ब्रह्म वैवर्त पुराण – Brahma Vaivarta Puran
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यह पुस्तक ब्रह्मवैवर्तपुराण नाम से प्रकाशित हुई है और शीर्षक-पृष्ठ पर इसे संक्षिप्त, मोटा टाइप केवल हिन्दी बताया गया है। आवरण-पृष्ठ पर श्रीहरिः संधि का शीर्षक अंकित है और पृष्ठ पर जीते प्रेम गोरखपुर का प्रकाशक-नाम दिया गया है। पैमाना लगभग 808 पृष्ठ का है।
निवेदन-पृष्ठ पर बताया गया है कि यह पुस्तक संक्षिप्त रूप में पुराण भारत की सर्वोत्कृष्ट निधि है, और प्राचीन काल से ही भारतवर्ष में पुराणों का बंड आदर के साथ पठन, मनन और अनुरागन-शीलन का कार्य करता आया है। साथ में यह भी बताया गया है कि वेद-विशेषज्ञों के साथ सर्वसाधारण पुराण-पाठकों तथा श्रद्धा और अभिमान के साथ पाठकों के लिये सुलभ पुराण-संसार का निर्माण प्रस्तुत किया गया है, और इसमें गंगापति खड़्ग, श्रीकृष्णभजनमखड़्ग, नन्दव्रज, गोपाल और कल्याणकाकारी जैसे रूपों का वर्णन भी मिलता है।
पृष्ठ पर यह भी अंकित है कि संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण का प्रथम बार कल्याण-वर्ष २९१ (सन् १९६३ ई०) के विशेषीभूक्त के रूप में प्रकाशित हुआ था, और इसका पुनर्मुद्रण भी लाभकारी रहा। यह पुस्तक पुराण-अध्ययन के प्रेमियों के लिए उपयोगी है, और वैष्णव धर्म के मूल ग्रन्थ को हिन्दी में उपलब्ध कराती है।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
कैसे पढ़ें — फ़ाइल पूरी PDF में है, जिसे मोबाइल, कंप्यूटर या किसी भी PDF ऐप में बिना इंटरनेट के पढ़ा जा सकता है। नीचे दिए बटन से इसे तुरंत और मुफ़्त डाउनलोड करें — कोई साइन-अप, सदस्यता या शुल्क नहीं।
- धर्म-ग्रंथों का सरल हिंदी अनुवाद व भावार्थ
- पूजा-पाठ, स्तोत्र तथा नित्य-कर्म की विधि
- व्रत, त्योहार तथा संस्कारों का वर्णन
- आध्यात्मिक जीवन के नियम व प्रेरणा
पुस्तक की मुख्य बातें
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