

इस प्रकार जब हम वात और पित्त के प्रकोप से उत्पन्न शारीरिक और मानसिक स्थिति पर विचार करते हैं तो यह तथ्य स्पष्ट हो जाता है कि इनके प्रकोप का हमारे शरीर, स्नायविक संस्थान, दिल और दिमाग़ तथा पाचन संस्थान पर बड़ा बुरा असर होता है जो कि गलत और अनियमित विहार (आचरण) करने का ही परिणाम होता है।

वात पित्त और कफ के कुपित रहने से शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य पर ‘स्लो पाइज़न’ की तरह धीमा धीमा दुष्प्रभाव पड़ता रहता है। काम (वात), क्रोध (पित्त) और लोभ (कफ) सम्बन्धी आचरण करने में अति करना भी श्रम ही है और यह श्रम शरीर के अंग -प्रत्यंग को थकाता रहता है, कमज़ोरी और रोगी करता रहता है और हृदय रोग उत्पन्न करने में यह श्रम एक । प्रमुख कारण सिद्ध होता है अत: ऐसे कारणों से हमें बचना होगा।

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शारीरिक व मानसिक आघात से बचाव हृदय रोग से बचने का सरल उपाय है

अभिघात यानी आघात (चोट) लगना। किसी भी तरह से शरीर या मन पर यानी शारीरिक या मानसिक आघात लगना, हृदय रोग उत्पन्न करने वाला तीसरा कारण बताया गया है। जो लोग कमज़ोर मन के होते हैं वे ज़रा सी भी मानसिक चोट – सह नहीं पाते और बात हर्ष की हो या शोक
की, इसका उन्हें ऐसा आघात लगता है कि वे हृदयाघात (Heart attack) से पीड़ित हो जाते हैं। ऐसे दुर्बल मानसिकता वाले वे व्यक्ति न तो बड़ी भारी खुशी बरदाश्त कर पाते हैं और न ही कोई भारी शोक की बात ही सहन कर पाते हैं। या तो उन्हें हार्ट अटेक हो जाता है या किसी-किसी का हार्टफेल ही हो जाता है खेल खत्म। ऐसी स्थिति निर्मित ही न हो इसका पूरा खयाल रख कर, उचित आहार-विहार और आचरण करके ही हम हृदय रोग से बचाव कर सकते हैं।

बार-बार खाने की गलत आदत से बचाव टालता है हृदय रोग का खतरा

हृदय रोग होने के कारणों में चौथा कारण बताया है अध्यशन करना । इसका अर्थ है अनियमित ढंग से बार-बार और जल्दी-जल्दी आहार करना। पहले का खाया हुआ पच जाए इससे पहले ही और खा लेना अध्यशन’ कहा जाता है। इस प्रकार के खान पान से अपच होता है, अपच से क़ब्ज़ होता है, क़ब्ज़ से मल कुपित होता है, मल कुपित होने से वात कुपित होता है जिससे गैस ट्रबल होती है और गैस का दबाव यदि हृदय पर पड़ने लगे तो हृदय में पीड़ा (हार्ट ट्रबल) होती है इसलिए इन सभी कारणों की जड़ ‘अध्यशन’ करने से बचाव करना ज़रूरी होता है।

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चिंता तनाव बढ़ाने वाले कामों से बचाव घटाता है दिल की बीमारी का खतरा

राज्यभय यानी सरकारी क़ानून और न्याय-व्यवस्था (Law & Order) या अन्य किसी भी सरकारी नियमव्यवस्था जैसे इन्कम टेक्स, सेल्स टेक्स, वेल्थ टेक्स आदि किसी भी कारण से, किसी प्रकार की चिन्ता या भय से चिन्तित और भयभीत बने रहने का दबाव और प्रभाव दिल, दिमाग और स्नायविक संस्थान (नरवस सिस्टम) में कमज़ोरी आती है और ये अंग रोग के शिकार हो जाते हैं।

राज्य भय उन लोगों को होता है जो प्रकट रूप में तो शरीफ़ बने रहते हैं और रूबरू नफ़रत करो, चलता रहे परदे में काम’ के अनुसार असलियत में गैर क़ानूनी, अनैतिक और काले धन्धे (ब्लेक मार्केटिंग) करते रहते हैं। ऐसे लोग कर चोरी, तस्करी, मिलावटी व नकली पदार्थों का व्यापार, मादक-द्रव्यों का व्यापार जैसे कुकर्म करना, चोरी छिपे मद्यपान, वेश्यागमन, जुआ आदि खोटे काम करते हैं और पोल न खुल जाए, पकड़ न लिये जाएं आदि चिन्ताओं और खतरों में फंसे रहते हैं। ऐसी मानसिक स्थिति का प्रभाव भूख और नींद पर पड़ता है, मन की एकाग्रता और शान्ति पर पड़ता है जिससे अपच, भूख कम होना, उच्चाटन, तनावे अवसाद (डिप्रेशन) आदि व्याधियां पैदा होती हैं और इन सबके प्रभाव और दबाव का असर धीरे-धीरे हृदय पर पड़ता है और हृदय रोग हो जाता है।

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हृदय रोग से बचना है तो भूल कर भी न करें यह काम

मल मूत्र आदि अधारणीय वेग ( Non suppressible urges) शारीरिक क्रिया हैं, शारीरिक वेग हैं जिन्हें दबाना या रोकना उचित नहीं बल्कि रोगकारक होता है। ये वेग 13 होते हैं जिनका परिचय आपकी जानकारी के लिए यहां दिया जा रहा है। तेरह अधारणीय वेग- (1) मल (2) मूत्र (3) शुक्र (4) अपानवायु (5) उलटी (6) छींक (7) डकार (8) जंभाई, बगासी (9) भूख का वेग (10) प्यास (11) आंसू (12) नींद और (13) परिश्रम जन्य श्वास का वेग । इन 13 वेगों के अलावा एक वेग
कास यानी खांसी को भी न रोकने योग्य वेग माना है।

