औचित्यविचारचर्चा – Aucityavicaracara
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शीर्षक-पृष्ठ पर महाकवि क्षेमेन्द्र विरचिता औचित्यविचारचर्चा अंकित है और साथ में यह लिखा है कि यह प्रभा नामक संस्कृत और हिन्दी व्याख्या सहित प्रकाशित है। व्याख्याकार आचार्य श्री व्रजमोहन झा हैं, जिनका परिचय यह भी बताया गया है कि उन्होंने व्याख्या के साथ साहित्यालंकार का भी कार्य किया है। पुस्तक विद्याभवन संस्कृत ग्रन्थमाला का एक सौ अठारहवाँ ग्रन्थ है। प्रकाशक चौखम्भा विद्याभवन है और पता चौक, वाराणसी दिया गया है।
पृष्ठ पर तृतीय संस्करण और वर्ष उन्नासी बासी का उल्लेख मिलता है और मूल्य पंद्रह रुपये अंकित है। पुस्तक में पहले सम्प्रदेश, आलोचा और अभ्यागत जैसे अनुभाग दिए गए हैं, जिनमें अनेक विद्वानों के हस्ताक्षर और मत मिलते हैं। अंग्रेज़ी अर्द्ध-शीर्षक-पृष्ठ पर भी शीर्षक, लेखक और व्याख्याकार का नाम दोबारा दिया गया है। पुस्तक का पाठ नाट्य तथा दृश्य कला के सिद्धांत से जुड़ा है और उसमें मूल पाठ के साथ संस्कृत और हिन्दी दोनों व्याख्याएँ उपलब्ध हैं।
औचित्यविचारचर्चा नाट्यशास्त्र के उस प्रश्न पर पुरस्कृत ग्रन्थ है कि किस प्रकार किसी कृति का उद्भव, विकास, प्रयोग और अप्रयोग सब समझा जाए। इसमें उपादान, विकास, प्रयोग, विरोध, यावज्जीवित और समाधान जैसे पंचाङ्गों पर विस्तृत विवेचन मिलता है, जो नाट्यशास्त्र और साहित्य-शास्त्र दोनों के पाठकों के लिए उपयोगी है। यह पाठ केवल सैद्धान्तिक और ऐतिहासिक अध्ययन के लिए है और इसमें दिया गया साहित्य-दर्शन केवल सिद्धांत के रूप में पढ़ा जाना चाहिए। इस पुस्तक का कोई चिकित्सकीय या आध्यात्मिक दावा नहीं है और इसे शोध तथा अध्ययन के ही उद्देश्य से पढ़ा जाना उचित है।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
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- आत्मा तथा ब्रह्म का स्वरूप
- जगत् की उत्पत्ति, माया तथा अद्वैत
- साधना, ध्यान तथा आत्मज्ञान के सोपान
- उपनिषद् तथा गीता का सार
पुस्तक की मुख्य बातें
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