आयरन के फायदे और नुकसान | Iron Benefits, Sources & Side Effects In Hindi

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आयरन के फायदे और नुकसान | Iron Benefits, Sources & Side Effects In Hindi

आयरन क्या होता है ?

आयरन(लोहा) हमारे शरीर के लिए, एक महत्वपूर्ण पोषक तत्व है। एक सामान्य वयस्क व्यक्ति के शरीर में, लगभग 4 से 5 ग्राम लोहा मौजूद रहता है जिसका 70% हिमोग्लोबिन के रूप में रक्त में रहता है, 4% भाग मांस पेशियों में, 25% भाग यकृत, अस्थि मज्जा, तिल्ली, गुर्दो आदि में संग्रहीत रहता है और 1% रक्त प्लाज्मा में और आक्सीकरण की प्रक्रिया कराने वाले विभिन्न एंजाइमों में पाया जाता है।

आयरन के फायदे और उपयोगिता : iron ke fayde aur labh in hindi

शरीर में लोहे की आवश्यकता, आक्सीकरण की विभिन्न क्रियाओं को सम्पन्न करने के लिए होती है। हिमोग्लोबिन नामक तत्व के रूप में, रक्त द्वारा विभिन्न अंगों के लिए, आक्सीजन के परिवहन जैसे अति आवश्यक कार्य सम्पन्न करने के लिए लोह तत्व की उपस्थिति अत्यन्त महत्वपूर्ण और आवश्यक है। लोह तत्व, शरीर में प्रोटीन के साथ मिल कर मायोग्लोबिन नामक तत्व बनाता है जो मांसपेशियों में आक्सीजन का संग्रह करता है। शरीर में कुछ एंज़ाइम्स ऐसे होते हैं जो आक्सीकरण की क्रिया के लिए आवश्यक होते हैं। इन एंजाइम्स का निर्माण करने तथा इन्हें सक्रिय रखने के लिए लोहतत्व की उपस्थिति बहुत आवश्यक होती है।

आयरन के स्रोत और प्राप्ति के साधन : iron ke srot

लोह तत्व की प्राप्ति के लिए दैनिक आहार में उपयोग किये जाने वाले अनाजों का स्थान महत्वपूर्ण है। इसके अलावा शाकाहार में हरी पत्तीदार सब्ज़ियां, फलियां और गुड़ आदि लोह तत्व की प्राप्ति के लिए अच्छे साधन हैं। इनके अलावाअन्य पदार्थ जैसे अंजीर, खूबानी, खजूर, मुनक्का, शहद आदि में लोह तत्व पर्याप्त मात्रा में रहता है। साबुत अनाजों में उपलब्ध लोह तत्व, पिसने की क्रिया में, अधिकांश नष्ट हो जाता है।

आयरन की दैनिक आवश्यकता :

लोह तत्व की दैनिक आवश्यकता अनेक बातों पर निर्भर करती है जैसे व्यक्ति का आयु-समूह, लिंग, विशेष शारीरिक स्थितियां आदि। अन्य आयु समूहों की तुलना में किशोरी बालिकाओं को लोहे की आवश्यकता अधिक होती है। इसी प्रकार पुरुषों की तुलना में महिलाओं को भी लोहे की आवश्यकता अधिक होती है। पोषण विशेषज्ञों ने विभिन्न अवस्थाओं में लोह तत्व की आवश्यकता इस प्रकार प्रस्तावित की
गई है

आयु वर्ग              लोह तत्व की मात्रा (मि.ग्रा./प्रतिदिन)

शैशवावस्था ——————1.0
बाल्यावस्था——————- 15-20
1 से 12 वर्ष ——————-25
किशोरावस्था —————–35
13 से 18 वर्ष लड़के ———–25
लड़कियां ——————–35
वयस्कावस्था पुरुष ———–20
महिला ———————-25
गर्भवती——————–  40
शिशु दुग्ध पान अवस्था—- 30-35

आयरन की कमी के लक्षण :

1-रक्ताल्पता: दैनिक आहार में, लौह तत्व की पर्याप्त मात्रा न होने से, शरीर में रक्ताल्पता नामक व्याधि हो जाती है जिसे बोलचाल की भाषा में खून की कमी’ कहा जाता है।वास्तव में लोह तत्व की कमी होने से, हमारे शरीर में खून की कमी नहीं होती।बल्कि खून में मौजूद लाल रक्त कणों में पाये जाने वाले हिमोग्लोबिन नामक तत्व की मात्रा कम हो जाती है ।इस कारण खून में आक्सीजन-परिवहन क्षमता में कमी हो जाती है जिससे शरीर के विभिन्न अंगों एवं उनकी कोशिकाओं को, पर्याप्त आक्सीजन न मिलने से, उनकी कार्य क्षमता में कमी आने लगती है, व्यक्ति सुस्त व उदास रहने लगता है, कमजोरी और थकावट का अनुभव करने लगता है। इस स्थिति को रक्ताल्पता या बोलचाल के शब्दों में खून की कमी’ कहा जाता है।

