अर्थ संग्रह – Artha Sangrah
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अर्थ संग्रह जैनागम का प्रमुख दर्शनिक ग्रंथ है। शीर्ष पृष्ठ पर इसे जैनागम साहित्यमाला का प्रथम भाग बताया गया है और इसके रचयिता के रूप में श्री लोचनाथ मुनि का नाम दर्ज है। पुस्तक हिन्दी व्याख्या सहित प्रकाशित हुई है और व्याख्याकार डॉ. राजेश्वर शास्त्र मुसलगोङ्कर हैं। पुस्तक लगभग चार सौ चौवास पृष्ठ की है।
जैन दर्शन में अर्थ अर्थात तत्त्व-शास्त्र पर इस ग्रंथ का आयोजन बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि जीव को मुक्ति दिलाने वाले सात तत्त्वों का सविस्तार वर्णन इसी में मिलता है। प्रत्येक तत्त्व पर अलग प्रकरण है, जिसमें उसकी परिभाषा, स्थान, कारण और परिणाम बताया गया है। धर्म और संवर के अहंकार, कर्म और मोक्ष-मार्ग पर भी विस्तृत चर्चा है। हिन्दी व्याख्या होने के कारण संस्कृत-ज्ञान के बिना भी पाठ समझ आ सकता है।
यह पुस्तक उन पाठकों के लिए उपयोगी है जो जैन दर्शन, भारतीय दर्शन या तत्त्व-शास्त्र में रुचि रखते हैं। जैनागम के अध्ययन के लिए यह आधारभूत ग्रंथ माना जाता है। मूल ग्रंथ संस्कृत में है और यह हिन्दी व्याख्या के साथ प्रकाशित हुआ है, इसलिए भाषा की कठिनाई नहीं होती। जैन धर्म में स्नातक-स्तर की पढ़ाई या शोध के लिए यह पुस्तक अत्यंत उपयोगी है। व्याख्याकार के विद्वान-परिचय से पाठ की विश्वसनीयता और बढ़ जाती है।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
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- आत्मा तथा ब्रह्म का स्वरूप
- जगत् की उत्पत्ति, माया तथा अद्वैत
- साधना, ध्यान तथा आत्मज्ञान के सोपान
- उपनिषद् तथा गीता का सार
पुस्तक की मुख्य बातें
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