मानसिक डर(फोबिया) के प्रकार ,कारण और इलाज

डर को जीतिए :

“मनुष्य का पहला कर्तव्य अब भी डर को हराना है।”

-थॉमस कार्लायल

एक व्यापारी समुद्री यात्रा कर रहा था। एक दिन उसने जहाज के कप्तान से पूछा कि तुम्हारे पिता की मौत किस कारण हुई थी।
कप्तान ने जवाब दिया, “महोदय ! मेरे पिताजी, मेरे दादाजी और मेरे परदादाजी तीनों की मौत समुद्र में डूबने से हुई।
व्यापारी – “तो क्या तुम्हें यह डर नहीं सताता कि तुम भी समुद्र में डूब जाओगे ?
” व्यापारी ने कहा। कतई नहीं ! ”
कप्तान ने कहा, “महोदय, क्या आप मुझे बताएंगे कि आपके पिता, आपके दादा और आपके परदादा जी की मृत्यु कैसे हुई थी?
व्यापारी – भाई, वे तो वैसे ही मरे, जैसे हजारों-लाखों मरते हैं, यानी अपने-अपने बिस्तरों पर ! ” व्यापारी ने उत्तर दिया।
कप्तान ने तुरंत कहा, “तो जब आप बिस्तर पर जाने से नहीं डरते तो मैं समुद्र में कप्तानी करने से क्यों डरूं?”

आज चिकित्सा विज्ञान अपनी पुस्तकों में डर की संख्या और नाम बढ़ाता जा रहा है और डरने वालों की गिनती में प्रतिदिन तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। यहां तक कि अब लोग स्वयं से और अपने प्रिय रिश्तेदारों और मित्रों से भी डरने लगे हैं।

डर(भय) के प्रकार :

डर कई प्रकार का है। चिकित्सा विज्ञान द्वारा वर्गीकृत प्रमुख डर (फोबिया/भय गंथ्रि) निम्न हैं-

एक्ल्यूफोबिया – अंधेरे से डर
एप्लीओफोबिया – दर्द से डर
एग्रीजूफोबिया – जंगली जानवरों से डर
एल्ब्यूमिनोरोफोबिया – किडनी की बीमारी हो जाने का डर
एक्रोफोबिया – ऊँचाई से डर
एण्ड्रोफोबिया – आदमियों से डर
एन्थ्रोफोबिया – फूलों से डर
एपीफोबिया – मधुमक्खियों का डर
एरेक्नोफोबिया – मकड़ियों का डर
एरिथमोफोबिया – संख्याओं का डर
एस्ट्रोफोबिया – सितारों का डर
एटेलोफोबिया – इंपरफेक्शन/असंपूर्णता का डर
एटायकिफोबिया – असफलता का डर
आटोफोबिया – अकेला रह जाने का डर
बेसिलोफोबिया – जीवाणुओं का डर
बीब्लियाफोबिया – किताबों से डर
कार्सिनोफोबिया – कैंसर होने का डर
क्रोमाफोबिया – रंगों से डर
डीमोफोबिया – भीड़ से डर
डीस्टायकीफोबिया – दुर्घटना का डर
एंटोमोफोबिया – कीड़े-मकोड़ों का डर
गेमोफोबिया – शादी से डर
हीमोफोबिया – रक्त से डर
कायमोफोबिया – लहरों से डर
मेस्टीगोफोबिया – सज़ा से डर
मोटरफोबिया – गाड़ियों का डर
नियोफार्मोफोबिया – नयी दवाओं का डर
निक्टोफोबिया – रात से डर
ओबेसोफोबिया – मोटापे का डर
ओनोमेटोफोबिया – ओनोमेटोफोबिया
आर्निथोफोबिया – पक्षियों से डर
पेडिओफोबिया – डॉल्स या गुड़िया से डर
फास्मोफोबिया – भूतों का डर
सेलाफोबिया – लाइट फ्लेश से डर
फोटोफोबिया – प्रकाश का डर
सेलेनोफोबिया – चन्द्रमा से डर
सोशियोफोबिया – समाज का डर
जेनोफोबिया – अपरिचित व्यक्ति से डर
क्लास्ट्रोफोबिया – बंद जगहों का डर

इन फोबिया या डर के अलावा भी सैंकड़ों तरह के डर अब मनुष्यों को सताने लगे हैं। इन डरों की
संख्या बढ़ती ही जा रही है। भय से ग्रस्त लोगों की पीड़ा को केवल वही व्यक्ति समझ सकता है। जिसने समान भय का अनुभव किया हो। लेकिन इनका भय तो दूर करना ही पड़ेगा।

