धर्मशास्त्र का इतिहास (भाग 3) – Dharma Shastra Ka Itihas
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यह पुस्तक धर्मशास्त्र का इतिहास का तृतीय भाग है, जिसमें मूल ग्रंथ भारत-रत्न महाभारतीयपाम्पा डॉ० पाण्डुरङ्ग वामन काणे का है और जिसका हिन्दी अनुवाद अर्जुन चौबे काश्यप ने किया है। प्रकाशन उत्तर प्रदेश शासन के राजर्षि पुरुषोत्तमदास टण्डन हिन्दी भवन, लखनऊ से हुआ है, और यह हिन्दी समिति ग्रन्थमाला की संख्या १३२ है। इस भाग में पातक, प्रायश्चित्त, कर्मविपाक, अन्त्यकर्म, अशौच, शुद्धि, श्राद्ध और तीर्थ-प्रकरण जैसे विषय विस्तार से वर्णित हैं।
आवरण-पृष्ठ पर हिन्दी सीमिति ग्रन्थमाला संख्या १३२, शीर्षक धर्मशास्त्र का इतिहास, तृतीयभाग अध्याय १ सैकड़, मूल लेखक भारत-रत्न महाभारतीयपाम्पा डॉ० पाण्डुरङ्ग वामन काणी, अनुवादक अर्जुन बच्चे करायप तथा प्रकाशन उत्तर प्रदेश शासन राज्य पुरुषोत्तमवादर टंगन, हिन्दी भवन, महात्मा गाँधी मार्ग, लखनऊ अंकित है, और साथ में हिन्दी समिति का लोगो भी बना है।
यह खंड धर्मशास्त्र के उस भाग का हिन्दी रूप है जिसमें कर्तव्य-पक्ष और प्रायश्चित्त-विधि का विस्तृत क्रम दिया गया है, इसलिए यह उन पाठकों के लिये उपयोगी है जो धर्म-शास्त्र के स्रोत-पाठ का अध्ययन करते हैं।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
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- इस विषय की उपयोगी तथा ज्ञानवर्धक सामग्री
- सरल हिंदी भाषा में लिखा गया पाठ
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