महा औषधि बकायन (महानिम्ब) के दिव्य फायदे – Bakayan ke Fayde aur Nuksan in Hindi

बकायन (महानिम्ब) क्या है ? (What is Bakayan in Hindi)

यह बकायन नाम से प्रसिद्ध वृक्ष नीम के समान किन्तु नीम से बड़ा होने के कारण महानिम्ब के नाम से जाना जाता है।
प्राकृतिक वर्गीकरण के अनुसार यह निम्बकुल (मेलिएसी) की वनौषधि है। आचार्य भावमिश्र ने गुडूच्यादिवर्ग में इसका निम्ब के पश्चात् वर्णन किया है। आचार्य प्रियव्रत जी ने अपने द्रव्यगुण विज्ञान में अर्शोघ्न (बवासीर नाशक) द्रव्यों में सर्वप्रथम इसका विशद वर्णन किया है वस्तुतः अर्शोघ्न द्रव्यों में इसकी उपादेयता सर्वसिद्ध है।

बकायन (महानिम्ब) पेड़ का विभिन्न भाषाओं में नाम (Name of Bakayan Tree in Different Languages)

Bakayan Tree in –

  • संस्कृत (Sanskrit) – महानिम्ब, रम्यक, द्रेक
  • हिन्दी (Hindi) – बकायन
  • गुजराती (Gujarati) – बकान, लिंबडो
  • मराठी (Marathi) – बकाणा निंब
  • बंगाली (Bangali) – महानिम, घोड़ा नीम
  • पंजाबी (Punjabi) – धरेक
  • कन्नड़ (kannada) – आरेबेबु
  • तामिल (Tamil) – मलइ बेम्बु
  • तेलगु (Telugu) – तूरकवेपा, बेत्तिवेप्पा
  • मलयालम (Malayalam) – कसिवेम्बु, मलवेपू
  • अरबी (Arbi) – हर्बीत
  • फ़ारसी (Farsi) – आजाद रख्त
  • अंग्रेजी (English) – पर्सियन लिलेक (Persianlilac) बीड ट्री (Bead Tree)
  • लैटिन (Latin) – मेलिया एजेडरेक (Melia Azedarch)

बकायन (महानिम्ब) का पेड़ कहां पाया या उगाया जाता है ? :

बकायन (महानिम्ब) के वृक्ष हिमालय के निम्न प्रदेश हिमाचल कश्मीर के अतिरिक्त दक्षिण भारत एवं अन्यत्र स्थानों पर स्वयंजात या लगाये मिलते है। भारत के अतिरिक्त चीन बलूचिस्तान आदि में भी यह पाया जाता है। देहरादून और सहारनपुर में इसके लगाये हुए वृक्ष मिलते हैं।

बकायन (महानिम्ब) का पेड़ कैसा होता है ? :

  • बकायन (महानिम्ब) का पेड़ – इसका मध्यम प्रमाण का नीम के समान 30-40 फुट ऊँचा वृक्ष होता है।
  • बकायन (महानिम्ब) के पत्ते – बकायन के पत्र-एक दो फुट लम्बे प्रायः द्विधा पक्षवत् कभी-कभी प्रायः त्रिधापक्षवत् शाखाओं के अग्रभाग पर समूह के रूप में लगते हैं।
  • बकायन (महानिम्ब) के फूल – बकायन के पुष्प नीलवर्ण, सुगंधित, लगभग 1/4 इंच लम्बे अक्षीय मञ्जरियों में होते हैं। वाह्यकोष गहरे विभक्त भालाकार आयताकार खण्डों से युक्त, पुंकेशरनलिका गहरे बैंगनी रंग को रेखाकार दांतों से युक्त होती है। अण्डाशय पञ्चकोष्ठीय होता है। जब पेड़ फूलता है तब उसमें मधु की भांति गन्ध आती है।
  • बकायन (महानिम्ब) के फल – फल ½ से 3/4 इंच व्यास के, नीम के फल के समान, गुच्छों में, कच्चे रहने पर हरे और पकने पर पीले होते हैं। इसके फल की मज्जा अत्यन्त कठिन होती है। जिसके भीतर 5 से 6 लंबे भूरे बीज होते हैं। वृन्त की छाल गहरे धूसर वर्ण की, लम्बे खातों से युक्त होती है।

