भक्ति-योग
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यह पुस्तक भक्ति-योग नाम से प्रकाशित हुई है और शीर्षक के साथ यह भी लिखा है कि यह विवेकानन्द-मन्थावली की संख्या चार है। लेखक स्वामी विवेकानन्द हैं और अनुवाद-सम्पादन का काम पं० रूपनारायण पाण्डेय ने किया है, जिनके साथ सम्पादक माधुरी श्री आदित्य शर्मा का नाम भी दिया गया है। प्रकाशक सरस्वती पुस्तक-भण्डार, आर्यनगर, लखनऊ हैं और संस्था के अध्यक्ष श्री रामविलास पाण्डेय हैं। मुद्रक शुक्का प्रिंटिंग प्रेस, नज़ीराबाद, लखनऊ से हुआ है। प्रकाशन काल मार्च सन् 2000 ई० अंकित है।
पुस्तक में पहले दो शब्द और आगे एक विस्तृत विषय-सूची दी गई है, जिससे पाठक को पुस्तक का पूरा ढाँचा एक नज़र में दिख जाता है। सूची के अनुसार पहले प्रकरण में भक्ति का स्वरूप और ईश्वर का स्वरूप समझाया गया है, इसके बाद युग की उपयोगिता और उसके लक्षण, अवतार और मनन पर अलग अध्याय हैं। भक्ति और प्रतीति की उत्पत्ति, दृष्टि-दीप, भक्ति के साधन, भक्त की प्रार्थना और प्रेम का वेदन जैसे प्रकरण भी सूचीबद्ध हैं, और अंत में भक्ति-योग की सामर्थ्यता तथा भक्ति की उपासना पर विचार रखा गया है।
भक्ति-साहित्य और आध्यात्मिक चिंतन में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए यह पुस्तक उपयोगी है, क्योंकि विवेकानन्द जी के भक्ति-सम्बन्धी विचार यहाँ एक क्रमबद्ध रूप में मिलते हैं और हर प्रकरण स्वतंत्र ढंग से पढ़ा जा सकता है। पहले प्रकरण का भक्ति के स्वरूप से आरम्भ होना भी पाठक को सही क्रम में पढ़ने में मदद करता है। ध्यान दें कि यह पुस्तक केवल धार्मिक चिंतन और साहित्य-अध्ययन के लिए है — यहाँ दी गई भक्ति की बातें किसी साधना-विधान या चिकित्सा का आधार नहीं हैं, इसलिए इसे उपचार का स्रोत न समझें।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
कैसे पढ़ें — फ़ाइल पूरी PDF में है, जिसे मोबाइल, कंप्यूटर या किसी भी PDF ऐप में बिना इंटरनेट के पढ़ा जा सकता है। नीचे दिए बटन से इसे तुरंत और मुफ़्त डाउनलोड करें — कोई साइन-अप, सदस्यता या शुल्क नहीं।
- योगासन तथा उनकी विधि
- प्राणायाम के प्रकार तथा लाभ
- ध्यान तथा साधना के सोपान
- अभ्यास में सावधानियाँ
पुस्तक की मुख्य बातें
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