निप्पल की विकृतियां :

सामान्यतः निप्पलों में दो प्रकार की विकृतियां पाई जाती हैं

1. निप्पल का भीतर की ओर धंसा होना –

कई युवतियां एवं महिलाएं अपने निप्पल को सामान्य रूप से बाहर की ओर निकले होने की बजाए त्वचा के भीतर धंसा हुआ पाती हैं. यह विकृति दो प्रकार की होती है-

(क) किशोरावस्था से मौजूद विकृति –

यह शारीरिक विकास के अधूरेपन की ओर इंगित करता है, जहां स्तनों के विकास के समय निप्पल की वृद्धि नहीं हो पाती. कई बार बचपन में हुआ स्तन संक्रमण का परिणाम भी इस विकार को जन्म दे सकता है. एक चौथाई मरीजों में यह दोनों स्तनों में भी मौजूद हो सकता है. निप्पल के बाहर न आने की वजह से स्त्री अपने बच्चे को स्तनपान ठीक से नहीं करा पाती.
यदि यह विकार बरसों तक मौजूद रहे तो निप्पल के आसपास की त्वचा छिल जाती है और उस में संक्रमण हो जाता है. वहां मवाद उत्पन्न होने का खतरा भी होता है.

उपचार –

यदि किशोरावस्था में ही यह बात ध्यान में आ जाए तो निप्पल को चुटकी से रोज खींचने पर कुछ ही दिनों में लाभ हो जाता है.
इस के अलावा बाजार में इन के ऊपर पहनने के लिए टोपी भी मिलती है जिस के लगातार इस्तेमाल से भी इस समस्या से छुटकारा मिल सकता है.

(ख) अचानक उत्पन्न हुई विकृति-

यदि सामान्य रूप से मौजूद निप्पल में अकस्मात ही किसी तरह का विकार दिखाई पड़े तो यह एक चिंतनीय समस्या हो सकती है. अकसर इस की वजह स्तन के भीतर मौजूद कैंसर हो सकता है, जिस का एक लक्षण इस तरह से दिखाई दे सकता है.
यदि ऐसी कोई बात हो तो तुरंत अपने चिकित्सक से सलाह लें. यदि आवश्यक हुआ तो कुछ जांचपरीक्षण भी करवाने पड़ सकते हैं.

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2. निप्पल में दरार पड़ना –

अकसर इस की वजह गर्भावस्था में स्तनों के प्रति लापरवाही और सही देखभाल का अभाव है. | गर्भधारण से प्रसव तक हर रोज किसी भी चिकनाई युक्त क्रीम, वैसलीन या नारियल के तेल से निप्पल और उस के आसपास अच्छी तरह मालिश करें. इस से वह स्थान नरम और लचीला रहता है जिस से दरारें नहीं पड़ पातीं. ।
यदि दुग्धपान के बाद इस तरह की दरारें उत्पन्न हों तो उस स्थान से टीस उठती है. जब शिशु निप्पल चूसता है तो उस के मसूड़ों से यह दरार और गहरी हो जाती है और उस के आसपास की त्वचा खुश्क और खुरदरी. कई बार यह स्तन के भीतर संक्रमण और मवाद भी उत्पन्न कर सकता है. माता को दूध पिलाने की क्रिया बहुत कष्टदायक महसूस होती है.

उपचार –

•यदि इस तरह की स्थिति का सामना करना पड़े तो सब से पहले चौबीस से अड़तालीस घंटों तक निप्पल को पूर्ण आराम दें (अर्थात बच्चे को स्तनपान न कराएं).
•बच्चे को स्वस्थ स्तन से दूध पीने दें या ब्रेस्टपंप की सहायता से दूध निकाल कर बोतल से पिलाएं. दोनों निप्पलों पर एलेंटोइन क्रीम की दिन में तीनचार बार मालिश करें. रात में कोई एंटीसेप्टिक मरहम लगा कर सो जाएं.
•बच्चे को दूध पिलाते समय निप्पल शील्ड का उपयोग करें. यह प्लास्टिक की कवचनुमा निप्पल होती है जिसे बच्चा चूसता है और उस के मुंह का सीधा संपर्क स्तन से नहीं होता. इस से उस भाग को पूर्ण आराम मिलता है. बाद में धीरेधीरे दुग्धपान आरंभ किया जा सकता है.

निप्पल का एक्जिमा या कैंसर :

कई बार निप्पल और उस के आसपास की त्वचा लाल दिखाई पड़ती है, उस की पपड़ियां बनने लगती हैं और उन के उखड़ जाने पर उस स्थान से रक्तमिश्रित स्राव होने लगता है. आरंभ में तो मरीज इसे कोई अन्य चर्मरोग अथवा एक्जिमा समझ कर ध्यान नहीं देता या उस का किसी मरहम से इलाज करता रहता है. मगर काफी दिनों के बाद भी उसे राहत नहीं मिलती.