दिम्बर-अप्रैल में पत्ते झड़ जाते हैं। तीन महीनों तक इसमें बिलकुल पत्ते नहीं रहते हैं। जब तक इसके पत्ते नहीं आते तब तक इसमें फल लगते रहते हैं। मई-जून में पुष्प गुच्छेदार लगते हैं। और शीतकाल में फल लगते हैं। इसके फलों को बुलबुल आदि पक्षी नहीं खाते हैं।

बकायन (महानिम्ब) के प्रकार :

बकायन की एक और प्रजाति मेलिया कम्पोजिटा (M. Coposita) होती है। इसके पत्ते और फल बड़े होते हैं। तथा पुष्प हरिताभ श्वेत होते हैं। यह आसाम, बंगाल, उड़ीसा तथा पश्चिमी घाट में पाया जाता है।

बकायन (महानिम्ब) पेड़ का उपयोगी भाग (Beneficial Part of Bakayan Tree in Hindi)

प्रयोज्य अंग – मूल (जड़) त्वक् (छाल), फल, पत्र, पुष्प, गोंद आदि।

संग्रह एवं संरक्षण – उपयोगी अंगों को संग्रह कर मुखबंद पात्रों में अनार्द्र शीतल स्थान में रखना चाहिए।

वीर्य कालावधि – एक वर्ष।

बकायन (महानिम्ब) के औषधीय गुण (Bakayan ke Gun in Hindi)

  • रस – तिक्त, कटु, कषाय
  • गुण – लघु, रूक्ष
  • वीर्य – अनुष्ण
  • विपाक – कटु
  • प्रभाव – अर्शोघ्न (बवासीर नाशक)
  • दोषकर्म – कफ पित्त शामक

सेवन की मात्रा :

  • क्वाथ – 50 से 100 मिलि0
  • फल चूर्ण – 1 से 3 ग्राम।

बकायन (महानिम्ब) का रासायनिक संघटन :

  • बकायन की अन्तस्त्वक (आंतरिक छाल) में क्रियाशील तत्व (एक हलका पीला, अस्फटिकीय, तिक्त, रालीय पदार्थ) होता है। बाह्यत्वक् में शर्करा और टैनिन होता हैं।
  • फल के बाह्य अंश में बकायनिन नामक एक तिक्त पदार्थ होता है।
  • इसके अतिरिक्त बकायन के फल में एजारिडिन (मार्गोसिन) एक भूरा रालीय पदार्थ, एक अम्लीय पदार्थ, स्टिराल, टैनिन, ग्लुकोज तथा स्टार्च होते हैं।
  • बीजों से 40 प्रतिशत तैल निकलता है। बकायन में नीम की अपेक्षा कम तेल निकलता है।
  • नीम के समान इससे भी एक गोंद निकलता है।

बकायन का औषधीय उपयोग (Medicinal Uses of Bakayan in Hindi)

