झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई – Jhansi Ki Rani Laxmibai
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यह पुस्तक झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई नाम से प्रकाशित हुई है। लेखक वृन्दावनलाल वर्मा हैं और स्वाधीनार सूरियत का नाट्य रूपान्तर नीलेश रघुवंशी ने किया है। प्रकाशक अनुजग ट्रस्ट, ठी-68 गिरतालनगर, लखनऊ 226020 है, और पृष्ठ पर मूल्य पैंतीस रुपये, पहला संस्करण 2006 तथा पुनर्मुद्रण अगस्त 2012 अंकित है। पैमाना लगभग 50 पृष्ठ का है।
आवरण-चित्र में रानी का वीर रूपांकन बना है, जिसमें तलवार और ढाल दोनों हैं, और उसके पीछे नगर का दृश्य दिखाया गया है। प्रकाशन-पृष्ठ पर लेजर राइप सेटिंग कम्प्यूटर प्रभाग, राघुल फागडेव का नाम अंकित है, और साथ में प्रकाशक अनुजग ट्रस्ट का पूरा पता दिया गया है।
पुस्तक में दृश्य एक ऐक के रूप में दिया गया है, जिसमें बच्चों को मरने वाली उस लक्ष्मीबाई की गीत चाली है, और गीत यह कहती है कि बन्देले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मदनी, वह तो झाँसी वाली रानी थी। यह पुस्तक झाँसी के ऐतिहास और नाट्य-साहित्य में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए उपयोगी है, और रानी के चरित्र को नाट्य के माध्यम से जीवंत करती है।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
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- जन्म, बचपन तथा परिवार का परिचय
- साधना, संघर्ष तथा तपस्या के प्रसंग
- समाज-सेवा तथा प्रमुख घटनाएँ
- उनके विचार, उपदेश तथा स्मृतियाँ
पुस्तक की मुख्य बातें
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