Saras Parsang
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यह पुस्तक सरस-प्रसंग नाम से प्रकाशित हुई है और इसके लेखक हनुमानप्रसाद पोहार हैं, जिनका नाम आवरण-पृष्ठ पर अंकित है। आवरण पर श्रीहरिः का वन्दन छपा है, और पृष्ठ पर पञ्चमूल आश्रम मण्डल, पंचमल संस्थान, वाराणसी का उल्लेख मिलता है। पैमाना लगभग 177 पृष्ठ का है।
निर्वेदन में बताया गया है कि पद्माकर के गद्य-संस्करण में आत्मा को साक्षात् जानने का प्रयत्न किया गया है, और कि कवि ने सुमन और मन में स्थित सत्ता का साक्षात्कार करने के लिए जिस रीति का आश्रय लिया है उसका वर्णन भी किया गया है। निर्वेदन में यह भी कहा गया है कि सुमन और सत्ता के बीच के सम्बन्ध का जो अवच्छेद हुआ उसी में ईश्वर और साधक का अपरिहार्य सम्बन्ध निहित है, और ऐसे ही सुमन से सम्बन्धित दूसरे भी अनेक प्रसंग हैं।
अनुक्रम में पच्चीस अध्याय दिए गए हैं, जिनमें विशुद्ध प्रेम, नाम-जप, भगवत्-समरण का साजन, परिशुद्ध, सुमुद्र साधन, सोदर्श्य, भगवान् की लीला, हम कैसे हैं, अनन्य भाव, देवत्व, प्रेम-प्रसाद, अपेण, जैसा कहें वैसा करें, जगत्काला स्वरूप, भगवान् के क्या मानो, सेना, सखा लगा, प्रभुकरी औरर, प्रारम्भ भाग, भगवान् के आभिमें ढर नहीं, इष्टभ्रम में निष्ठा, साधुकर्मी रह, धैर्य, साधनाकी चिंता और एकनिष्ठा जैसे प्रकरण आते हैं। यह पुस्तक भक्ति-साहित्य के पाठकों के लिए उपयोगी है।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
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- रोचक तथा शिक्षाप्रद प्रसंग
- प्रेरक कथाएँ
- नैतिक शिक्षा
- सरल भाषा
पुस्तक की मुख्य बातें
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