आयुर्वेदिक मतानुसार बकायन के गुण और उपयोग –

  • बकायन अर्श (बवासीर) की प्रसिद्ध औषधि है। अर्श में इसकी गुठली उपयोग में लाई जाती है। चिकित्सकों द्वारा व्यवहृत प्रसिद्ध “अशोध्नी वटी” द्वारा इसके महत्व का ज्ञान होता है।
  • आचार्य बाग्भट ने जो “लवणों तमादि चूर्ण” कहा उसमें भी बकायन है।
  • बकायन की छाल कृमिघ्न है। गण्डूपद कृमि पर इसकी विशेष क्रिया होती है। इसके प्रयोग के बाद रेचनयोग अवश्य देना चाहिए।
  • बवासीर के अतिरिक्त बकायन छर्दि (उल्टी), हल्लास गुल्म, मंदाग्नि आदि पाचन की विकृतियों पर भी यह लाभप्रद है।
  • चित्रक, हरीतकी (हरड) सोंठ आदि के संयोग से बकायन अग्निमांद्य को नष्ट करता है
  • बकायन अल्प मात्रा में कटु पौष्टिक होने से सामान्य दुर्बलता को दूर करता है ।
  • वेदनास्थापन (दर्दनाशक) होने से गृध्रसी (साइटिका) रोग में इसकी मूल त्वक् (जड़ की छाल) का प्रयोग हितावह है।
  • बकायन विषशामक विशेषतः मूषिकाविष (चूहें का जहर) का शमन करता है।
  • बकायन ज्वरघ्न (बुखार दूर करनेवाला) होने से कफ वातजन्य ज्वरों में लाभप्रद है। विशेषतः जीर्णज्वर एवं चातुर्थिक विषम ज्वर में यह लाभदायक है।
  • बकायन गर्भाशय संकोचक होने से कष्टार्तव (मासिक धर्म में होने वाला दर्द) में तथा प्रमेहघ्न होने से विविध प्रमेहों में लाभ पहुंचाता है।
  • इसके साथ ही बकायन कुष्ठघ्न होने से कुष्ठ को एवं रक्त शोधक होने से अन्य रक्तविकारों को दूर करने में सहायक बनता है।
  • बकायन वेदनास्थापन (दर्दनाशक) होने से पत्र या पुष्पों का लेप ललाट पर किया जाता है जिससे शिरःशूल (सर दर्द) शान्त होता है।
  • बकायन कुष्ठघ्न होने से कुष्ठ तथा अन्य चर्म विकारों में एवं गण्डमाला में इसके पत्र एवं छाल का लेप लाभप्रद कहा गया है।
  • व्रणों (घाव) पर बकायन पत्र लेप या स्वरस को परिषेक करने से व्रणों का शोधन होकर रोपण (घाव भरना) होता है।
  • बकायन के बीजों को धारण करने से संक्रामक रोगों के रूप में कीड़ों को भगा देता है।
  • सर के जुए मिटाने के लिए पुष्पों का लेप करना चाहिए। इसके संपर्क से व्रणों में उत्पन्न कृमि भी नष्ट होते हैं।
  • वस्त्र एवं पुस्तकों की कीड़ों से रक्षा करने के लिए इसके पत्र उपयोग में लाये जाते हैं।

यूनानी मतानुसार बकायन के गुण और उपयोग –

  • यूनानी मतानुसार यह दूसरे दर्जे में गरम एवं खुश्क है।
  • यूनानी चिकित्सा में इसके पत्ते तथा बीज कड़वे तथा कफ निस्सारक माने जाते हैं। ये नकसीर को रोकते हैं। दांतों को दृढ़ करते हैं। शोथ (सूजन) को मिटाते हैं।
  • खुजली मिटाते हैं।
  • फूल और पत्ते मूत्रल एवं आर्तव प्रवर्तक हैं।
  • वातिक सिरदर्द को दूर करते हैं।
  • पत्तों के रस को पेट के कृमियों को मारने के लिए और आर्तव प्रवर्तन के लिए अन्तःप्रयोग में देते हैं।

रोगोपचार में बकायन के फायदे (Benefits of Bakayan in Hindi)

1. कुत्ते के काटने के जहर पर : बकाइन के जड़ का रस निकालकर पीने से कुत्ते के काटने पर उसका जहर नहीं फैलता है।

2. गठिया (जोड़ों का दर्द) :

  • 10 ग्राम बकायन की जड़ की छाल को सुबह-शाम पानी में पीसकर या छानकर पीने से 1 महीने में भयानक गठिया का रोग  भी मिट जाता है।
  • बकायन की जड़ या आंतरिक छाल का 3 ग्राम चूर्ण पानी के साथ सुबह-शाम सेवन करने से गठिया के रोग में लाभ मिलता है।
  • बकायन के बीजों को सरसों के साथ पीसकर लेप करने से गठिया से छुटकारा मिल जाता है।

3. पित्त के कारण से आंखों में दर्द होने पर :

  • बकाइन के फलों को पीसकर उसकी लुगदी बना लेते हैं इस लुगदी को आंखों पर बांधने से आराम मिलता है।
  • बकायन के फलों को पीसकर छोटी सी टिकिया बनाकर आंखों पर बांधते रहने से पित्त के कारण होने वाला आंखों का दर्द समाप्त हो जाता है। अधिक गर्मी के कारण आंखों का दर्द भी दूर हो जाता है।
  • आंखों से कम दिखाई देना, मोतियाबिंद पर बकाइन के एक किलोग्राम हरे ताजे पत्तों को पानी से धोकर अच्छी प्रकार से साफ करके पीसकर तथा निचोड़कर रस निकाल लेते हैं। इस रस को पत्थर के खरल में खूब घोंटकर सूखा लेते हैं। दुबारा 1-2 खरल करते हैं तथा खरल करते समय भीमसेनी कपूर 3 ग्राम तक मिला दें। इसको सुबह-शाम आंखों में काजल की तरह लगाने से मोतियांबिंद तथा अन्य प्रकार से उत्पन्न कमजोर दृष्टि आंखों से पानी आना, लालिमा, खुजली, रोहे आदि आंखों के रोग दूर हो जाते हैं।

