गीता का ज्ञानयोग | Geeta Ka Gyan Yog Swami Ramsukh Das By Gita Press
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गीता का ज्ञानयोग स्वामी रामसुखदास का गीता-विषयक ग्रंथ है। प्रकाशन वर्ष १९५० दर्ज है। यह पुस्तक उनके आध्यात्मिक व्याख्यान-शैली का नमूना है, जिसमें गीता के सिद्धांतों को साधक के दैनिक जीवन से जोड़कर समझाया गया है। पुस्तक में लगभग ४४८ पृष्ठों का पाठ है और इसकी विषय-सूची बड़ी विस्तृत है।
पुस्तक में गीता के अध्यायों के अतिरिक्त योग-साधना, ध्यान-विधि और आत्म-अनुभूति से जुड़े अलग-अलग विषय भी शामिल हैं। विषय-सूची में प्रत्येक पंक्ति-सन्दर्भ के साथ अलग-अलग अध्याय दिए गए हैं, जिससे पाठक अपनी रुचि के अनुसार सीधे उस हिस्से पर पहुँच सकता है। संवत् २००१ के संदर्भ भी पुस्तक में मिलते हैं, जो इसके लगातार परिवर्तन और नवीकरण को दर्शाते हैं।
गीता-अध्ययन और जीवन-शैली में सुधार चाहने वाले पाठकों के लिए यह पुस्तक अत्यंत उपयोगी है। स्वामी रामसुखदास के अन्य ग्रंथों की तरह ही इसमें भी धर्म-ज्ञान और व्यावहारिक उपदेश का सुंदर समन्वय मिलता है। साधकों और शिक्षा-जगत से जुड़े लोगों के लिए यह ग्रंथ सार्थक है।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
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- गीता में वर्णित ज्ञानयोग
- आत्म-स्वरूप तथा जगत् का स्वरूप
- विवेक तथा वैराग्य की साधना
- श्लोक-वार सरल व्याख्या
पुस्तक की मुख्य बातें
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