शुभ्रा भस्म (फिटकरी भस्म) के फायदे ,गुण ,उपयोग और नुकसान | Shubhra Bhasma (Sphatika Bhasma)

फिटकरी क्या है ? :

फिटकरी पानी की तरह हल्के सफ़ेद रंग की चमकीली सतह वाला, चिकना (स्निग्ध) कसैला. कडवा व खटटे रस के मिले जुले स्वाद वाला कठोर द्रव्य है। आजकल कारखानों में मशीन से काटकर आयाताकार चौकोर साबुन की तरह दिखाई देने वाली फिटकरी भी बाज़ार में उपलब्ध है। यह पानी में घुलनशील होती है। आयुर्वेद के मतानुसार रंग के आधार पर, यह दो तरह की होती है- एक हल्की लालिमा युक्त और दूसरी पानी की तरह आभायुक्त सफ़ेद।

फिटकरी कहां मिलती है ? :

फिटकरी को सफ़ेद चमकीली होने से शुभ्रा, दिखने में स्फटिक पत्थर से समानता होने से स्फुटिका, सौराष्ट्र में पाये जाने से सौराष्ट्रजा और गर्म करने पर फूल जाने से फुल्लीका नाम से जाना जाता है। इसकी प्राप्ति भारत के आसाम के लखीमर, पंजाब, बिहार, उड़ीसा, मद्रास, महाराष्ट्र, गुजरात व अफगानिस्तान, नेपाल आदि की खनिज मिट्टी से होती है। इसकी खनिज मिट्टी को तपाकर । इसमें से एल्यूमिनियम धातु प्राप्त की जाती है,साथ ही फिटकरी भी प्राप्त होती है। आजकल फिटकरी प्राप्ति के कई कारखाने हो गये हैं जो मुम्बई, मद्रास, पंजाब, आसाम व गुजरात के कई शहरों में स्थापित हैं।

फिटकरी की शोधन विधि :

आयुर्वेद में खनिज द्रव्यों का शोधन या शुद्धिकरण करने के बाद ही उपयोग किया जाता है। फिटकरी को तीन दिन तक कांजी में डालकर सुखाने से इसका शुद्धिकरण हो जाता है। (अनेक चिकित्सक फिटकरी के शुद्धिकरण पर ज़ोर नहीं देते क्योंकि इसकी भस्म निर्माण प्रक्रिया में यह आंच पर ही शुद्ध भी हो जाती है और भस्म भी बन जाती है।)

शुभ्रा भस्म (फिटकरी भस्म) बनाने की विधि :

फिटकरी भस्म अर्थात् शुभ्रा भस्म तीन प्रकार की विधि से बनायी जा सकती है।

(1) प्रथम विधि-
लाल आभा वाली फिटकरी 50 ग्राम लेकर ग्वारपाठे के रस की 50 ग्राम मात्रा में मिलाकर खरल में घोंट कर सुखा लें। इसके बाद इसमें भांगरे का रस 100 ग्राम मात्रा में मिलाकर पुनः खरल में घुटाई कर सुखाकर गोल गोल टिकियाएं बना लें। इन टिकियाओं को सुखाकर एक मिट्टी के पात्र (हांडी) में डालकर हांडी को ढंक कर कपड़ मिटटी से बन्द कर दें। इस हांडी को पांच किलो गोबर के कण्डे या गोबरी की आंच में पकाकर, आंच से हटाकर स्वतः ही ठण्डा होने दें। ठण्डा होने पर हांडी से तैयार हुई भस्म बाहर निकाल लें।

(2) द्वितीय विधि-
इस विधि में फिटकरी के साफ़ टुकड़ों को लेकर मिट्टी की मोटी हांडी में डालकर, ऊपर से मिट्टी के ढक्कन से बन्द कर तेज़ गोबरी या कंडों की आंच में गजपुट देकर फूंक दें। स्वतः ही ठण्डी हो जाने पर तैयार फिटकरी भस्म निकाल लें।

(3) तृतीय विधि-
सामान्य औषधि प्रयोग, घरेलू उपचार या साधारण प्रयोग हेतु यह विधि सर्वाधिक आसान विधि है। लोहे के तवे या कड़ाही में फिटकरी के छोटे टुकड़े डालकर आंच पर चढ़ाकर गरम करते हैं। शुरुआत में आंच के कारण फिटकरी पिघलती है उसके बाद उसका जलीय तत्व भाप के रूप में निकल जाता है और फिटकरी फूल जाती है। इसका हल्का सफ़ेद चूर्ण भस्म के रूप में तैयार हो जाता है।

