रुद्राष्टाध्यायी | Rudrashtadhyayi By Gita Press
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रुद्राष्टाध्यायी शुक्ल यजुर्वेद के अष्टम अध्याय का नाम है, जो रुद्र के प्रति समर्पित है। प्रस्तुत संस्करण में इसका हिन्दी अनुवाद भी दिया गया है, साथ ही अभिषेक-विधि एवं पूजा-विधान का पूरा विवरण शामिल किया गया है। प्रकाशन गीता प्रेस, गोरखपुर से हुआ है। संस्करण संवत् १६२७ का दर्ज है और पुस्तक में लगभग २२९ पृष्ठों का पाठ है।
वेद के इस अध्याय में रुद्र के विरूप का वर्णन तथा शिव-शक्ति की उपासना का विधान मिलता है। यज्ञ के प्रसंग में उन्हें आह्वान करने की विधि बताई गई है। पुस्तक में अनुवाद के साथ अभिषेक और पूजा की क्रमबद्ध विधि भी दी गई है, जिससे शिव-उपासक अनुष्ठान कर सकें। मूल श्लोक और हिन्दी अर्थ दोनों साथ-साथ रखे गए हैं।
वैदिक-अध्येताओं, यज्ञ-सम्पन्न कराने वाले पुरोहितों तथा शिव-भक्तों के लिए यह पुस्तक उपयोगी है। शुक्ल यजुर्वेद के अध्ययनकर्ताओं के लिए यह ग्रंथ मूल पाठ और व्याख्या दोनों देता है। संस्कार-विधि और शिक्षा-जगत से जुड़े लोगों के लिए भी यह सहायक सिद्ध होगा।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
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- रुद्राष्टाध्यायी (श्रीरुद्रम्) का मूल पाठ
- सरल हिंदी अर्थ सहित
- पाठ की विधि तथा नियम
- रुद्र-उपासना का महत्व तथा फल
पुस्तक की मुख्य बातें
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