4. भैंस की सूजन पर : बकाइन अथवा बांस के पत्तों को पीसकर पिलाने से आराम मिलता है।

5. प्रमेह : बकाइन के फलों को चावल के पानी में पीसकर और उसमें घी डालकर प्रमेह के रोगी को पिलाना चाहिए। इससे प्रमेह के रोगियों को जल्द ही आराम मिलता है।

6. मस्तिष्क की गर्मी: बकायन के फूलों का लेप करने से मस्तिष्क की गर्मी मिट जाती है।

7. सिर में दर्द :

  • अगर सिर में वातजन्य पीड़ा हो तो बकायन के पत्ते व फूलों को गर्म-गर्म लेप करने से सिरदर्द में लाभ मिलता है।
  • गर्मी के कारण होने वाले सिर के दर्द में बकायन के पत्तों को पीसकर माथे पर लगाने से सिर का दर्द दूर हो जाता है।

8. मुंह के छाले :

  • 10-10 ग्राम बकायन की छाल और सफेद कत्था दोनों को बराबर की मात्रा में लेकर चूर्ण बनाकर लगाने से मुंह के छाले ठीक हो जाते हैं।
  • 20 ग्राम बकायन की छाल को जलाकर 10 ग्राम सफेद कत्थे के साथ पीसकर मुंह के भीतर लगाने से लाभ होता है।

9. गंडमाला (गले की छोटी-छोटी गिल्टियां):

  • बकायन की शुष्क छाल और पत्ते दोनों को 5-5 ग्राम की मात्रा में लेकर और पीसकर 500 मिलीलीटर पानी में पकाकर चौथाई शेष काढ़ा बनाकर रोगी को पिलाएं तथा इसी का लेप भी करें। इससे गंडमाला और कुष्ठ (कोढ़) के रोग में लाभ होता है।
  • गंडमाला पर बकायन के पत्तों को पीसकर लेप करने से लाभ होता है।

10. अर्श (बवासीर) :

  • बकायन के सूखे बीजों को पीसकर लगभग 2 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम पानी के साथ सेवन करने से खूनी-वादी दोनों प्रकार की बवासीर में लाभ मिलता है।
  • बकायन के बीजों की गिरी और सौंफ दोनों को बराबर मात्रा में पीसकर मिश्री मिलाकर दो ग्राम की मात्रा में दिन में 3 बार सेवन करने से बवासीर के रोग में लाभ मिलता है।
  • बकायन के बीजों की गिरी में समान भाग एलुआ व हरड़ मिलाकर चूर्ण बना लेते हैं। इस चूर्ण को कुकरौंधे के रस के साथ घोटकर 250-250 मिलीग्राम की गोलियां बनाकर सुबह-शाम 2-2 गोली पानी के साथ लेने से बवासीर में खून आना बंद हो जाता है तथा इससे कब्ज दूर हो जाती है।

11. पेट का दर्द : पेट के दर्द में बकायन के पत्तों की 3 से 5 ग्राम की मात्रा के काढ़े में 2 ग्राम शुंठी चूर्ण मिलाकर रोगी को पिलाने से पेट के दर्द में लाभ मिलता है।

12. श्वेत प्रदर : बकायन के बीज तथा श्वेत चंदन को बराबर मात्रा में लेकर चूर्ण बनाकर उसमें बराबर मात्रा में चीनी मिलाकर 6 ग्राम की मात्रा में दिन में 2 बार सेवन करने से श्वेत प्रदर में लाभ मिलता है।

13. आवेश रोग : 10 ग्राम बकाइन के पत्तों को 500 मिलीलीटर पानी में पकाकर चौथाई हिस्से बचे हुए काढ़े को स्त्रियों के आवेश रोग में पिलाने से लाभ मिलता है।

14. सूजन : चोटिल स्थान पर रक्त जमकर पैदा हुई सूजन पर बकायन के 10-20 पत्तों को पीसकर पोटली बनाकर बांधने से गांठों का रक्त पिघल जाता है।

15. त्वचा के रोग :