प्रथम विधि द्वारा प्राप्त शभा या फिटकरी भस्म उत्तम गुणवाली होती है और द्वितीय व तृतीय विधि द्वारा प्राप्त शुभ्राभस्म मध्यम गुण वाली होती है।

मात्रा व अनुपान :

इसकी 2 रत्ती से 4 रत्ती यानी 250 मि.ग्रा. से 500 मि.ग्रा. तक की मात्रा रोगानुसार विभिन्न अनुपानों के साथ प्रयोग में लायी जाती है।
नोट :- 1 रत्ती = 0.1215 ग्राम

शुभ्रा भस्म (फिटकरी भस्म) के गुण :

फिटकरी की भस्म रक्तशोधक व रक्तवाहिनी में संकुचन उत्पन्न करने वाली होने से बहते हुए रक्त को रोकने की उत्तम औषधि है। यह रक्तप्रदर, खांसी के साथ पीठ के दर्द (पार्श्वशूल), न्युमोनिया, खून की उलटी, विषविकार, प्रमेह, कुष्ठ, व्रण या पुराने घाव, सूजाक आदि अनेक रोगों में अत्यन्त लाभकारी सिद्ध होती है।

नोट : – फिटकरी का उपयोग इसके मूल रूप में या इसकी भस्म बनाकर किया जाता है। आगे विवरण में जहां-जहां फिटकरी लिखा हो वहां साधारण फिटकरी तथा जहां फिटकरी का फूला या भस्म लिखा हो वहां शभ्राभस्म का प्रयोग किया जाता है। आइए अब इसकी विभिन्न रोगों में उपयोगिता पर बात करते हैं।

शुभ्रा भस्म (फिटकरी भस्म) के फायदे और उपयोग :

1-रक्तस्राव या खून का बहना-

जब कभी त्वचा कट जाने से खूब बह रहा हो तो उस पर तत्काल फिटकरी को पानी के साथ पीसकर लेप लगा देने से वहां की शिराएं संकुचित हो जाती हैं और खून बहना रूक जाता है। यदि घाव बड़ा हो तो फिटकरी के बारीक चूर्ण को पीसकर उस स्थान पर बुरक दें। शरीर में कहीं से भी रक्तस्राव हो रहा हो तो एक ग्राम फिटकरी को पीसकर 100 ग्राम दही और 100 मि.लि. पानी मिलाकर लस्सी बना लें। इसे दिन में एक या दो बार दो दिन तक लें और लाभ हो जाने पर बन्द कर दें। लाभ न होने की स्थिति में तुरन्त अन्य औषधोपचार करना चाहिए। रक्तस्राव में फिटकरी का फूला या भस्म भी घाव पर छिड़क कर बांध सकते हैं; यह ज्यादा लाभदायक होता है।

2-घाव (व्रण)-

जब घाव पुराना हो जाए या ठीक नहीं हो रहा हो तो 2 ग्राम फिटकरी का फूला (भस्म), 2 ग्राम सिन्दूर और 4 ग्राम मुर्दाग लेकर पीसकर चूर्ण बना लें। 10 ग्राम मोम और 30 ग्राम देशी घी को आंच पर गरम कर पिघला लें। फिर इसमें इन तीनों के चूर्ण को मिलाकर अच्छी तरह घुमा कर मलहम तैयार कर लें। घाव के लिए यह उत्तम मल्हम है।

☛ फिटकरी, आक या मदार का दूध और सज्जीखार- समभाग लेकर मिलाकर बारीक पीस लें। इसे घाव पर लेप करने से भी लाभ होता है।

3- जल जाने पर –

अग्निदग्ध या जल जाने पर फिटकरी के बारीक चूर्ण को ताज़े दही में मिलाकर लेप करने से जलने के कारण हुए घाव ठीक हो जाते हैं।

4- रक्तप्रदर –

मासिक धर्म के दौरान यदि रक्तस्राव अधिकता में हो तो शुभ्रा भस्म 5 ग्राम, प्रदरान्तक लौह 5 ग्राम, बोलबद्ध रस 5 ग्राम तथा पुष्यानुग चूर्ण 10 ग्राम मिला कर 20 पुड़िया बना लें। 1-1 पुड़िया सुबह-शाम पानी के साथ देने से रक्त प्रदर व श्वेत प्रदर दोनों में लाभ होता है।

5- श्वेत प्रदर-

सफ़ेद पानी जाने की शिकायत होने पर शुभ्रा भस्म 10 ग्राम और यवक्षार 10 ग्राम मिलाकर 30 पुड़िया बना लें। एक-एक पुड़िया सुबह-शाम घी के साथ मिलाकर देने और साथ ही अशोल टेबलेट की दो दो गोली भी देने से श्वेतप्रदर में लाभ होता है।

