मार्कंडेय पुराण – Markendya Puran
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संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण नामक ग्रंह का संस्करण सचिवल्लभ का है। शीर्षक-पृष्ठ पर "॥ ७७ नवमे भागवते वासुदेवाय ॥" छपा है, उसके नीचे बड़े अक्षरों में "संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण" और उसके नीचे "जैमिनि-मार्कण्डेय-संवाद — वपुको दुर्बिसका शाप" अंकित है। पृष्ठों के शीर्षक-पट्ट में "मार्कण्डेय पुराण (पञ्चमः खण्डः)" छपा है, यानी यह ग्रंथ का पञ्चम खण्ड है। पुस्तक का अंतिम पृष्ठ प्रकाशक की अपनी ग्रन्थ-सूची है, जिसमें उनके अन्य प्रकाशन दर्ज हैं — भक्ति-अन्दु, श्रीपादधीराजगवत, वीणागानाघानुग्रह, शिवपुराण, पुत्रजन्माभूत, गर्भ-संहिता, नलसिंहपुराण, श्रीमणीश-अन्दु, श्रीहनुमान्-अन्दु और सृपाण्डि। पीडीएफ़ में दो सौ छियानवे पृष्ठ हैं।
पुस्तक का आरंभ दसवें पर्व "मार्कण्डेय स्तवनम्" से होता है, जिसमें जैमिनि ऋषि मार्कण्डेय से उनकी तपस और शिवजी की साधना के बारे में पूछते हैं। चित्र-व्याख्या में बताया गया है कि मार्कण्डेय ने तपस के बल से जन्म-मृत्यु के भय से मुक्ति पाने का निश्चय कर लिया था, पर एक महर्षि ने उनका रथ मोड़ लिया और इसी संवाद में वे जैमिनि के पहुँचे। आगे पृष्ठों पर शंकर द्वारा मार्कण्डेय को शमन करने तथा उनकी मूर्ति बनवाकर हरिद्वार में रखवाने की बात आती है, और "एकोऽहमेव वृत्तपर्णः" जैसे प्रसिद्ध श्लोक का भी संदर्भ मिलता है। पृष्ठों पर फूल-पत्तियों के चिह्नों वाली सीमाएँ और कथा से जुड़े चित्र बने हैं।
पुराण-पाठ को समझने के लिए यह पुस्तक उपयोगी है, क्योंकि संस्कृत मूल और हिन्दी व्याख्या साथ-साथ मिलती है, इसलिए कठिन पंक्तियाँ भी पाठक के लिए सरल हो जाती हैं। हिन्दी अनुवाद के कारण वे पाठक भी लाभान्वित होते हैं जो संस्कृत नहीं पढ़ सकते। यह पुस्तक केवल साहित्य और अध्ययन के उद्देश्य से दी गई है; किसी धर्म-साधना या अनुष्ठान का निर्देश न समझें।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
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- मार्कंडेय पुराण की कथाएँ
- दुर्गा सप्तशती का महत्व
- व्रत तथा पूजा-विधि
- धर्म तथा मोक्ष के उपदेश
पुस्तक की मुख्य बातें
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