  • बकायन के फूलों के 50 मिलीलीटर रस को सिर पर लगाने से सिर की त्वचा के फोडे़-फुन्सी, केशभूमि (सिर की त्वचा) कठोर होना आदि रोग दूर हो जाते हैं।
  • 10 ग्राम बकायन के फल की गिरी को 100 ग्राम नारियल के तेल में पीसकर बहुत गर्म पानी, घी या तेल से सिर के साथ घावों में लगाने से लाभ होता है।
  • बकायन के 8-10 सूखे फलों को 50 ग्राम सिरके में पीसकर त्वचा पर लगाने से त्वचा के कीड़ों से होने वाले रोग मिट जाते हैं।

16. कुष्ठ (सफेद दाग) : बकायन के पके हुए पीले बीजों को लेकर उनमें से 3 ग्राम बीजों को 50 मिलीलीटर पानी में रात को भिगोकर रख दें, सुबह इसका चूर्ण बनाकर फंकी लेते हैं। 20 दिनों तक इसे लगातार सेवन करते रहने से कुष्ठ (कोढ़) के रोग में लाभ मिलता है। परहेज में बेसन की रोटी और गाय के घी का सेवन करना चाहिए।

17. विषम ज्वर : 10-10 ग्राम बकायन की छाल, धमासा तथा कासनी के बीज 10 दाने इकट्ठा करके पीस लेते हैं तथा 50 मिलीलीटर से 100 मिलीलीटर तक पानी में भिगोंकर कुछ समय बाद बुखार में ठंड लगने से पूर्व अच्छी तरह से हाथ से मसलकर छानकर पिला देते हैं। यह बुखार दो खुराक देने से बंद हो जाएगा।

18.  पुराना बुखार : बकायन के गुठली रहित कच्चे ताजे फलों को पीसकर उसके रस में बराबर मात्रा में गिलोय का रस मिलाकर तथा दोनों का चौथाई भाग देशी अजवायन का चूर्ण मिलाकर खूब खरलकर झाड़ी के बेर जैसी गोलियां बना लें, दिन में तीन बार 1-1 गोली ताजे पानी के साथ सेवन करने से पुराने से पुराना बुखार ठीक हो जाता है।

19.  व्रण (घाव) :

  • बकायन के पत्तों के 50 मिलीलीटर रस से दूषित घावों को धोने से लाभ मिलता है।
  • बकायन के 8-10 पत्तों का लेप बनाकर घावों पर लगाने से घाव ठीक हो जाता है।
  • शरीर का अंग कट जाने पर बकायन के पत्तों को पीसकर लेप करने से लाभ होता है।

20. अर्बुद (फोड़े-फुंसियों) : अर्बुद होने पर 10-20 नीम के पत्तों के साथ बकायन के 10-20 पत्तों को पीसकर उसकी पोटली बनाकर बांधने से लाभ मिलता है।

21. पेट के कीड़े :

  • बकायन की 20 ग्राम छाल को दो किलो पानी में डालकर उबालते हैं। उबलने पर 750 ग्राम पानी बाकी रहने पर उसमें थोड़ा सा गुड़ मिलाकर तीन दिनों तक 50 से 100 मिलीलीटर की मात्रा में रोगी को पिलाने से पेट के कीड़े मर जाते हैं।
  • बकायन और नीम के पेड़ की छाल को पीसकर पानी डालकर लेप बनाकर पेट पर लगाने से पेट के कीड़े मल के द्वारा बाहर निकल जाते हैं।

22. बालरोग : बकाइन की छाल और नीवी की छाल को पीसकर पूरे पेट पर लेप करने से पेट के सभी कीड़े मर जातें है और दस्त के साथ बाहर निकल जाते हैं।

23. अंडकोष के रोग : 100 ग्राम बकायन के पत्तों को 500 मिलीलीटर पानी में उबालें, फिर उसमें कपड़ा भिगोकर अंडकोषों को सेंके और हल्के गर्म पत्ते को अंडकोष पर बांधे। इससे अंडकोष के रोगों में लाभ होता है।

24. जीभ की सूजन, जलन और दाने : बकायन के छाल तथा सफेद कत्था दोनों को बराबर मात्रा में लेकर पीस लें। इसके बारीक चूर्ण को जीभ पर बार-बार छिड़कने से जीभ में किसी भी प्रकार के दाने नहीं होते हैं।

25. उपदंश : 70 ग्राम बकायन के फल को पीसकर और छानकर 5 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम दूध के साथ लेने से उपदंश का रोग ठीक हो जाता है।

