भूख की कमी,मंदाग्नि या अजीर्ण मे क्या खाना चाहिए और क्या नहीं

भूख की कमी ,मन्दाग्नि या अजीर्ण में पथ्यापथ्य :

मन्दाग्नि और अजीर्ण में पथ्य (क्या खाना चाहिए )

• कफ से उत्पन्न मन्दाग्नि और अजीर्ण-आमाजीर्ण में, नमक मिले गरम जल से वमन करानी चाहिए।
• पित्त से उत्पन्न विदग्धाजीर्ण में हल्का जुलाब देना चाहिए ।
• वातज अजीर्ण-विष्टब्ध-अजीर्ण-में स्वेदकर्म–बफ़ारे प्रभृति से काम लेना चाहिए। अथवा समय पर जैसी ज़रूरत हो, विचार कर काम करना चाहिए।
• अजीर्ण की पहली अवस्था में उपवास करना सबसे अच्छा उपाय है।
नोट-जहाँ तक हो, जुलाब न देना ही अच्छा है। हाँ, एक दस्त साफ़ करा देना बुरा नहीं।

अजीर्ण में नीचे लिखे आहार और विहार पथ्य या हितकारी हैं –

• कसरत, कुश्ती, मिहनत, हल्के और अग्नि प्रदीप्त करने वाले भोजन ।
• बहुत पुराने महीन लाल चावल, यवागू, लाजामंड–खीलों का माँड, मूंग का रस ।
• शाली चावल, बथुआ, छोटी मूली, लहसन, पुराना पेठा, नवीन केले की फली, सहँजना, करेला ।
• परवल, बैंगन, ककोड़ा, ख़स का सुगन्धित जल, आमला, नारंगी, अनार, पापड़, अम्लवेत, जंभीरी ।
• नीबू, बिजौरा नीबू, शहद, माठा, काँजी, हींग, नमक, सोंठ, अजवायन, मिर्च, मेथी, धनिया, जीरा।
• पान, गर्म जल (विदग्धाजीर्ण में शीतल जल), कड़वे और चरपरे रस, बारली, अरारूट और साबूदाना प्रभृति हल्के पदार्थ।
• मोंठ की दाल में पिसी हुई सोंठ और भुनी हुई हींग डाल कर खाने से पेट का दर्द और अफारा मिटता है।
• भुनी हुई मोंठ नमक-मिर्च लगा कर खाने से शीघ्र ही पच जाती और रुचि बढ़ाती है।
• पहली अवस्था में उपवास करने से, जब अजीर्ण के दोष शान्त हों,रोगी को साबूदाना, बारली या अरारूट पका कर दो। जब अग्नि बढ़े, सवेरे के भोजन में पुराने चावल का भात, परवल का साग, कच्चे केले की तरकारी, मसूर की दाल, माठा, कागजी नीबू और अदरख के टुकड़े नमक लगा कर दो। शाम के भोजन या ब्यालू में, यदि भूख लगी हो, तो साबूदाना या बारली अथवा और कोई हल्का खाना दो। अगर खूब भूख लगने लगी हो और अजीर्ण न हो, तो आटे में अजवायन और नमक डाल कर पतली-पतली पूरियाँ बना दो और साग तोरई या परवल का दो। रोगी से कह दो; कि भोजन में लोटे-के-लोटे जल न चढ़ा जाये बल्कि उतना ही जल पिये, जितने से गले का ग्रास उतर जाय। वह भी उस दशा में, जब पानी बिना सरे ही नहीं। इस रोग में जितना ही थोड़ा जल पिया जाय, उतना ही अच्छा। हो सके तो खाना खाने के घण्टे-दो-घण्टे या तीन घण्टे बाद थोड़ा-थोड़ा जल पिया जाय। सवेरे, तारों की छाया में, पेट-भर शीतल जल पीना अच्छा है।

• राजमण्ड – चावलों के गरम माँड में हींग और संचरनोन मिला कर पिलाने से विषम और मन्द अग्नि पूर्ण रूप से बढ़ती है।
८-८ तोले (8 ग्राम) मूंग या चावलों को ३२ तोले(३२ ग्राम) जल में पकाओ। जब यह पक जाय, माँड को पसा लो और उसे गाय के घी में भून लो। इसके बाद उसमें भुनी हींग, सेंधा नोन, सोंठ, मिर्च, पीपर और धनिया-इन सब का एक माशा चूर्ण मिला दो और खूब स्वच्छ चमकदार चाँदी या काँच के बर्तन में रख कर, एक चतुरा विलासिनी कामिनी के हाथ में दे कर रोगी के पास भेज दो। वह स्थान निर्जल, निर्वात और निर्जन हो; यानी वहाँ न तो कोई आदमी हो, न बाहरी हवा आती हो और न जल हो। वह स्त्री रोगी के पास जा कर, मधुर-मधुर कटाक्ष करती हुई, रोगी को उस अमृत-तुल्य माँड के बर्तन को प्रेम से दिखाये। अगर इस तरह राजमण्ड पिया जाय, तो वह अग्नि दीप्त करके तीनों दोषों को हरेगा। कहा है :
किंचित्कटाक्षं सा दत्वा सुधातुल्यं प्रकाशयेत्।
ततः पिवेद्राजमण्डं दोषत्रयविनाशनम् ।।

मन्दाग्नि और अजीर्ण में अपथ्य (क्या नहीं खाना चाहिए)

मन्दाग्नि और अजीर्ण में नीचे लिखे हुए पदार्थ या आहार-विहार अपथ्य या हानिकारक हैं –

• जुलाब लेना (पित्त के विदग्धाजीर्ण में हल्का जुलाब बुरा नहीं) ।
• मल, मूत्र और अधोवायु के वेगों को रोकना ।
• भोजन-पर-भोजन करना, यानी बिना एक भोजन पचे दूसरा भोजन करना ।
• रात में जागना, मैथुन करना, तेल लगाना, स्नान करना ।
• कभी कम और कभी अधिक खाना, कभी किसी समय और कभी किसी समय भोजन करना और खून निकालना।
• दाल के अन्न-मूंग, मोंठ, उड़द, चना वगैरः, मछली, मांस ।
• बहुत जल पीना, पोई का साग, लालमिर्च, पिट्टी के पदार्थ, घी में पके पदार्थ ।
• तत्काल ब्याई गाय का दूध, विकृत दूध, या घी में पके हुए चावल, दूध, खोया, इमली आदि का पना या और पतले पदार्थ ।
• ईख-रस, ताड़-फल की मींगी, नारियल, धनिया, नेत्रबाला, ख़राब या गन्दा पानी ।
• अपनी प्रकृति के विरुद्ध अन्न और जल, भारी और देर में हजम होने वाले पदार्थ ।
• भूने-सेके पदार्थ, दाख-मुनक्का या अन्य दस्तावर पदार्थ।
• उड़द मन्दाग्नि रोग में महा अपथ्य हैं; क्योंकि यह पहले दर्जे के गरिष्ट हैं। उड़द की पिट्ठी के लड्डू ताकतवर होते हैं, पर मन्दाग्नि वाले के लिए हानिकारक हैं। ज्वर, वात-प्रकृति वाले और मन्दाग्नि वाले को उड़द नुकसानमन्द और अफारा करने वाली है।

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