☛आधा चम्मच फिटकरी के चूर्ण को 200 मि. लि. पानी में घोल कर योनि को गहराई तक धोने से स्राव कम होता है।

6- भगन्दर-

शुभ्रा भस्म की 1-1 ग्राम मात्रा प्रतिदिन पानी के साथ देने और साथ ही गन्धक रसायन टेबलेट और त्रिफला गुग्गुल की 2-2 गोली देने से भगन्दर में लाभ होता है। भगन्दर के घाव पर कच्ची फिटकरी को पानी में पीसकर रूई की बत्ती से लगाने से भी लाभ होता है।

7-अर्श या खूनी बवासीर-

शुभ्रा भस्म 10 ग्राम, रसौत 10 ग्राम और शुद्ध गैरिक 20 ग्राम को मिलाकर पीस लें। इसकी 3-3 ग्राम मात्रा सुबह-शाम पानी के साथ लेने से खूनी बवासीर में लाभ होता है अथवा शुभ्रा भस्म की एक ग्राम मात्रा दही के ऊपर की मलाई के साथ 7 दिन तक सुबह-शाम खाने से भी खूनी बवासीर में लाभ होता है।

☛ शुभ्रा भस्म 10 ग्राम और नीलाथोथा 10 ग्राम मिलाकर बारीक पीस कर 50 ग्राम गाय के घी में मिला लें। इस घी को रोज सुबह-शाम बार्द के बाहरी मस्सों पर लगाने से वे नरम होकर नष्ट हो जाते हैं।

8- उपदंश-

इसे पूयमेह या सूजाक रोग (Gonorrhea) भी कहते है। इसमें रोगी को पेशाब में जलन तथा दर्द हो तथा जननांग के बाहरी ओर भी दर्द जलन हो तो – शुभ्रा भस्म आधा ग्राम, शीतल चीनी (कबाबचीनी) एक ग्राम, छोटी इलायची के दानों का चूर्ण एक ग्राम और मिश्री 1 ग्राम मात्रा में मिला कर सुबहशाम दूध-पानी के साथ देने तथा फिटकरी मिले पानी से जननांगों की सफ़ाई करने से लाभ होता है।

☛ उपदंश के घाव के लिए फिटकरी, नीलाथोथा, गैरू, हराकसीस, सेन्धानमक, लोध्र, रसोत, हरताल, मनः शीला इलायची – सभी 10-10 ग्राम मात्रा लेकर कूट पीसकर कपड़ छन चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को शहद के साथ मिलाकर लेप करने से उपदंश के घाव ठीक हो जाते हैं।

9- खांसी-

जब रोगी को छाती में कफ जमा होने के कारण खांसी आ रही हो और सूखी खांसी की अधिकता हो तो तालिसादि चूर्ण 20 ग्राम और शुभ्रा भस्म 10 ग्राम मिलाकर 20 पुड़िया बना लें । 1-1 पुड़िया सुबह-शाम शहद के साथ लेने से लाभ होता है।

10- कुकर खांसी-

यह बीमारी विशेषकर बच्चों को होती है जिसमें जोर जोर से खांसी चलने के साथ बच्चों को कभी कभी उलटी भी हो जाती है। ऐसी अवस्था में शुभ्रा भस्म 10 ग्राम, प्रवाल पिष्टी 5 ग्राम तथा काकड़ासिंगी चूर्ण 20 ग्राम मिलाकर 40 पुड़िया बना लें। एकएक पुड़िया सुबह-शाम शहद के साथ मिलाकर चटाने से लाभ होता है।

11- विषम ज्वर-

जब रोगी को बार बार बुखार आये तब ज्वर के वेग को कम करने के लिये शुभ्रा भस्म 10 ग्राम, मल्लसिन्दूर 5 ग्राम और अम्रता सत्व 10 ग्राम मिलाकर 30 मात्रा बना लें। एक-एक मात्रा सुबह-शाम शहद के साथ दें। साथ ही महासुदर्शन घनवटी की 2-2 गोली भी देने से अधिक लाभ होता है।

☛ शुभ्रा भस्म एक ग्राम में 2 ग्राम शक्कर मिलाकर बुखार आने के समय के एक-दो घण्टा पहले देने से भी लाभ होता है। यह प्रयोग दिन में दो बार किया जा सकता है।

12- दांत दर्द-

शुभ्रा भस्म, सेन्धा नमक, नवसादर, सांभर नमक- सभी 10-10 ग्राम लेकर इसमें 5 ग्राम नीलाथोथा चूर्ण मिलाकर सभी का बारीक कपड़छन चूर्ण बनाकर इसमें 10 ग्राम सरसों का तैल मिलाकर रख लें। इसे दांतों पर मलने से दांत का दर्द, मसूढों का दर्द व पायोरिया जैसे रोग में लाभ मिलता है तथा दांत मजबूत होते हैं।

