पौराणिक काव्य शास्त्र तत्वानुशीलन – Pauranik Kavya Shastra Tattvanushilan
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पौराणिक काव्यशास्त्र तत्त्वानुशीलन नामक पुस्तक के शीर्षक-पृष्ठ पर लेखिका का नाम डॉ. मण्डवी चन्द्रा दिया गया है। वे एम.ए., पी-एच.डी. तथा विद्या वाचस्पति हैं और लाल बहादुर शास्त्रीय महाविद्यालय, लखनऊ में संस्कृत विभागाध्यक्ष रह चुके हैं; वे संगीत-प्रभाकर (बाराबंकी) भी हैं। प्रकाशक भारतीय संस्कृति संस्थान, अहिल्यावाद, लखनऊ है और मुद्रक श्री विद्या प्रेस, छित्तरपुर, वाराणसी है। पृष्ठ पर मूल्य 50 पैसे अंकित है।
यह पुस्तक पौराणिक काव्यशास्त्र के सिद्धान्तों की समीक्षा और विश्लेषण तक प्रस्तुत करती है। प्रारंभ की भूमिका में लेखिका ने बताया है कि नवीन काव्य-सिद्धान्त पुराने ज्ञान को केवल अपनाना पर्याप्त नहीं मानते, बल्कि उसका मूल्यांकन भी करते हैं। इसमें भरत, मम्मट, विश्वनाथ और दण्डी जैसे प्राचीन आचार्यों के सिद्धान्तों पर विचार किया गया है, और पाठ के विभिन्न रूपों तथा उसकी अवस्थाओं पर भी बात हुई है।
आज की हिन्दी काव्य-समीक्षा में प्राचीन आचार्यों की स्थापना का पुनर्मूल्यांकन करने वाले ग्रन्थों की कमी है, और इस दृष्टि से यह पुस्तक अपना अलग महत्व रखती है। पाठकों को मालवीय नाटक-शास्त्र से लेकर आधुनिक विमर्श-शास्त्र तक की परंपरा का एक साथ दिखाई देता है। संस्कृत काव्य, नाटक और अलंकार-शास्त्र के विद्यार्थियों के लिए यह अध्ययन-सामग्री के रूप में लाभदायक है।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
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- पौराणिक काव्य शास्त्र का अध्ययन
- रस, अलंकार तथा छंद
- पुराणों का काव्य-दृष्टि से विवेचन
- शोध तथा अनुशीलन
पुस्तक की मुख्य बातें
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