जानें, किन रोगों में क्या करना चाहिए परहेज

1). अजीर्ण : पहला खाया भोजन नहीं पचना, खट्टी डकार का आना, भूख नहीं लगना।
परहेज – तले हुए भोजन, हलवा, खीर का प्रयोग न करें।

2). अफारा : पेट में अधिक वायु जमा होना, गुडगुडाहट होना, पेट फूलना, गुदा से पाद वायु का नही निकलना।
परहेज – चावल, राजमा, उडद की दाल, दही, छाछ, लस्सी, मूली, का प्रयोग न करें।

3). अनिंद्रा : सोते सोते कई बार नींद खुले , नींद खुलने पर नींद न आए, आमाशय, यकृत का दोष, मानसिक चिंता, उच्च रक्तचाप, कब्ज दिल का रोग।
परहेज – रात्रि में सोने से पहले मुंह , हाथ, पैर धोने चाहिएं चिंता न करें, हल्का भोजन करे सिर में बादाम रोगन, लौकी के तेल की मालिस करें।

4). अम्ल पित्त : मंदाग्नि होना, कब्ज, भूख कम लगना, पेशाब कम आना, पेट में गैस बनना, पाद न आना, गले व छाति में जलन, सिर में दर्द, चक्कर आना, हाथ पैर में दर्द, कमर में दर्द, जोडों में दर्द , नींद कम आना
परहेज – चाय, कॉफी, अण्डा, मच्छी, मीट, शराब का कम प्रयोग करें। तले भोजन, हलवा खीर न खाएं।

5). आंखो के रोग : नजर कमजोरी से सिर दर्द बना रहे, आँख से पानी आए, धुंधला दिखाई दे, एक के दो दिखाई दें, रात को दीखे दिन में नहीं, जाला, फूला, मोतिया बिंद इत्यादि।
परहेज – अधिक नमक मिर्च न खाएँ, चाय,काफी अधिक न पीएं।

6). आमवात रोग और प्रहेज : गठिया, जोडो का दर्द, दिल दिमाग के पुराने रोग, गुर्दे , मॉस पेसियों का दर्द होता है ।
परहेज – दूध, दही, गुड, लस्सी, शर्बत, मूली, केला, अमरूद, कटहल, उडद की दाल का प्रयोग नही करें।

7). उपदंश – गर्मी- आतसक : पुरूष की इन्द्री अण्ड कोषों पर फुंसी हो जाती है तथा स्त्री के भगोष्ठों पर होती है। फुंसिया फैल कर गोल घाव बन जाते है तथा जाँघो की संधि पर गिल्टियाँ निकल आती है इस का प्रभाव दिल, दिमाग, फेफडों, गुर्दो व हड्डी तक हो जाता है । यह संक्रामक रोग होता है।

8).कब्ज : कोष्टबद्धता लेटरीन नही आना, कम मात्रा में आना, अधिक जोर लगा कर आए, सख्त मल आना, रूक रूक कर थोडा आना, पुरानी कब्ज से गठिया, दिल दिमाग के रोग , अजीर्ण, पेट में गैस बनना, खट्टी डकारे आना, कमर दर्द , बार बार जुकाम होना, भूख कम लगे।
परहेज – तले पदार्थ न खाएं, अधिक मिर्च मसाले न खाएं, दिन भर में 6-7 गिलास पानी पीएं, भूख लगने पर खाए, सप्ताह में एक बार उपवास करें। सोते समय 3-4 दिन 2 चम्मच गुलकंद कम गर्म दूध से लें।

9). कान दर्द : कान से पीप बहना, अंदर फुंसी होना, कीडे हो जाना, अन्दर मैल सूख गया हो, कान के परदे में सूजन, अन्दर जख्म हो।
परहेज – पहले कारण दूर करें , सप्ताह में एक बार दोनों कानों में दो दो बूंद तिल तेल की डालें, सींक से कान न खुजाएँ।

10). कुकरे – रोहे : आंख के पपोंटो के नीचे छोटे लाल दाने व घाव होने पर चुभते व दर्द करते है। आंख से पानी बहता है।
परहेज – गुड, खटाई न खाएं, बोरिक एसिड से आंख धोए या त्रिफला के पानी से दिन में 2-3 बार आंखे धोएं।

11). खुजली खारिस : शरीर पर छोटी छोटी लाल रंग की फुंसियां जिन में रात को ज्यादा खारिस चलती है । यह खुष्क व तर दो प्रकार की होती है उंगलियों की घाई में भी होती हे जिसे पामा कहते है यह रोग रक्त दोष का होता है।
परहेज – मीठे का प्रयोग न करें, तैल, मिर्च, बैगन, नमक का प्रयोग न करें।