26. योनि संकोचन : बकायन की सूखी छाल को पीसकर योनि में लगा देना चाहिए। इससे योनि सिकुड़कर छोटी हो जाती है।

27. हाथ-पैरों की ऐंठन : हाथ-पैरों की ऐंठन के रोगी को 20 ग्राम बकायन के पेड़ के अन्दर की छाल की ठंडाई (शर्बत) बनाकर पिलाना चाहिए।

28. हिस्टीरिया : बकायन (महानींबू) के पत्तों का काढ़ा बनाकर सुबह और शाम को रोगी को देने से हिस्टीरिया रोग खत्म हो जाता है।

29. नहरूआ (स्यानु) : बकायन के सात बीजों का सेवन 7 दिनों तक करने से नहरूआ रोग नष्ट हो जाता है।30. साइटिका (गृध्रसी) : बकायन की आंतरिक छाल को पानी के साथ सिल पर पीस लें, फिर पानी को छानकर पी जाएं। इससे साइटिका के रोगी को लाभ मिलेगा।

बकायन के अन्य लाभ और उपयोग :

1. अर्बुद (रसौली या ट्यूमर) में बकायन के प्रयोग से लाभ : बकायन पत्र एवं नीमपत्र पीसकर पुल्टिस बनाकर बांधने से लाभ मिलता है।

2. रक्तस्कन्दता (खून जम जाना) में बकायन का उपयोग फायदेमंद : चोट आदि कारणों से रक्त जम गया हो तो बकायन के पत्तों को पीसकर गरम कर पुल्टिस बांधते रहने से रक्त बिखर कर आराम होता है।

3. गंडमाला रोग मिटाए बकायन का उपयोग : बकायन के पत्र एवं छाल को पीसकर लेप करने से लाभ होता है।

4. प्लीहा वृद्धि में बकायन के इस्तेमाल से फायदा : तिल्लि के बढ़ जाने पर बकायन के गोंद का लेप हितकर है।

5. इन्द्रलुप्त (गंजापान) दूर करने में बकायन करता है मदद : बकायन के बीजों को सरसों के तेल में जलाकर तथा फिर उसी में घोटकर सिर पर लगाने से बाल उगने लगते हैं।

6. नेत्राभिष्यन्द (आंख आना) में लाभकारी है बकायन का प्रयोग : बकायन के फलों को पीसकर कल्क बनाकर नेत्रों पर बांधने से गरमी से आई आंख में लाभ होता है। इससे नारू एवं गठिया के आक्रान्त स्थान पर बांधने से भी लाभ होता है।

7. सूजन (शोथ) दूर करने में बकायन फायदेमंद : बकायन के रस को गरम कर लेप करने से सर्दी के कारण हुआ शोथ मिटता है।

8. चर्मरोग मिटाता है बकायन : इसके फूलों को पीसकर लेप करने से फोड़े-फंसी, खुजली आदि चर्मरोग नष्ट होकर लाभ मिलता है।

9. सर दर्द (शिरःशूल) मिटाए बकायन का उपयोग : बकायन (महानिम्ब) के पत्तों को पीसकर गरम कर ललाट पर लेप करने से वातिक शिरःशूल का शमन होता है।

10. मक्कल शूल (जेर अटकने का दर्द) में बकायन के इस्तेमाल से फायदा : प्रसव के प्रश्चात् हुए मक्कल शूल को नष्ट करने के लिए इसके पत्तों और फूलों का कल्क बनाकर पेडू पर बाँधना चाहिए।

11. विसर्प रोग में लाभकारी है बकायन का प्रयोग : विसर्प रोग त्वचा का एक संक्रामक रोग है जिसमे त्वचा पर लाल चकते हो जाते है तथा इनमे भंयकर दर्द होता है। इस रोग में बकायन के पत्तों को पीसकर लेप करना चाहिए।

12. संक्रामक रोगों से बचने में बकायन से फायदा : बकायन के फलों की माला गले में धारण करनी चाहिए एवं माला को घर के दरवाजे तथा खिड़कियों पर टांग देना चाहिए।

13. उदर शूल (पेट दर्द) में बकायन के सेवन से लाभ : बकायन पत्र क्वाथ में सोंठ चूर्ण मिलाकर सेवन करना चाहिए।

