Mera Jivan Tatha Dhyeya By Swami Vivekananda
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यह पुस्तक 'मेरा जीवन तथा ध्येय' है, जो स्वामी विवेकानन्द की आत्मकथा है। इस संस्करण का अनुवाद पण्डित जगदीशप्रसाद न्यायस, एम. ए., ने किया है, जो स्पेन ट्रेनिंग कॉलेज, जबलपुर में प्राध्यापक रहे। पुस्तक लीला डेनी काठियावाला, जबलपुर से प्राकाशित हुई और इसके प्रकाशक स्वामी भानुकेश्वरानन्द, अध्यक्ष श्रीरामकृष्ण आश्रम, धनतोली, नागपुर-१, म. प्र. हैं। यह द्वितीय संस्करण है, जिसमें कुल १९५० पृष्ठ हैं और मूल्य आठ रुपये अंकित है।
पुस्तक में स्वामी विवेकानन्द ने अपने बचपन, गुरु की प्राप्ति और संन्यास के संकल्प से लेकर भ्रमण, संगठन कार्य तथा अंतिम दिनों तक के अपने अनुभव क्रमशः वर्णित किए हैं। प्रारंभ में एक जीवन-रेखा और भूमिका दी गई है, जिसमें उनके विचारों का सार मिलता है। आत्मकथा होने के कारण पाठक उनके विचारों की विकास-यात्रा को प्रत्यक्ष रूप में देख पाता है। पुस्तक में उनके सहज, प्रभावशाली और प्रेरणादायक व्यक्तित्व का स्पष्ट परिचय मिलता है।
स्वामी विवेकानन्द की यह आत्मकथा भारतीय इतिहास और विचारधारा की अत्यंत महत्वपूर्ण पुस्तक मानी जाती है। इसे पढ़ने से व्यक्ति के विचारों में स्पष्टता आती है और जीवन के प्रति एक गहरी समझ विकसित होती है। देशभर के अनेक विद्यार्थियों और पाठकों ने इसे अपनी प्रेरणा का स्रोत बनाया है। आधुनिक पीढ़ी के लिए भी यह पुस्तक अत्यंत प्रेरणादायक है और जीवन के सही मूल्यों को समझने में मदद करती है।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
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- स्वामी जी का जीवन तथा ध्येय
- आदर्श तथा साधना
- प्रेरक प्रसंग
- उनके विचार
पुस्तक की मुख्य बातें
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