अमृत पुत्र (आध्यात्मिक उपन्यास) — श्री सुदर्शन सिंह ‘चक्र’ जी
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यह पुस्तक अमृत पुत्र नाम से प्रकाशित हुई है और इसके लेखक सुदर्शन सिंह चक्र हैं। आवरण पर इसे आध्यात्मिक उपन्यास बताया गया है और चित्र में श्रीकृष्ण तथा सुदामा के साथ नरसिंह रूप दिखाया गया है। प्रकाशक श्रीकृष्ण-जन्मस्थान सेवा सस्थान का कार्यालय मथुरा में है। प्रकाशन तिथि पृष्ठ पर श्रीकृष्ण-जन्माष्टमी, वि० सं० २०३८ के अनुसार दर्ज है, जो २३ अगस्त, १९८१ ई० को पड़ता है। पृष्ठ पर यह भी छपा है कि यह पुस्तक भारत सरकार द्वारा रियायती मूल्य पर उपलब्ध करायी गयी कागज़ पर मुद्रित-प्रकाशित है।
पुस्तक दो भागों में बँटी है — पूर्व खण्ड और उत्तर खण्ड — और दोनों की अपनी अनुक्रमणिका दी गई है। पूर्व खण्ड में प्रस्तावना, अपनी बात, भूत भी-भविष्य भी, दैन्द्रियक जीवन, गुरु-पूत सोम जीवन, विचारक जीवन, भूतियों का विवाद, पुनर्जन्म प्राप्ति, कर्मफल दर्शन, मुमुक्षु, श्रद्धा, सच्ची वाणी और साधनाभ्यास जैसे अध्याय हैं। उत्तर खण्ड में चरनदास-चरित, काल-यमला, गोकुल-गोपाल, बाल-लीला, कृष्ण-लीला, रास-लीला और अन्त में उद्धव के प्रसंग तक पहुँचते हैं। बीच-बीच में गीत-रूपी अध्याय भी आते हैं, जैसे भ्रमरगीत, मानसगीत, विष्णुगीत, माधुरीगीत, कलहलीत, गोपीगीत, कल्याणी गीत, भानन्द गीत, गोविन्दगीत और हरि गंगा गोविन्दा गीत। प्रस्तावना में रामानुज और चैतन्य परंपरा का संदर्भ भी आता है।
हिन्दी में ऐसा आध्यात्मिक उपन्यास मिलना दुर्लभ है, जिसमें गद्य के साथ भक्ति-पद्य भी उतना ही महत्वपूर्ण हो। जो पाठक कथा-साहित्य के साथ नाम-संकीर्तन और भक्ति-पद को भी साथ में पढ़ना चाहते हैं, उनके लिए यह पुस्तक उपयोगी है। 281 पृष्ठ की यह पुस्तक भक्ति-साहित्य के प्रेमी पाठकों के लिए एक अच्छा संग्रह है।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
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- योगासन तथा उनकी विधि
- प्राणायाम के प्रकार तथा लाभ
- ध्यान तथा साधना के सोपान
- अभ्यास में सावधानियाँ
पुस्तक की मुख्य बातें
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