शुक्ल यजुर्वेद प्रतिशाख्य — एक परिशीलन – Shukla Yajurveda Pratishakhya
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शुक्ल यजुर्वेद प्रतिशाख्य एक परिशीलन नामक पुस्तक डॉ० उमेश प्रसाद सिंह की लिखी है। वे संस्कृत-विभाग के वरिष्ठ अध्यापक रहे और काशी हिंद विश्वविद्यालय वाराणसी से जुड़े थे। प्रकाशन कला प्रकाशन, न्यू सर्केट कालोनी से हुआ है। पुस्तक प्रथम संस्करण की है, जिसमें लेखक द्वारा सर्वाधिकार सुरक्षित बताया गया है, और इसका आईएसबीएन 87566-02-7 अंकित है। मूल्य तीन सौ पच्चीस रुपये रखा गया है। पुस्तक लगभग दो सौ छहतीस पृष्ठों की है।
आवरण पृष्ठ पर सजावटी फूल-किनारे के भीतर शुक्ल यजुर्वेद प्रतिशाख्य एक परिशीलन नाम बड़े अक्षरों में लिखा है और उसके बीच में आश्चर्याकृति ओंकार बना है। पुस्तक का आरंभ एक विस्तृत पुरोवाक-विवेचन से होता है, जिसमें विश्वतो यन्तु देवा इस पंक्ति के आधार पर बताया गया है कि ऋषियों ने जिस प्राणी और उसकी शक्ति को अपना अभिषेचक बनाया वह देवताओं का अधिपति था, और इसी से रुद्र-विश्व अथवा रुद्र-अश्व जैसे नाम पड़े। इसके बाद अध्याय, उपाध्याय और प्रकरण-विभाजन दिया गया है। विषय-सूची में धर्म, शंख, यज्ञ और तीर्थ संबंधी अनुसूचियाँ अलग-अलग पृष्ठ-अंकों के साथ दी गई हैं।
शुक्ल यजुर्वेद वैदिक साहित्य का अत्यंत प्राचीन और कठिन ग्रंथ है, जिसके अर्थ-निरूपण में अनुवादिक की गहरी अनुभवशक्ति चाहिए। इस पुस्तक में विद्वान ने उसी कठिन पाठ को सरल भाषा में खोलकर रखा है, इसलिए संस्कृत जानने वाले और न जानने वाले — दोनों पाठकों के लिए यह उपयोगी है।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
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- आत्मा तथा ब्रह्म का स्वरूप
- जगत् की उत्पत्ति, माया तथा अद्वैत
- साधना, ध्यान तथा आत्मज्ञान के सोपान
- उपनिषद् तथा गीता का सार
पुस्तक की मुख्य बातें
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