त्राटक साधना विधि और इसके फायदे

Last Updated on October 25, 2021 by admin

त्राटक क्या है ? (Tratak in Hindi)

त्राटक ध्यान साधना की एक सरल विधि है। इससे मन को स्थिर करने में सहायता मिलती है। इस क्रिया से आंखों तथा मन के विकारों की शुद्धि हो जाती है। आँखों की ज्योति बढ़ाने में भी यह क्रिया बड़ी उपयोगी हैं। अनिद्रा, चिंता और स्नायु रोगों में भी त्राटक बहुत लाभदायक है।

त्राटक का अर्थ है किसी वस्तु विशेष पर टकटकी लगाकर अपलक देखाना। हमारा चंचल मन हजारों-लाखों विषयों और विचारों में बंटा रहता है। त्राटक मन को एकाग्र करने की एक कारगर योग विधि है। इसके द्वारा चित की एकाग्रता बढ़ती है। जो ध्यान को गहराई में सरलतापूर्वक ले जाती है। त्राटक का अभ्यास पद्मासन, सुखासन या वज्रासन में बैठकर करना चाहिए, ताकि आंखों को स्थिर रखा जा सके।

आंख और मन का गहरा संबंध है। आंखों को देखकर मन की अवस्था जानी जा सकती है। इसलिए आंखों को मन का दर्पण कहा जाता है। आंखों को शांत व स्थिर करने से मन भी शांत और स्थिर होने लगता है।

त्राटक के प्रकार (Tratak ke Prakar)

त्राटक क्रिया तीन प्रकार की होती हैं –

  1. अंतः त्राटक 2. मध्य-त्राटक 3. बाह्य-त्राटक।

1). अंत: त्राटक – हृदय अथवा भ्रूमध्य में नेत्र बंद रखकर एकाग्रतापूर्वक धारणा शक्ति को बढ़ाने की क्रिया को ‘अंत: त्राटक’ कहते हैं। भ्रूमध्य में त्राटक करने से आरंभ में कुछ दिनों तक कपाल में दर्द तथा नेत्रों की बरौनियों में चंचलता की शिकायत हो सकती है। परंतु कुछ दिनों के अभ्यास के बाद नेत्रवृत्ति में स्थिरता आ जाती है।

2). मध्य-त्राटक – जब त्राटक क्रिया का अभ्यास देव मूर्ति, सफेद कागज में काला बिंदु अथवा ऊँ, मोमबत्ती अथवा तिल के तेल की अचल बत्ती अथवा धातु की मूर्ति, नासिका के अग्रभाग या समीपवर्ती किसी अन्य लक्ष्य पर दृष्टि रखकर की जाती है, तब उसे ‘मध्य-त्राटक’ कहते हैं। इस क्रिया को करने के लिए किसी भी आसन (पद्मासन, सिद्धासन या स्वस्तिकासन) में बैठकर एक-डेढ़ फीट की दूर पर आँखों के ठीक सामने किसी स्टैंड में एक दीपक (तिल के तेल आदि से युक्त) रखते हैं। अपलक नेत्रों से दीपक की लौ को तब तक देखते हैं, जब तक आसानी से देख सकें। आँखों से आँसू आने पर आँखें बंद करके दीपक की लौ को भ्रूमध्य में धारण करें। कुछ देर बाद पुनः इस क्रिया को दुहराएँ। धीरे-धीरे अभ्यासकाल बढ़ाते जाएँ। यह क्रिया देवमूर्ति, सफेद कागज पर काला बिंदु अथवा ‘ऊँ’ आदि समीपवर्ती लक्ष्य पर भी की जा सकती है।

3). बाह्य-त्राटक – जब त्राटक क्रिया का अभ्यास किसी दूरवर्ती लक्ष्य पर यथा-चंद्र, प्रकाशित नक्षत्र, पर्वत के तृणाच्छादित शिखर आदि पर किया जाता है, तब उसे ‘बाह्य-त्राटक’ कहते हैं। केवल सूर्य पर त्राटक नहीं करना चाहिए, क्योंकि सूर्य और नेत्र ज्योति में एक ही प्रकार की शक्ति होने से नेत्र शक्ति सूर्य में आकर्षित होती रहेगी, जिससे नेत्र कुछ ही दिनों में कमजोर हो जाएंगे। यदि सूर्य पर त्राटक करना हो तो जल में पड़े हुए सूर्य के प्रतिबिंब पर अभ्यास किया जा सकता है।

त्राटक के अधिकारी :

  • जिस साधक की पित्त प्रकृति हो, जिसके मस्तिष्क, नेत्र, नासिका या हृदय में दाह रहता है, वह केवल अंत: त्राटक का अधिकारी है।
  • जिनकी दृष्टि दूर की वस्तुओं के लिए कमजोर हो, जिनकी वातप्रधान प्रकृति हो या जिन्हें शुक्र की निर्बलता हो, वे बाह्य त्राटक के अधिकारी हैं।
  • जिनकी दृष्टि दोष-रहित हो, त्रिधातु सम हो, कफ-प्रधान प्रकृति हो, नेत्रों की ज्योति पूर्ण हो, वे मध्य त्राटक के अधिकारी हैं।

विशेष – अम्लपित्त, जीर्णज्वर, विषमज्वर, मज्जातंतु- विकृति, पित्ताशय-विकृति इत्यादि किसी रोग से पीड़ित अथवा तंबाकू, गाँजा आदि के व्यसनी को त्राटक-क्रिया का अभ्यास नहीं करना चाहिए।

त्राटक के लाभ (Tratak ke Labh in Hindi)

