मूत्र के रोग | Rog Bigyan Granthamala Mutra Ki Rog
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मूत्र के रोग असल में रोगतत्वसमिधिका नामक आयुर्वेद ग्रन्थ का हिन्दी नाम है। शीर्षक पृष्ठ पर संपादक के रूप में भास्कर गोविन्द आयोगकर का नाम दर्ज है, और यह ग्रन्थ काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी से संवत् २०७१, अर्थात लगभग 1914 ईस्वी में प्रकाशित हुआ।
पुस्तक का ढाँचा दो भागों वाला है। पहले मूत्रस्राव स्थान, मूत्रोत्पत्ति विज्ञान, मूत्र-रोगों का सामान्य विचार और उनका निदान दिया गया है। फिर वृषक अर्थात गुर्दे के रोगों का विस्तृत वर्णन आता है, जिसमें आम, पित्त, मंदाग्नि, मूत्रकृच्छ्र, अर्श, मूत्राघात और रक्तमित्र जैसे उप-वर्ग शामिल हैं। दूसरा भाग प्रमेह रोगों पर केन्द्रित है, जिसमें पाण्डु, जाड-पाण्डु, वात, पित्त, कफ, रक्त, शुक्र और क्षय-मेह जैसे प्रकार अलग-अलग अवस्थाओं का वर्णन मिलता है। अन्त में मसिरक विरोधी, धर्मशोष्ण और चारंगोतरघर्म जैसे विशेष प्रकरण भी दिए गए हैं।
यह ग्रन्थ आयुर्वेद के प्राचीन मूत्र-रोग शास्त्र का व्यवस्थित हिन्दी संकलन है और उन पाठकों के लिए उपयोगी है जो आयुर्वेद के सैद्धान्तिक ढांचे को समझना चाहते हैं। ज़रूरी बात यह है कि यह पुराने शास्त्रीय सिद्धांतों का वर्णन है, आज के प्रमाण-आधारित चिकित्सा का विकल्प नहीं; कोई भी उपचार शुरू करने से पहले योग्य वैद्य चिकित्सक से परामर्श अवश्य लें।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
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- मूत्र-रोगों के कारण तथा लक्षण
- पथरी, दाह तथा अन्य विकार
- उपचार तथा परहेज़
- रोकथाम के उपाय
पुस्तक की मुख्य बातें
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