हरि लीला — श्री सुदर्शन सिंह ‘चक्र’ जी
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हरि-लीला, जिसे शीर्षक पृष्ठ पर श्रीनिमगलनायनि अनुक्रमणिका रूपा से संकेतित किया गया है, सूरदास की रचित कृति है और उसके भजनों के संकलन के रूप में प्रकाशित हुई है। रचयिता का नाम पृष्ठ पर विद्याद्वयं श्रीनोपविष्टः के रूप में अंकित है, और हिन्दी भाषान्तर श्रीसूदर्शनसिंह चक्र ने किया है।
पुस्तक का प्रकाशन सत्-शास्त्र प्रकाशन, मथुरा, उत्तर प्रदेश से हुआ है और इसका मुद्रण गंगाप्रसाद, गोरखपुर, दिल्ली में किया गया है। प्रकाशन-पृष्ठ पर यह भी अंकित है कि यह पुस्तक भारत सरकार द्वारा निर्यातित मुख्य बनस्पति वाले कागज पर छपी है, जो पुराने भारतीय प्रकाशन की पहचान है। स्कैन की गई प्रतियों के नीचे नानाजी देशमुख पुस्तकालय, भाजपा, जम्मू की मुहर लगी हुई है, जो बताती है कि पुस्तक वहाँ से प्राप्त हुई।
हरि-लीला के भजन हिन्दू साहित्य में सूरदास की सबसे बड़ी पहचान माने जाते हैं और इनका यह संकलन भक्ति-पाठकों के लिए अभ्यास और संदर्भ दोनों का काम करता है। सूरदास की राग-रागिनी, महावाणी और अन्य पदों के पाठ के लिए यह पुस्तक उपयोगी है। श्रद्धा और भक्ति से जुड़े हिन्दू पाठकों के लिए यह एक मूल्यवान संग्रह है, और सूरदास जैसे प्रमुख कवि की रचनाओं से परिचय पाने का यह एक अच्छा माध्यम भी बन सकता है।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
कैसे पढ़ें — फ़ाइल पूरी PDF में है, जिसे मोबाइल, कंप्यूटर या किसी भी PDF ऐप में बिना इंटरनेट के पढ़ा जा सकता है। नीचे दिए बटन से इसे तुरंत और मुफ़्त डाउनलोड करें — कोई साइन-अप, सदस्यता या शुल्क नहीं।
- योगासन तथा उनकी विधि
- प्राणायाम के प्रकार तथा लाभ
- ध्यान तथा साधना के सोपान
- अभ्यास में सावधानियाँ
पुस्तक की मुख्य बातें
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