  1. स्मरण-शक्ति, धारणा-शक्ति, अतींद्रिय क्षमता को बढ़ाता है।
  2. मन की हलचल को शांत, स्थिर तथा अंतर्मुख करता है।
  3. दिव्य-दृष्टि तथा सम्मोहक व्यक्तित्व प्रदान करने में सहायक है।
  4. उच्च आध्यात्मिक क्रियाओं के लिए पृष्ठभूमि तैयार करता है।
  5. शांभवी-मुद्रा की सिद्धि में सहायक है।

त्राटक साधना में इन बातों का ध्यान रखें :

इस क्रिया के लिए चार बातों का ध्यान रखें –

  • नेत्र गोलक स्थिर हों,
  • पलके झपके नहीं,
  • जिस वस्तु विशेष पर त्राटक साधना की जा रही हो, उसके अतिरिक्त कुछ और न दिखे,
  • मन भी उसी वस्तु में रम जाए या बंध जाए, इधर-उधर न भटकें।

त्राटक करते हए साधक को तीन बातों का ध्यान रखना चाहिए – वस्तु, दूरी और समय।

वस्तु जिस पर त्राटक साधना की जा रही हो, छोटी और स्पष्ट होनी चाहिए। उसकी दूरी आंख से दो से पांच फुट तक होनी चाहिए और आंख की सीध में हो। अभ्यास का समय धीरे-धीरे बढ़ना चाहिए। एक मिनट से शुरू करके समय 15-20 मिनट तक बढ़ाया जा सकता है।

त्राटक साधना में स्वाभाविक दृष्टि का महत्व :

लौ को देखने की क्रिया स्वाभाविक रूप से होनी चाहिए। आंखों पर या माथे पर किसी तरह का खिंचाव या बल नहीं पड़ना चाहिए। आंख पूरी तरह खोल कर सहज भाव से लक्ष्य की ओर देखते जाना है। यह क्रिया निश्चल और निर्विकार भाव से करनी है। जब आप किसी विचार में डूब जाते हैं या किसी विषय में तल्लीन होते है अथवा किसी बात को रुचि तथा एकाग्रता से सुनने लगते हैं, तब आपकी आंखें अपने-आप स्थिर हो जाती हैं। यह स्वाभाविक (Natural) त्राटक की स्थिति है।
त्राटक साधना में यह स्थिति अभ्यास द्वारा प्राप्त की जाती है।

त्राटक साधना में आने वाली बाधाएं :

पलके झपकाना (Blinking) आंखों की स्वाभाविक क्रिया है। बिना पलक झपकाए या अपलक देखना अप्राकृतिक है। अत: त्राटक साधना के शुरू में कठिनाई का होना स्वाभाविक है। आंखें दुखने लगती हैं, पानी आने लगता है। ऐसी स्थिति में थोड़ी देर आंखे बंद कर फिर साधना शुरू करनी चाहिए। जोर-जबरदस्ती से हानि होने की आशंका रहती है। अपनी इंद्रियों को धीरे- धीरे प्यार से वश में करना चाहिए। आसन में असुविधा हो, तो आसन भी बदल सकते हैं।

त्राटक साधना से सिद्धियां :

त्राटक के सतत अभ्यास से कई सिद्धियां प्राप्त होती हैं। दिव्य दृष्टि की प्राप्ति इस साधना की महान उपलब्धि है। इसके द्वारा साधक दूर की चीजें देखना भूत-भविष्य की बातें बताना, आखों से अपलक देखकर रोग को ठीक करना तथा किसी का चेहरा देखकर मन की बात जान लेना और गुमशुदा चीज को जानकारी दे देना भी संभव हो जाता है।

त्राटक साधना कैसे करें (Trataka Kaise Karen)

  1. मोमबत्ती, या दीपक को ऐसे स्थान पर रखे, जहां हवा से उसकी लौ में कंपन न हो, वह स्थिर रहें।
  2. दीपक को जलाने के बाद दो मिनट के लिए आंखें बंद करके अपने शरीर (सिर से पैर तक) को स्थिर करें।
  3. आंखें बंद रखते हुए पांच बार ‘ॐ’ शब्द का लंबा, गहरा तथा मधुर उच्चारण इस प्रकार करें कि उसकी ध्वनि की गूंज पूरे शरीर व मस्तिष्क में गूंजे।
  4. अब अपलक दृष्टि से लौ को देखना शुरू करें, पुतलियां स्थिर हो, परंतु आंखों पर बल न पड़े। सहज भाव से इस प्रकार देखें, जैसे आप भी लौ में डूबते जा रहे हो।
  5. मन को भी लौ पर लगाएं। यदि मन इधर-उधर भटके, तो प्यार से उसे फिर लौ पर लाएं। इसका अभ्यास दो-तीन मिनट तक करें। अब आंखें बंद कर, मोमबत्ती की लौ को मन की आंखों से भूमध्य में देखें। लौ की इस तस्वीर को हिलने-डुलने न दें। मन को भी उस पर स्थिर करें।
  6. अब अगर कोई विचार मन में उठे, तो उन्हें तटस्थ होकर साक्षी भाव से देखें, मानो विचार किसी और के है और देखने वाला कोई और है। यह क्रिया तब तक करें, जब तक ज्योति का चित्र भूमध्य में स्पष्ट दिखाई पड़ता रहे।
  7. आखें खोल लें और सौ को पहले की तरह फिर अपलक देखना शुरू करें। यह अभ्यास तीन मिनट तक या जब तक आप आसानी से कर सकें, करें। आंखें बंद कर लें और फिर लौ के चित्र को भूमध्य में मन को आंखों से देखें।
  8. यह क्रम तब तक करें, जब तक आप आराम से कर सकें। एक-दो मास की साधना में आप आधे घंटे तक का अभ्यास कर पाएंगे।

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