12). चम्बल : शरीर पर गुलाबी रंग का उभार फिर इस के पास छोटे दाग उस पर हल्की परत सी उतरती है इस में सख्त खुजली होती है, दाग बढता जाता है।
परहेज – खुजली, खारिस जैसा।

13). चेचक खसरा : इस रोग में 102 से 105 तक का तापमान का बुखार रहता है गले में कुछ दर्द महसूस देता है। 3-4, दिन बाद छोटे लाल दाने पड जाते है फिर यह छाले बन कर पक जाते है जिन के किनारे लाल और मवाद पड़ जाती है। बदबू आती है अधिक जोर 11 दिन रहता है फिर दाने मुरझाने लगते है । इस के बाद धीरे धीरे ठीक हो जाते है।
परहेज – दरवाजे पर नीम के पत्तो की टहनी लटकाएँ, सब्जी में तैल या घी का तडकन – छोकन न दें, ठंडी चीजे खाने को न दें । खूबकला या मुनक्का खाने के लिए दे।

14). छाजन-दाद-एकजीमा : चेहरे व पैरो पर फुंसियां, गोल छाले निकलते है कुरंड आता है पानी सा बहता है, खुजली चलती है, घाव बन जाता है, जलन होती है। इसे चर्म रोग कहते है जो रक्त दोष के कारण से होता है।
परहेज – मीठा न खाएं, रक्त शोद्धक दवाईयों का प्रयोग करें। खट्टामिठा न खाएं, नीम के साबुन से नहाएँ, नहाने, के पानी में थोडी डिटोल डाल कर नहाएं।

15). थूक या मूंह से खून आना : टी.बी., अधिक व्यायाम करना, अधिक जोर लगाना, स्त्री का मासिक रूके, काली खाँसी, दिल के रोगों में, फेफडों से लाल रंग का और आमाशय से काले रंग का खून आता है।
परहेज – अधिक गर्म प्रकृति की चीज न खाएं, रक्त शोद्धक दवाईयों का प्रयोग करें।

16). दस्त अतिसार : दिन में दो बार से अधिक शौच आए, अमाशय, पकवाशय कमजोर होने पर यह रोग होता है।
परहेज – देर से पचने वाले भारी भोजन न करें। नींबू की शिकंजी, पानी में ग्लूकोस डालकर बार-बार पीएं।

17). नजला-जुकाम : नाक से जो तरल बहे उसे जुकाम कहते है और छीकें बार बार आएँ। नाक का तरल गले में गिरे उसे नजला कहते है। नजले में सिर भारी भारी और सिर दर्द हो जाता है।
परहेज – ठंडी चीजो का प्रयोग न करें । घी का प्रयोग न करें। कब्ज की दवाई का प्रयोग करें।

18). निमूनिया – दर्द पसली : फेफडों की झिल्ली पर सूजन आने पर पसलियों के अन्दर नीचे की ओर दर्द होने लगता है तेज बुखार, छाति में दर्द, मूंह लाल, साँस लेने में कठिनाई हो, रोगी जोर जोर से जल्दी जल्दी सांस लें।
परहेज – ठण्ड से बचाएं, पसली पर तेल की मालिश करें।

19). नार्वा : गंदा पानी पीने से इसका कीडा पेट में चला जाता है। जिससे सारे शरीर में सख्त खुजली होती है। हल्के लाल दाग से बन जाते हैं। हैजे जैसी अवस्था बन जाती है। दाग उभरने पर नार्वा कीडे का मूंह निकलने लगता है। जोकि धीरे धीरे निकलता है। जिसकी लम्बाई बहुत अधिक होती है।
परहेज – ध्यान रखें नार्वा का यह कीडा बीच से टूटना नहीं चाहिए। अतः इस कीडे को मोम पर लिपटाते रहें।

20). पेचिस – प्रवाहिका : पतले दस्त दर्द के साथ बार बार आए। यह रोग ऑतों की खराबी से होता है।
परहेज – दस्त अतिसार के अनुसार।

21). पेट में कीडे – सोते हुए दांत पीसे, बार बार नाक खुजाए, मल में कीडे दीखें ।
परहेज – मिट्टी, राख, मुलतानी मिट्टी ना खाएं मिठा नहीं खाएं।

22). पक्षाघात – लकवा – फालिस : शरीर का आधा या पूरा भाग काम करना बंद कर दे यह रोग मस्तिष्क से संबंधित है। लकवे में मूंह टेढा हो जाता है। जबान तुतला जाती है।
परहेज – शरीर में अधिक गर्मी पैदा करने वाले पदार्थ-वस्तुएं खाएं।