14. योषापस्मार रोग में बकायन का उपयोग लाभदायक : आयुर्वेद में अविवाहित स्त्रियों एवं लड़कियों को होने वाला रोग जिसमे मिर्गी के समान दौरे पड़ते हैं ‘योषापस्मार’ कहा जाता है। इस रोग में बकायन पत्र क्वाथ हितकारी है। यह दो-चार माह तक दें।

15. आमवात दूर करने में मदद करता है बकायन का सेवन : बकायन बीजों को गरम जल से सेवन करना चाहिए।

16. कष्टार्तव (माहवारी के दौरान असहनीय पीड़ा) मिटाए बकायन का उपयोग : बकायन पत्र स्वरस को अकरकरा के चूर्ण के साथ दिया जाता है।

17. पथरी में लाभकारी है बकायन का सेवन : बकायन पत्र स्वरस में यवक्षार मिलाकर पिलाने से वृक्क या मूत्राशय की पथरी गलकर निकल जाती है।

18. श्वान विष (कुत्ते काटने का जहर) दूर करने में बकायन से लाभ : कुत्ते के विष में बकायन मूल त्वक् (जड़ की छाल) के रस को पिलाया जाता है।

19. कृमि रोग में लाभकारी है बकायन का प्रयोग : बकायन की ताजी छाल का क्वाथ बनाकर प्रातःकाल 20 – 21 दिनों तक पिलाना चाहिए। इसके बीच-बीच में कोई विरेचक (जिसके खाने या पीने से दस्त आए) औषधि भी देते रहना चाहिए।
बकायन के सूखे फलों को सिरके में पीसकर पिलाने से उदरकृमि निकल जाते हैं।

20. बवासीर (अर्श) दूर करे बकायन :

  • बकायन फल मज्जा (गिरी) और सोंफ को पीसकर उसमें समान भाग मिश्री मिलाकर दो ग्राम की मात्रा से देने से अर्श रोगी लाभ प्राप्त करता है।
  • बकायन के 250 ग्राम पत्तों में 25 ग्राम नमक मिलाकर पीस कर झरबेर के बराबर गोलियां बनाकर दिन में दो-तीन बार दो-दो गोली देने से भी अर्श में लाभ होता है।

21. साइटिका (गृध्रसी) में लाभकारी बकायन : बकायन जड़ की छाल को 10 ग्राम प्रातः सायं जल में पीसकर छानकर एक मास तक पीने से साइटिका में लाभ होता है।

22. प्रमेह में बकायन फायदेमंद : बकायन बीज के चूर्ण के साथ हल्दी चूर्ण मिलाकर मधु से चाटने से भी प्रमेह में लाभ होता है।

23. स्नायुक रोग दूर करे बकायन : बकायन का एक बीज नित्य सात दिनों तक खिलाने से नारू कृमि गल जाता है।

24. ज्वर (बुखार) में बकायन के इस्तेमाल से फायदा : बकायन की छाल और धमासा 10-10 ग्राम कासनी के बीज 10 दाने एकत्र जौकुट कर पानी में भिगोकर अच्छी तरह मसलकर छानकर पीने से ज्वर दूर होता है। यह विशेषतः मलेरिया में लाभदायक है।

25. मुह के छाले (मुखपाक) मिटाए बकायन का उपयोग : छाल का क्वाथ बनाकर ठन्डा कर पीने से मुखपाक में लाभ होता है। छाल को जलाकर सफेद कत्था मिलाकर मुख में बुरकने से भी मुखपाक के रोगी को शान्ति मिलती है।

26. कब्ज (मलावरोध) में बकायन के सेवन से लाभ : बकायन के बीजों को गिरी के साथ समभाग एलुवा एवं हरड़ को मिलाकर चूर्ण कर कुकरोंधे के रस के साथ घोटकर 250 मिग्रा0 की गोलियाँ बनाकर प्रातः सायं 2-2 गोली सेवन करने से मलावरोध दूर होता है। यह रक्तार्श के रोगी के लिए भी लाभदायक है।

27. श्वेत प्रदर मिटाए बकायन का उपयोग : बकायन के बीज तथा सफेद चन्दन समान भाग लेकर चूर्ण बनाकर उसमें समभाग खांड मिलाकर 5-10 ग्राम सेवन से श्वेत प्रदर में लाभ होता है। इस योग से पूयमेह (सुजाक) के रोगी को भी आराम मिलता है।