इन वेगों को बलपूर्वक रोकने से ‘एतान धारयतो जाताम् वेगान रोगो भवन्ति’ (चरक संहिता) के अनुसार अनेक प्रकार के रोग उत्पन्न होते हैं। इन रोगों में से एक रोग – ‘गुल्म हृद्रोग संमोहा:’ के अनुसार हृदय रोग भी है। श्वास की गति और हृदय की धड़कन की गति में आम तौर पर 1:4 का अनुपात रहता है यानी जितनी देर में एक बार सांस आती है उतनी देर में हृदय चार बार धड़क लेता है। सामान्य तौर पर एक मिनिट में 14 से 18 बार सांस चलती है । दौड़ने, तेज़ चाल से चलने या कोई परिश्रम का कार्य करने पर शरीर को अधिक प्राणवायु ऊर्जा (oxygen) की ज़रूरत पड़ती है जिसकी पूर्ति करने के लिए हृदय और फुफ्फुस को अपनी गति बढ़ानी पड़ती है जिससे श्वास गति और धड़कन की गति बढ़ जाती है । इस गति को हठपूर्वक और बलपूर्वक रोकने से हृदय और फुफ्फुसों पर दबाव पड़ता है लिहाज़ा श्वास के वेग को रोकना नहीं चाहिए।

यह विवरण तो हुआ उन वेगों का जिन्हें रोकना हानिकारक और हृदय को पीड़ित व रुग्ण करने का कारण होता है अब कुछ ऐसे वेगों के बारे में भी संक्षिप्त चर्चा करते है जिन्हें रोकना ज़रूरी होता है और न रोकना हानिकारक और रोग कारक होता है।

हृदय को कमजोर और बीमार करने वाले हानिकारक वेग ,इन वेगों को रोकिये –

ऐसे वेग मोटे तौर पर तीन प्रकार के होते हैं।
(1) बुरे मानसिक वेग
(2) बुरे वाचिक वेग और
(3) अशस्त शारीरिक वेग।
इन तीनों को रोक देना ज़रूरी होता है। इनके बारे में संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत है-

बुरेमानसिक वेग-
लोभ, शोक, भय, क्रोध, अंहकार, निर्लज्जता, ईर्ष्या, अतिराग, अभिध्या आदि।

बुरेवाचिक वेग-
अत्यन्त कठोर, रूखे और अभद्र शब्द बोलना, चुगलखोरी, झूठ बोलना और अकाल युक्त (बेवक्त की) बात बोलना आदि।

अशस्त शारीरिक वेग-
दूसरे को कष्ट देने वाले क्रूर कर्म, परस्त्रीगमन, बलात्कार, चोरी, मारपीट और हिंसा करने की प्रेरणा देने वाले मानसिक वेगों को रोकना चाहिए ताकि –

पुण्य शब्दो विपाप त्वान्मनोवाक्कायकर्मणाम् ।
धर्मार्थकामान् पुरुषः सुखी भुंक्ते चिनोति च ।।

चरक के अनुसार इन नियमों का पालन न करने वाला व्यक्ति मन, वचन और कर्म से पाप रहित हो कर, पुण्य का भागी हो और स्वस्थ, सुखी तथा निरोग जीवन का आनन्द ले सके।

मानसिक, वाचिक एवं शारीरिक वेगों को न रोकने का धीमा धीमा दुष्प्रभाव और दबाव हृदय पर पड़ता रहता है और एक न एक दिन हृदय रोग का आक्रमण यानी हार्ट अटेक हो ही जाता है। हृदय रोग से बचने के लिए इन वेगों को रोकना बहुत ज़रूरी है।

शरीर की रक्षा करना हमारा पहला और सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण काम है। आयुर्वेद ने स्पष्ट कहा है-

सर्वमन्यत् परित्यज्य शरीरमनुपालयेत्।
तद्भावे हि भावानां सर्वाभावः शरीरिणाम् ।।

अर्थात् – सब कुछ छोड़छाड़ कर पहले शरीर की रक्षा करना चाहिए क्योंकि शरीर ही न रहे तो संसार की समस्त वस्तुओं का अभाव हो जाता है यानी आप मरे जग डूबा। कहा भी है कि जान है तो जहान है।

आयुर्वेद का एक महत्वपूर्ण सन्देश प्रस्तुत करके इस लेख को समाप्त करेंगे। कहा है –

हिताशी स्यान्मिताशी स्यात्काल भोजी जितेन्द्रियः ।
पश्यन रोगान बहन कष्टान्न बद्धिमान विषमाशनात॥

अर्थात् – विषम भोजन करने से उत्पन्न होने वाले कष्टदायक अनेक रोगों को देखते हुए बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिए कि इन्द्रियों को अपने विवेक से वश में रख कर हितकारी पथ्य पदार्थों का सेवन करे, सन्तुलित मात्रा में ही भोजन करे और ठीक यानी निश्चित समय पर ही भोजन करे।

हृदय रोग के आक्रमण से बचने के लिए इस श्लोक में दिये गये निदेर्शों का पालन करना ज़रूरी है। इस पूरे लेख को पढ़ कर, इसमें दिये गये निर्देशों का पालन करके हृदय रोग से पीड़ित होने की स्थिति से बचा जा सकता है और यह तो आप जान ही चुके हैं कि रोगी हो कर इलाज कराने की अपेक्षा रोग से बचाव करना ज्यादा अच्छा है।