अमृत वाणी (भाग 1) – Amrit Vani
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शीर्षक-पृष्ठ पर पुस्तक का नाम अमृत वाणी अंकित है और उसके नीचे भजन नाम राम राम तथा भाग प्रथम लिखा गया है। प्रकाशन का श्रेय श्री स्वामी म्यर्जीकाक काकजी ट्रस्ट को दिया गया है और साथ में हंगालयुड़ तथा जम्मू स्थान का भी उल्लेख मिलता है। पृष्ठ पर छपा वर्ष दो हजार बारह और कीमत तीन सौ रुपये अंकित है, साथ ही सम्पादक, पुनरावृत्तिकार और अन्य पते भी दिए गए हैं।
पुस्तक का आरंभ क्षमा-व्याचना से होता है जिसमें लेखकों ने पाठकों से क्षमा-याचना की है और हंगाल जिले तथा जम्मू के साथ स्वामी म्यर्जीकाक के संबंध का उल्लेख किया गया है। इसके बाद प्रस्तावना आती है जिसमें कबीर, राम जी, मीरा जी और गुरु रामदास जी जैसे संतों के पदों का उल्लेख मिलता है। पाठ में स्वामी म्यर्जीकाक के जन्म, गुरु-परम्परा और उनके जीवन-यात्रा का वर्णन दिया गया है और एक पुराने हैंडी इतिहास-स्रोत का भी संदर्भ मिलता है।
अमृत वाणी स्वामी म्यर्जीकाक के भजनों और जीवन-यात्रा का संग्रह है जो भक्ति-साहित्य के इतिहास के लिए उपयोगी है। कबीर-सम्प्रदाय की परंपरा का भी इसमें उल्लेख है। यह ध्यान रखने योग्य है कि यहाँ दिए गए जीवन-विवरण और तिथियाँ लेखकों के अपने अनुभव एवं स्रोतों पर आधारित हैं, और इसमें कोई चिकित्सकीय या आध्यात्मिक उपाय नहीं दिया गया है। इसे केवल भक्ति-साहित्य और इतिहास के अध्ययन के रूप में पढ़ा जाना चाहिए।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
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- इस विषय की उपयोगी तथा ज्ञानवर्धक सामग्री
- सरल हिंदी भाषा में लिखा गया पाठ
- साधक तथा सामान्य पाठक — दोनों के लिए उपयोगी
- मोबाइल व कंप्यूटर पर पढ़ने योग्य PDF
पुस्तक की मुख्य बातें
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