समरांगण सूत्रधार (वास्तुशास्त्र, भाग 2) – Samarangana Sutradhara
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समरांगण-सूत्रधारः वास्तुशास्त्रम् नामक ग्रन्थ के शीर्षक-पृष्ठ पर यह स्पष्ट लिखा है कि यह भोजदेवकृत है और यह दूसरा भाग है, जिसे अंग्रेजी शीर्षक-पृष्ठ पर Vol. II लिखा गया है। संपादक प्रो० पुष्पेन्द्र कुमार हैं, जिन्होंने इस संस्करण में विस्तृत अंग्रेजी परिचय भी जोड़ा है। प्रकाशक न्यू भारतीय बुक कार्पोरेशन, दिल्ली है, जिसका पता 5574-ए चौहान कापोलेन मार्केट, डुंगा कॉम्प्लेक्स, न्यू चन्द्रावल, दिल्ली-110007 दिया गया है। पृष्ठों पर प्रथम संस्करण 1998 और मूल्य 1200 रुपये (दो भागों में) अंकित है, तथा मुद्रक तरुण ऑफसेट है।
यह वास्तुशास्त्र अर्थात स्थापत्यशास्त्र का प्रसिद्ध संस्कृत ग्रन्थ है, जिसमें मन्दिर तथा इमारतों के निर्माण से संबंधित नाप-तौल, आकार-प्रकार, भूमि-परीक्षण और माप-मान के नियम दिए गए हैं। आवरण पर एक विशाल मन्दिर-शिखरा का चित्र बनाया गया है। पुस्तक में माप, परिमाण और गणित से जुड़े अध्याय तथा धार्मिक-सौंदर्य से जुड़ी बातें भी मिलती हैं, जो इसे स्थापत्य के इतिहास और तकनीक दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण बनाते हैं।
भोजदेवकृत समरांगण सूत्रधार वास्तुशास्त्र को प्राचीन भारतीय स्थापत्य-शास्त्र का सर्वाधिक व्यवस्थित ग्रन्थ माना जाता है, और इसकी परंपरा में आज भी अध्ययन किया जाता है। हिन्दी अनुवाद के साथ संपादित यह संस्करण उन विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं के लिए उपयोगी है जो संस्कृत वास्तु-विज्ञान पढ़ना चाहते हैं। प्राचीन भारतीय स्थापत्य, मूर्तिकला और धार्मिक कला को समझने के लिए यह ग्रन्थ आज भी अपना महत्व रखता है।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
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