23). पायोरिया : मसूडे कमजोर पडकर ढीले पड़ जाते हैं और उनमें पीप व रक्त आने लगता है। मसूड़े सूख जाते हैं। मूंह में बदबू आने लगती है।
परहेज – अधिक गर्म या अधिक ठण्डा भोजन प्रयोग न करें। गर्म भोजन के बाद ठण्डा पानी न पीयें। भोजन के बाद दांत साफ करें।

24). पीलिया – पाण्डु : इस रोग में पेशाब पीले रंग का आता है। चेहरा पीला, आंख और नाखून पीले रहते हैं। खून कम बनता है। शरीर में खून की कमी आ जाती है। यह रोग यकृत-जिगर की खराबी के कारण होता है।
परहेज – कब्ज नाशक एंव जिगर को ठीक करने वाली दवाई का प्रयोग करें। गन्ने का रस पीयें।

25). प्रमेह : इस रोग में मूत्र के साथ या बाद में लेसदार तरल या वीर्य गिरता है। मूत्र तुरन्त करना पडता है। मैथुन में प्रसन्नता नहीं मिलती।
परहेज – अधिक देर तक बैठे रहना, धुम्रपान, दिन में सोना ।

26). फूलवहरी – श्वेत कुष्ठ – कोढ : चेहरे, हाथ, पैरों पर भूरे रंग के छोटे बडे दाग चमडी के ऊपर होते हैं। पानी जैसा पसेब आता रहता है। यह रक्त दोष का चर्म रोग है।
परहेज – दाद, छाजन के अनुसार ।

27). बाल गिरने – जल्दी सफेद होने : बालों के पोषण के लिए पूरा रक्त न मिलना या खराब खून बालों में पहुँचना या बालों की जड़ों में रोम कूप बंद हो जाने या नजले का दूषित तरल बालों की जड में चला जाना, ज्यादा सोचना, गमगीन रहना।
परहेज – बालों को त्रिफला पानी या मुल्तानी मिट्टी से धोए साबुन का प्रयोग न करें बालों में अदल-बदल कर तेल न लगाए।

28). भगन्दर नासूर : गुदा व गुप्तागों के मध्य सीवन पर नासूर, भगन्दर हडडी में होता है । इसका तंग लम्बा सुराख जिस से पीप जैसा तरल निकलता रहता हैं कभी कभी रक्त भी आ जाता है।
परहेज – मीठे का प्रयोग कम करें।

29). मिर्गी : अचानक गिरकर बेहोश हो जाना, हाथ पांव अकड जाना, मूंह से झाग आना, मूत्र मल निकल जाना, जबान दांतों के नीचे आ जाती है।
परहेज – दिमाग को ताकत देने की दवाई दें। महावारी की खराबी दूर करें। सही आयु में विवाह करें।

30). बवासीर – अर्श : यह पित्त कफ दोष से गुदा में मस्से फूल जाते हैं। खुजली वाली बादी बवासीर और रक्त गिरने वाली रक्त बवासीर कहलाती है। यह कब्ज के कारण होती है।
परहेज – मीट, मच्छी, शराब, दही, उडद, मटर, गोभी नहीं खाए धूप में चलना, घुडसवारी करना, दिन में सोना, खून निकलवाना नहीं चाहिए। गुड, तेल, खटाई, तले भोजन, खीर हलवा न खाए।

31). मलेरिया बुखार : यह बुखार ठंड लगकर आता है। 101 से 105 तक का तापमान रहता है।
परहेज – पेट साफ करने का जुलाब दें। तेज बुखार में ठंडे पानी या बर्फ के पानी की पट्टी माथे पर रखें।

32). मॉसार्बुद : मांस के अन्दर सख्त फोडा उत्पन्न हो जाता है। कभी कभी मांस के ऊपर उभार मिलता है। यह मांस की पत्थर जैसी सख्त गांठ होती है। इसके किटाणु रक्त में मिलकर रक्त कैंसर-मांसाबुर्द हो जाता हे।
परहेज – नमक, मिर्च बहुत कम प्रयोग करें। दूध, घी, गेहूँ का प्रयोग करें।

33). यक्षमा – टी. बी. – तपेदीक : इसके रोगी को रात में पसीना आता है। शरीर प्रतिदिन कमजोर होता जाता है। इसकी खांसी में झागदार बलगम निकलता है। हर समय मंदा मंदा बुखार रहता है। खून की उल्टी भी हो जाती है।
परहेज – तली चीजों को ना खाए, मक्खन, फल का प्रयोग करें।

34). यकृत – जिगर की सूजन : यकृत में सूजन आ जाने पर दांई ओर पसली के पास उभरा हुआ दिखाई देता है। दबाने से दुखता है। सांस लेने में कष्ट होता है। दांए कंधे व पसली में दर्द, सांस फूलना, जल्दी थकावट आ जाए । भूख कम लगे, चहरा पीला, काम करने की इच्छा न हो।