डर का इलाज / काल्पनिक भय का उपचार :

थियोडोर रूजवेल्ट ने डर से निपटने का तरीका हमें बताया था :
“मुझे बहुत बार डर लगा है, लेकिन मैंने कभी इसके सामने घुटने नहीं टेके। मैंने इस तरह
काम किया मानो मुझे डर नहीं लग रहा हो और फिर धीरे-धीरे मेरा डर गायब हो गया। “

एक रोगी मेरे पास आया जो कि एरिथमोफोबिया या न्यूमेरियोफोबिया या संख्याओं के भय से पीड़ित था। वह कोई भी नंबर देखता और उसे यह भय हो जाता था कि उसकी मृत्यु उस तारीख | को हो जाएगी जो नम्बर उसने देखा है। मैंने उससे पूछा कि, “अभी आपने जो संख्या या नंबर देखी हो उसके अनुसार आपकी मृत्यु कब हो सकती है? उसने जवाब दिया, “इस महीने की 23 तारीख को।’ मैंने कहा क्या आपको पूरा भरोसा है, “उसने डरते हुए कहा, हाँ।”

मैंने कहा, “आप एक काम कीजिए अपने सभी खास मित्रों को बता दीजिए कि आप इस तारीख को मरने वाले हैं और आप चाहते हैं कि इस तारीख को वे सभी आपके साथ रहें। यदि आप मर जाओ तो ठीक है वर्ना 24 तारीख को सुबह मुझसे मिलने आना।”

उसने सकुचाते हुए अपने तीन मित्रों को यह बात बताई और वे तीनों 23 तारीख को उसके साथ रहें लेकिन उस डर से पीड़ित व्यक्ति को मृत्यु का फरिश्ता लेने नहीं आया।

वह 24 तारीख को मेरे पास आया। मैंने उसे देखकर आश्चर्य प्रकट करते हुए पूछा, “अरे, आप तो जीवित हैं।” उसने मुस्कुराकर कहा, “हाँ डॉक्टर, मैं जीवित हूँ और आपसे कहने आया हूँ कि आज से मैंने संख्याओं से डरना छोड़ दिया है, बहुत मूर्खता कर ली। अब मैं डरना नहीं जीना शुरू करूंगा।’ यही तो डर का सबसे अच्छा इलाज है कि जिससे डर लगे उससे निपट लो।

नार्मन विंसेत पील ने कहा था-

“जब आप किसी चीज़ से डर रहे हो, तो इससे संबंधित कल्पनाओं में व्यस्त न रहें। इसके बजाय तत्काल कर्म करें। उस पर जमकर प्रहार करें। आप जितनी जमकर प्रहार करेंगे, उतनी ही जल्दी और निश्चित रूप से डर भाग जाएगा।”

आप भी एक काम करें जिस भी वस्तु से आप डरते हैं उस पर हमला कर दीजिए। यदि आप कॉकरोच से डरते हैं तो उसे मुट्ठी में पकड़कर बालकनी से बाहर फेंक दीजिए। यदि आप पानी से डरते हैं तो लाइफ जैकेट पहनकर स्वीमिंग पूल में अपने दोस्तो के साथ कूद जाइए। अंधेरे से डरते हैं तो अंधेरी रात में अपने दोस्तों के साथ एक रात जंगल की सैर कर आएँ। हाँ, यही डर का सबसे अच्छा इलाज है कि उस पर जोरदार हमला कर दिया जाए।

एक से डरोगे तो किसी से भी डर नहीं लगेगा :

जब मुझे मूलभूत सनातन हिंदू धर्म शिक्षा दि गई तो उसमें एक मुख्य बात थी कि, “यदि तुम सर्वशक्तिमान से डरते हो, उस पर आस्था रखते हो तो उसकी बनाई हुई किसी भी वस्तु या जीव से डरने की कोई आवश्यकता नहीं है। अर्थात् आस्था और डर एक ही व्यक्ति के दो गुण नहीं हो
सकते। या तो हम आस्तिक होते हैं या फिर डरपोक “

जब हमें यह विश्वास हो जाता है कि ईश्वर के वश में सभी जीव और वस्तुएँ हैं तो ये जीव और वस्तुएँ हमें बिना ईश्वर की अनुमति के कोई हानि नहीं पहुँचा सकते। अगर हमें यह विश्वास है कि जल, हवा, धरती, सूर्य, चन्द्रमा, बादल, बिजली सभी उस सर्वशक्तिमान ईश्वर की कृतियाँ हैं, तो हम इन सबसे क्यों डरें जबकि इनका रचनाकार हमारे साथ है।