दरअसल, यह निप्पल के कैंसर का एक प्रकार है जो अपने आप को इस तरह से प्रस्तुत करता है. एक्जिमा और इस में दो अंतर होते हैं. इस में मरीज को कोई खुजली महसूस नहीं होती है. दूसरे इस का दायरा गहराई तक कटा होता है न कि एक्जिमा की तरह सतही.

यदि समय पर इस ओर ध्यान न दिया जाए तो धीरेधीरे निप्पल पूर्ण रूप से क्षतिग्रस्त हो जाती है और वहां एक नासूर बन जाता है जिस से सतत स्राव होता रहता है.

उपचार –

यदि निप्पल या उस के आसपास की त्वचा पर इस तरह के लक्षण दिखाई दें और कुछ हफ्तों के उपचार के पश्चात भी वे शांत न हों तो तुरंत अपने चिकित्सक से परामर्श करें. उस स्थान की त्वचा का एक टुकड़ा बायॉप्सी के लिए भेजा जाता है. इस से यह पता चल जाता है कि बीमारी की वजह चर्म रोग है अथवा कैंसर, और फिर तदनुसार उपचार किया जाता है.

अन्य विकृतियां ऐसे में निप्पल में निम्नलिखित बदलाव दिखाई पड़ सकते हैं।
1. निप्पल के रंग का बदलना.
2. निप्पल का अपने सामान्य स्थान से हटना.
3. निप्पल पर असामान्य रूप से झुकाव.
4. एक स्तन पर एक से अधिक निप्पल का होना.
5. निप्पल का रोगग्रस्त हो कर, पूर्ण रूप से नष्ट हो जाना.

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निप्पल से असामान्य स्राव :

गर्भावस्था के पश्चात निप्पल से दुग्धस्राव होना सामान्य बात है और यह उस की रजोनिवृत्ति की आयु तक जारी रह सकता है. मगर इस के पहले या दूध के अलावा निप्पल से कोई भी स्राव अस्वाभाविक है. ऐसी हर स्थिति को संदेह की दृष्टि से देखा जाना चाहिए. उस की पूर्ण जांच कर रोग निदान तक पहुचना जरूरी है, ताकि किसी भी अनहोनी से बचा जा सके.

निप्पल से निम्नलिखित असामान्य स्राव हो सकते हैं –
1. रक्त
2. रक्त कोशिका रहित सीरम (जिस का रंग भूरा, हरा, पीला या काला हो सकता है.)
3. मवाद या पीब.
4. मवाद मिश्रित रक्त.
5. सफेद स्राव.
यदि स्राव लाल रंग का हो तो यह अधिकतर रक्तस्राव की ओर इंगित करता है. इस का मतलब स्तन में मौजूद गांठ या कैंसर होना है.
यदि स्राव काला हो तो अकसर यह भी रक्त की मौजूदगी दर्शाता है, फर्क इतना ही होता है कि किन्हीं रासायनिक प्रक्रियाओं के फलस्वरूप रक्त विकृत हो काले रंग का हो जाता है.
पीला रंग बहुधा मवाद की वजह से होता है. अकसर ऐसे में स्तन में मवाद युक्त गांठ मौजूद होती है. यदि यह स्राव पतला हो तो टी.बी. की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता.
हरा, भूरा या पीलापन लिए हुए स्राव स्तन में मौजूद गांठ का प्रतीक है. हालांकि अधिकांशतः इस प्रकार की गांठ हानिरहित होती है. मगर फिर भी रोग निदान की पुष्टि कर लेना आवश्यक है.
दूध जैसा सफेद स्राव स्तन में मौजूद दूध की गांठ का सूचक है.

रोग निदान –

निप्पल से होने वाले किसी भी स्राव की अवहेलना नहीं की जानी चाहिए. उम्र के किसी भी पड़ाव पर किसी भी मात्रा में होने वाला स्राव ( दूध को छोड़ कर) सामान्य नहीं हो सकता. ऐसे में तुरंत चिकित्सक से सलाह ली जानी चाहिए. स्राव की रासायनिक जांच, उस में मौजूद विभिन्न अंशों की खोज, उस में रक्त की मौजूदगी का पता लगाना, विभिन्न रक्त कोशिकाओं या कैंसर कोशिकाओं की खोज, जांच प्रणाली का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है.
सही रोग निदान के पश्चात ही उपचार की दिशा निर्धारित की जाती है.