Vishrama Sagar
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यह पुस्तक विश्रामसागर नाम से प्रकाशित हुई है और शीर्षक-पृष्ठ पर इसे सटीक कहा गया है, साथ ही संशोधित संस्करण और वैकल्पिक के रूप में श्री कौशल किशोर श्रीवास्तव का नाम अंकित है। मूल रचयिता बाबा रघुनाथदास रामसनेही हैं, जिन्हें श्रीमहाराज कहा गया है। प्रकाशक मुरलीपोकर, बर्जई तरा साथी, लखनऊ है और प्रथमाकर तेजकुमार बुक डिपो लिमिटेड, लखनऊ से भी प्रकाशित हुआ है। पैमाना लगभग 1127 पृष्ठ का है।
प्रकाशन-पृष्ठ पर यह भी अंकित है कि उत्तराधिकारी नवल किशोर बुक डिपो, लखनऊ है, और पुस्तक श्रीमती सिता पदवर्धन द्वारा एक हज़ार रुपये के स्टैम्प पर लखनऊ में मुद्रित हुई है। छठी बार का संस्करण 2000 का है और सन् २०१४ में पुनः प्रकाशित हुआ, जिसका मूल्य तीन सौ रुपये दिया गया है।पृष्ठ पर यह भी अंकित है कि इस पुस्तक में श्रीमहाराज रघुनाथदासर्जी शिष्यों के साथ समाज में बैठे हुए कथा-वार्ता कर रहे हैं, जिससे पाठकों को उनके जीवन के वास्तविक संवाद का सजीव रूप मिलता है।
यह पुस्तक वेदान्त-विषयक पाठकों के लिए अत्यंत उपयोगी है, और सटीक-पाठ के रूप में मूल ग्रन्थ के भाव को समझने में मदद करती है।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
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- भक्ति तथा ज्ञान का संकलन
- संत-वाणी तथा प्रसंग
- साधना तथा उपदेश
- आत्म-कल्याण के उपाय
पुस्तक की मुख्य बातें
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