जब कोई व्यक्ति ईश्वर के बताए नियमों पर चलता है तो इस्लाम में उसे “वलिउल्लाह यानि अल्लाह का दोस्त’ कहते हैं। क्या सर्वशक्तिमान का मित्र बन जाने के बाद भी आप डरपोक हो सकते हैं? नहीं ना। कुछ छोटे से अधिकारियों और पुलिसवालों से पहचान और दोस्ती हो जाने पर मेरा एक प्यारासा मित्र स्वयं को बहुत ही शक्तिशाली और निडर मानता है। क्या वहीं मेरा मित्र यदि सर्वशक्तिमान ईश्वर से डरता तो क्या वह ज्यादा निडर नहीं होता।

अब आप ही बताएँ कौन ज्यादा निडर है? कुछ नश्वर अधिकारियों का मित्र या फिर सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापी ईश्वर का मित्र? तो डर भगाने का सर्वश्रेष्ठ तरीका है कि, ‘ईश्वर या खुदा को अपना बना लो, उसके मित्र बन जाओ और फिर डर के पीछे एक डंडा लेकर दौड़ लगाईये वह आपसे हमेशा के लिये अनंत दूरी पर चला जाएगा।

मैं यहाँ अपने लिखे वाक्य को फिर से दोहराना चाहता हूँ कि, “लगभग 100 प्रतिशत मानसिक रोगों को धर्म द्वारा ठीक किया जा सकता है।”

बहादुर और निडरों के साथ रहें :

हमारे न्यूरांस मिरर की तरह कार्य करते हैं। जैसे यदि कोई हंसता है तो हम भी हंसने लगते हैं, जब कोई उबासी लेता है तो हम भी उबासी लेने लगते है। वैसे ही जब कोई किसी घटना या परिस्थिति विशेष में डरता है तो हम भी हरने लगते हैं और इसका ठीक उलट भी हो सकता है। मैं हवाई जहाज में पहली बार सफर कर रहा था और बदकिस्मती से मेरे पास बैठा यात्रि भी पहली ही बार हवाई जहाज में बैठा था। जब हवाई जहाज अधिकतम ऊँचाई पर पहुँचकर सपाट उड़ रहा था, तभी उसने एक जोरदार झटका लिया ओर झटका लेते ही पॉयलट ने आदेश दिया कि, “सभी यात्री अपनी-अपनी सीट पर ही बैठे रहें।” जब मैंने अपने पास वाले यात्री को देखा तो वह काफी आंतकित था तो मुझे भी डर लगा। फिर मैंने एयर होस्टेज की तरफ देखा इस आशंका से की वह भी काफी डरी हुई होगी, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से वह बिल्कुल सामान्य रूप से अपनी सीट पर बैठी हुई थी और उसके चेहरे पर मुस्कान थी। बस उसे निश्चिंत देखकर मैं भी डर मुक्त हो गया।

इस उदाहरण से स्पष्ट हो जाता है कि डरपोकों और भीरूओं का साथ आपको भी डरपोक बना देगा और वीरों का साथ आपको नीडर बना देगा और हमारे लिये निडरता ही आवश्यक है डर तो हमारा शत्रु है।

समीक्षा :

याद रखें अधिकांश डर हमारे बचपन के अनुभवों से निर्मित होते है, जैसे- जब हम रात में उठकर रोते थे तो माँ कहती थी बेटा सो जा, नहीं तो भूत आ जाएगा। जब हम घर से दूर खेलने चले जाते थे तो पिताजी कहते थे- घर से बाहर नहीं जाना वर्ना भिखारियों की टोली तुम्हें पकड़कर ले जाएगी। जब हम खाना नहीं खाते थे तो हमें काल्पनिक पात्रों को बुलाबुलाकर डराया जाता था, हमें कुत्ते, बिल्लियों, चूहों, अंधेरों और आवाजों के द्वारा डराया जाता था और शायद हम भी वर्तमान में हमारे बच्चों को इन्हीं सब चीजों से डराते होंगे।

स्वयं अपने मस्तिष्क पर जोर देकर गौर से सोंचे क्या ये सभी पात्र वास्तव में थे ? क्या इनकी कल्पनाओं ने ही हमें नहीं डरा रखा है ? जब ये काल्पनिक थे और हैं तो फिर हम कब तक इस काल्पनिक संसार में जीएंगे ? थोड़ासा वास्तविकता में जीना शुरू कीजिए और निडर बनिए।

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