ब्रह्माण्ड पुराण – Brahmanda Purana
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यह पुस्तक The Brahmānḍa Purāṇa नाम से प्रकाशित हुई है और यह Part I है। ध्यान रखने योग्य बात यह है कि इस स्कैन में मौजूद पुस्तक अंग्रेज़ी भाषा में है, हिन्दी में नहीं, हालांकि इसी ग्रन्थ का हिन्दी संस्करण अलग उपलब्ध है। प्रकाशक मोतीलाल बनारसीदास है और दिल्ली, वाराणसी तथा पटना तीनों केंद्रों के नाम पृष्ठ पर अंकित हैं। पृष्ठ पर यह लिखा है कि प्रथम संस्करण दिल्ली, 1958 में प्रकाशित हुआ, और इसके बाद 1974 से लेकर 2002 तक कई पुनर्मुद्रण हुए। मुद्रण भारत में Jaiendra Prakashan Jain and Shri Jaiendra Press, नई दिल्ली से हुआ है और प्रकाशन Narendra Prakashan Jain द्वारा Motilal Banarsidass Publishers Private Limited, दिल्ली के लिए किया गया है।
पुस्तक दो भागों में बँटा है, Section I यानी PRAKRIYĀ और Section II यानी ANUSĀNGA। विषय-सूची में अड़तीस अध्याय हैं, जिनमें नैमिषार्पण की कथा, हिरण्यगर्भ से ब्रह्मा द्वारा सृष्टि, विश्व-अण्ड का संविधान, कल्प और मन्वन्तर, जम्बूद्वीप तथा भारत वर्णन, नवलोक, सूर्य-मण्डल और ग्रहों की गति, शिव की लिङ्ग-मूर्ति के उद्भव, कलियुग के चार युग, वैदिक साहित्य के व्यास और उनके शिष्य तथा मनु की वंशावली जैसे विषय स्पष्ट रूप से दिए गए हैं।
पौराणिक और दार्शनिक अध्ययन में रुचि रखने वाले विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं के लिए यह पुस्तक अत्यंत उपयोगी है, क्योंकि यहाँ केवल सिद्धान्त नहीं बल्कि क्रमबद्ध अध्यायों में पूरा वृत्तान्त अंग्रेज़ी में सम्पादित रूप में मिलता है। यह पुस्तक पूर्णतः अध्ययन और अनुवाद-अध्ययन के लिए है — इसमें किसी अनुष्ठान या उपचार का निर्देश नहीं दिया गया है।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
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- मूल ग्रंथ का परिचय तथा महत्व
- श्लोकों का सरल हिंदी अनुवाद व अर्थ
- मुख्य पात्रों तथा प्रसंगों का वर्णन
- जीवन में अपनाने योग्य शिक्षाएँ
पुस्तक की मुख्य बातें
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