28. कुष्ठ रोग में बकायन से फायदा : बकायन के पके हुए पीले बीज दो किलो लेकर उनमें से एक किलो बीजों को 12 लीटर पानी में भिगो दें। सात दिनों बाद मलछानकर पानी को सुरक्षित रखें। शेष एक किलो बीजों का चूर्ण बना 5-10 ग्राम फांक कर ऊपर से एक प्याला उक्त पानी का पीवें। 20 दिनों तक इसे सेवन से आराम मिल जाता है। पथ्य में केवल बेसन की रोटी और गोघृत ही सेवन करना चाहिए।

बकायन से निर्मित आयुर्वेदिक दवा (कल्प) :

क्वाथ – बकायन, चित्रक, हरीतकी, त्रिकटु, लहसुन, अजमोद का क्वाथ बनाकर उसमें सैन्धव लवण, हिंग और चव्य का चूर्ण मिलाकर सेवन करने से अग्निमाद्य में लाभ होता है। – क्वा0 म0 मा0

चूर्ण – बकायन छाल के साथ समभाग सेंधानमक, चित्रक, इन्द्रजौ, करंज की जड़ को पीसकर चूर्ण बना लें। यह चूर्ण 3 ग्राम लेकर छाछ में घोलकर सात दिनों तक पीने से बवासीर (अर्श) में लाभ होता है। यह लवणोतमादि चूर्ण है। -अ०हृचि०

वटी – गुठली रहित बकायन के ताजा फलों को कूटकर रस निकाल उसमें समभाग गिलोय का रस तथा दोनों का चतुर्थांश देशी अजवाइन का चूर्ण मिलाकर खूब खरल करें। फिर इसकी जंगली वेर जैसी गोलियां बना लें। दिन में 3 बार एक-एक गोली ताजा पानी के साथ देने से पुराना जीर्णज्वर दूर हो जाता है। -वनौषधि विशेषाङ्क

तेल – बकायन पत्र, मदार पत्र, एरण्ड पत्र, निर्गुण्डी पत्र, शोभांजन पत्र, कृष्ण धतूरपत्र और थूहर पत्र प्रत्येक 15-15 गाम। इन सबको कूट कर एक किलो तिल के तेल में जलाएँ और तैल छानकर सुरक्षित रखें। प्रयोग करते समय इसे थोड़ा गर्म कर आक्रान्त अंङ्ग पर मलें। इसके मलने से नाड़ी शूल वातज वेदना, पक्षवध, अर्दित, कम्पवायु और आमवात रोग मिटते हैं। इसे यूनानी चिकित्सक रोग न हफ्त वर्ग के नाम से जानते हैं। -यू0 सिण्यो0 सं0

अंजन – बकायन (महानिम्ब) के ताजे पत्ते एक किलो लेकर पानी में अच्छी तरह धोलें। फिर इन्हें कूट-पीसकर रस निकालकर उसे छान लें। इस रस को पत्थर के खरल में खूब घोट-घोट कर सुखा लें। सुख जाने पर पुनः एक दो-दिन खरल कर सूक्ष्म बना लें। खरल करते समय उसमें 3 ग्राम भीमसेनी कपूर मिलाकर घोटकर उसका भी बारीक चूर्ण कर लें। फिर इसे साफ शीशी में सुरक्षित रख लें। यह अंजन प्रातः सायं स्वच्छ कांच की सलाई से आंखों में लगाते रहने से मोतिया बिन्दु तथा अन्य प्रकार के उत्पन्न दृष्टिमांद्य, जलस्राव, लालिमा, कण्डु, रोहें आदि नेत्र विकार दूर होकर नेत्र स्वस्थ रहते हैं। -धन्व0 वनौ0 विशे०

बकायन के दुष्प्रभाव (Bakayan ke Nuksan in Hindi)

  • बकायन के सेवन से पहले अपने चिकित्सक से परामर्श करें ।
  • अती मात्रा में बकायन का सेवन यकृत एवं आमाशय को हानी पहुचता है ।
  • बीजों की अधिक मात्रा (7-8 बीज) विषाक्त प्रभाव उत्पन्न करती है। इससे वमन, अतिसार, उदरशूल, मादकता, पक्षाघात आदि उपद्रव हो सकते है।

दोषों को दूर करने के लिए : इसके दोषों को दूर करने के लिए सोंफ का सेवन कराना हितकारी है।

(अस्वीकरण : दवा ,उपाय व नुस्खों को वैद्यकीय सलाहनुसार उपयोग करें)

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