35). रक्त चाप : खून में अधिक गर्मी आ जाने से खून की नशों में खून तेजी से दौडने लगता है।
दिल पर खून का दबाव बढ जाता है। इसे उच्च रक्त चाप कहते हैं। इसके विपरीत निम्न रक्त चाप समझें। पहले में सिर दर्द, प्रातः अधिक थकावट, सांस फूलना, आँखों में जलन, चहरा लाल, दिल की धडकन बढ जाती है, रात्रि में पेशाब अधिक आता है। नींद कम आना, ज्यादातर क्रोध बना रहता है। दूसरे रोग में सिर में चक्कर आना, आंखों के सामने अंधेरा छा जाना होता है।
परहेज – पहले में नमक नहीं खाए, चिंता कम करना, गर्मी देने वाली चीजें कम खाना, मुटापा कम करना, दूसरे में नमक का प्रयोग करें। चिंता न करें। कब्ज न रहने दें।

36). वात रोग : शरीर में जगह-जगह दर्द होना, जोडों में दर्द होना, सूजन आए, कब्ज रहे।
परहेज – लस्सी, छाछ, शर्बत, शिकंजी, बर्फ, सत्तू, जों, राजमा, चावल, उडद की दाल, दही, मूली न खाए, कब्ज न बनने दें।

37). शूगर – मधुमेह : चेहरा पीला पड़ जाना, दिल में घबराहट, उच्च रक्त चाप होना, घाव देर से ठीक होना, मूत्र में मिठास से चींटी लगना, मूंह का स्वाद मीठा होना, बार बार मूत्र आना, कमर में दर्द, हलक सूखना, मर्दाना शक्ति कमजोर पड़ना।
परहेज – मीठा या मीठा भोजन न खाए, चिंता न करें, प्रातः की सैर करें।

38). संग्रहणी – पुराने दस्त : बार बार पतले दस्तों का आना, कुछ खाते ही शौच जाना पडे, अपच भोजन शौच में निकले।
परहेज – दस्त या अतिसार के अनुसार।

39). सिर दर्द : कब्ज-अजीर्ण होना, मानसिक एवं स्नायविक दुर्बलता, गैस बनना, नजला होना, नजर कमजोर होना।
परहेज – कब्ज दूर करने की दवाई दें। नजर कमजोर की जांच कराए, मानसिक चिंता न करें, धूप में कम चलें, ज्यादा जागरण न करें, मैथुन कम करें।

40). सुजाक : यह रोग स्त्री पुरूष के मैथुन से हो जाता है। पुरूष की मूत्र नली व लिंग की सुपारी के ऊपर और स्त्री के मूत्र के छिद्र में से पीप जैसा तरल निकलता है। कभी मूत्र में रक्त भी आ जाता हैं मूत्र में जलन व थोडा-थोडा करके निकलता हैं । जोडों में दर्द, अंडकोष में सूजन, गर्भाश्य में सूजन, मासिक कष्ट से आए, बांझपन हो जाए।
परहेज – स्त्री से थुन न करें, मूत्र नली में नीम के पानी की पिचकारी दें, पेशाब का जुलाब दें, रक्त शोधक दवा का प्रयोग करें, नमक न खाए, शराब खटाई का प्रयोग न करें।

41). हैजा – बिसूचिका : उल्टी दस्त एक साथ आए, दस्तों में चावल के धोवन जैसा पानी आए, शरीर का तापमान ज्यादा कम हो जाए, शरीर में पानी की कमी हो जाए।
परहेज – अमृत धारा की चार पांच बूंदें बूरा या बताशे में जल्दी-2 दें, नींबू की शिकंजी दें, खराब अवस्था में हस्पताल लें जाएं।

42). हृदय रोग : दिल के स्थान पर बांए कंधे में चुभन, दिल में घबराहट व धडकन बढ जाती है। दिल में सुराख होना, रक्त नली में रूकावट हो जाती है।
परहेज – दौडना, अधिक मेहनत करना, वजन उठाना, सीढी का चढना, रंज न करें।

43). बच्चों को सूखा मसान रोग : बच्चा दिन प्रतिदिन सूखता जाता है। खांसी, बुखार, दस्त होने लगते हैं। पेट पर अफारा आ जाता है। कान को जोर से दबाने पर बच्चे को दर्द नहीं होता, खाया पीया शरीर का अंग नहीं बनता, तालु पर गड्ढा पड जाता है।
परहेज – माता के दूध से बच्चे को यह रोग लग जाता है। माता के दूध की जांच कराए।

(अस्वीकरण : ऊपर बताए उपचार डॉक्टर की सलाह लेकर लेने है ।)

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