गीता शंकरभाष्य (हिंदी) – Gita Shankar Bhashya
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यह पुस्तक श्रीमद्भगवद्गीता नाम से प्रकाशित हुई है और उपशीर्षक में बताया गया है कि यह शंकरभाष्य का हिन्दी अनुवाद-सहित संस्करण है। अनुवादक श्रीहरिकृष्णादास गोयन्द्रका हैं, जिनका परिचय भी पृष्ठ पर दिया गया है। पृष्ठ पर यह भी अंकित है कि मूल श्लोक, भाष्य, भाष्यार्थ, टीकापर्ण और सम्बन्ध-सहित मूल श्लोकों के पदों की व्याख्या दी गई है। पैमाना लगभग 511 पृष्ठ का है।
आरंभ में एक शान्ति-पाठ दिया गया है, जिसमें ऐसा कहा गया है कि सत्ता, ज्ञान और आनन्द को विश्व में और व्यक्ति में परम मंगल माना जाता है, और शान्ति, सन्तोष तथा सदा-कल्याण के रूप में इसका पाठ किया जाता है। साथ में एक श्लोक भी दिया गया है जिसमें कहा गया है कि समस्त शास्त्रों का सार ज्ञान ही है। अनुवादक ने अपनी अनुवाद-पद्धति में प्रत्येक पद का मूल अर्थ, अनुवाद और व्याख्या तीनों दिए हैं, और श्लोकों का पाठ-क्रम भी शास्त्र-परम्परा के अनुसार बनाया गया है।
गीता और शंकराचार्य के भाष्य पर काम करने वाले पाठकों के लिए यह हिन्दी अनुवाद उपयोगी है, क्योंकि इसमें मूल श्लोक, भाष्य और भाष्यार्थ एक ही साथ मिलते हैं।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
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- धर्म-ग्रंथों का सरल हिंदी अनुवाद व भावार्थ
- पूजा-पाठ, स्तोत्र तथा नित्य-कर्म की विधि
- व्रत, त्योहार तथा संस्कारों का वर्णन
- आध्यात्मिक जीवन के नियम व प्रेरणा
पुस्तक की मुख्य बातें
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