☛ फिटकरी को पानी में घोल कर कुल्ला करने से भी दांतों की सफ़ाई होती है व रोग दूर होते हैं। दांत में छेद व दर्द हो तो फिटकरी को रूई में रख कर छेद में दबाकर लार बाहर टपकाने से भी दर्द में राहत होती है।

13- नेत्ररोग-

नेत्ररोगों में फिटकरी अत्यन्त प्रभावकारी औषधि है। जब किसी कारण से आंख लाल हो जाए और उसमें तेज़ खुजली चले तो 10 मि.लि. गुलाबजल में 250 मि.ग्रा. फिटकरी का चूर्ण मिलाकर तैयार किये गये घोल की 2 से 4 बूंद आंख में टपकाने से लाभ होता है और साथ ही आंखों से कीचड़ आना बन्द होता है। छोटे बच्चों में इसकी 1-1 बूंद तीन से पांच दिन तक डालने से लाभ होता है।

☛ नेत्ररोगों में फिटकरी का अंजन भी प्रयोग किया जाता है। अंजन बनाने के लिए कच्ची फिटकरी की 50 ग्राम मात्रा लेकर मिट्टी के बर्तन में रखकर अग्नि पर चढ़ावें । जब फिटकरी पिघलकर तरल हो जाए तब उसमें सोना गेरू 10 ग्राम डालकर लकड़ी से चला कर घोट कर अच्छी तरह मिला लें। फिर इसे आंच पर से उतार कर खरल में घोंट कर बारीक कपड़छन चूर्ण बना लें। यह बारीक चूर्ण फिटकरी का अंजन कहलाता है। इस अंजन से आंखें स्वच्छ होकर अनेक नेत्र रोगों में लाभ होता है।

14- टान्सिल्स-

गले में घाव होने पर, गले के कागला या टान्सिल्स में किसी भी प्रकार के संक्रमण से घाव होने पर फिटकरी चूर्ण को शहद में मिलाकर लगाने से लाभ होता है।

15- नकसीर-

नाक से खून बहने की अवस्था में गाय के 10 मि.लि. कच्चे दूध में 500 मि.ग्रा. फिटकरी घोल कर इसकी 5-6 बूंद नाक में टपाकने से नाक से खून का बहना बन्द हो जाता है। इसके साथ ही 100 मि. लि. पानी में 30 ग्राम फिटकरी को घोल कर उस पानी से कपड़ा गीला कर सिर पर रखने से अधिक लाभ होता है।

☛ रोगी को शुभ्रा भस्म 500 मि. ग्रा. और प्रवालपिष्टी 250 मि.ग्रा. मिलाकर तत्काल गुलकंद के साथ देने से भी नकसीर में लाभ होता है।

16- कान दर्द-

रूई की एक लम्बी बत्ती सी बनाकर उसके आगे के सिरे पर शहद लगा दें। फिटकरी को पीस कर चूर्ण बनाकर शहद पर लपेट दें। इस बत्तीको कान में डाल कर रखने से कान का जख्म और दर्द ठीक होता है।

17- पीलिया-

फूली हुई फिटकरी अर्थात् स्फुटिक भस्म की आधा ग्राम मात्रा दही में मिलाकर सुबह खाली पेट दें। दूसरे दिन से प्रतिदिन आधा ग्राम मात्रा भस्म की बढ़ाते जाएं यानी दूसरे दिन एक ग्राम, तीसरे दिन डेढ़ ग्राम।
इस प्रकार सातवें दिन 3 ग्राम तक भस्म दही में मिलाकर देने से पीलिया रोग में लाभ होता है। कुछ चिकित्सक दही के स्थान पर मक्खन का प्रयोग करते हैं।

स्फुटिक भस्म सन्निपात ज्वर, पेशाब में खून या शरीर के किसी भी भाग से होने वाले रक्तस्राव को रोकने में भी उपयोग में लायी जाती है।

शुभ्रा भस्म के नुकसान : Shubhra Bhasma (Sphatika Bhasma) ke Nuksan in Hindi

1- शुभ्रा भस्म केवल चिकित्सक की देखरेख में लिया जाना चाहिए।
2- अधिक खुराक के गंभीर दुष्प्रभाव हो सकते हैं ।
3- डॉक्टर की सलाह के अनुसार शुभ्रा भस्म की सटीक खुराक समय की सीमित अवधि के लिए लें।

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