2- एनीमिया : लोह तत्व की कमी के कारण होने वाले एनीमिया को माइक्रोसाइटिक या हायपोक्रॉमिक कहते हैं ।
माइक्रोसाइटिक का अर्थ लाल रक्त-कणों का आकार छोटा होना होता है जबकि हायक्रोमिक का अर्थ, इन कणों के रंग में कमी होना होता है। इस तरह की रक्ताल्पता पोषण सम्बन्धी कारणों से होती है। लोह तत्व की कमी अथवा प्रोटीन की कमी होने पर हिमोग्लोबिन का निर्माण ठीक तरह से नहीं हो पाता। इसके अलावा किसी दुर्घटना या अन्य किसी कारण से रक्त स्राव होना या शरीर की वृद्धि होने की अवस्था में, जबकि आहार में पोषक तत्व युक्त पदार्थों की कमी या अभाव हो तो भी रक्ताल्पता की स्थिति पैदा हो जाती है। ऐसी स्थिति में लोह तत्व और प्रोटीन युक्त पदार्थों का सेवन करना ज़रूरी हो जाता है वरना हिमोग्लोबिन का निर्माण ठीक प्रकार से न हो सकेगा। कई बार ऐसा भी होता है कि आहार में ग्रहण किये गये लोह तत्व का शरीर में, उचित पाचन न होने से, अवशोषण नहीं होता और शरीर में लोह तत्व की कमी हो जाती है। एनीमिया की स्थिति शिशुओं, छोटे बच्चों, किशोर आयु की बालिकाओं और गर्भवती महिलाओं में विशेष रूप से पाई जाती है । इस विषय में विवरण प्रस्तुत है।

विभिन्न अवस्थाओं में लोह तत्व की कमी :

शिशु अवस्था में आयरन की कमी के कारण और दूर करने के उपाय :

एक स्वस्थ और उत्तम पोषित शरीर वाली मां के शिशु के शरीर में जन्म से तीन चार मास तक, पोषक तत्वों का संग्रह पर्याप्त मात्रा में रहता है। इसके बाद इस संग्रह में कमी होने लगती है। इस समय शिशु का आहार सिर्फ दूध होता है। जिसमें लोह तत्व की मात्रा बहुत न्यून होती है इसीलिए 4-5 माह बाद दूध के साथ, शिशु को ऊपरी तरल आहार देना शुरू करने की सलाह दी जाती है। इस समय यदि लोह तत्व युक्त कोई पदार्थ आहार में शामिल न किया जाए तो शिशु में खून की कमी होना शुरू हो जाता है।
शैशव अवस्था में खून की कमी होने का सम्बन्ध मां की गर्भावस्था में किये गये आहार-विहार से भी रहता है। यदि गर्भकाल में गर्भवती स्वयं ही खून की कमी से पीड़ित रही हो, जो कि भारत में आमतौर पर होता पाया जाता है, तो गर्भस्थ शिशु का शरीर भी पैदायशी खून की कमी वाला होगा ही।
गर्भकाल में पोषकतत्वों से युक्त आहार और खाद्य पदार्थों का सेवन न करने से भी शिशु इस समय समस्या से ग्रस्त हो जाता है। उसके शरीर में हिमोग्लोबिन की कमी बनी रहती है।
उपाय – ऐसी स्थिति न बने इसके लिए गर्भवती स्त्री को अंकुरित अन्न, पत्तीदार सब्ज़ियां, मौसमी फल, दूध और लोहतत्व युक्त औषधि का सेवन करना चाहिए।

बाल्यावस्था में आयरन की कमी के कारण ,लक्षण और दूर करने के उपाय :

ऐसा पाया गया है कि जिन शिशुओं को माताओं ने अपना दूध पिलाना बन्द कर ऊपरी आहार दिया वे शिशु भी बाल्यावस्था में खून की कमी होने की समस्या से पीड़ित रहते हैं। गरीबी और अज्ञानता के कारण ऊपरी आहार में, ऐसी माताएं आलू, चावल, पानी मिला दूध जैसे सस्ते पदार्थ देती हैं जो कि दालों और सब्ज़ियों का तुलना में सस्ते होते हैं। गुड़ की जगह शक्कर का प्रयोग ज्यादातर किया जाता है। इससे बच्चों की भूख तो मिट जाती है पर उनके शरीर को आवश्यक पोषण नहीं मिल पाता। नतीजा यह होता है कि बच्चा धीरे-धीरे रक्ताल्पता से ग्रस्त हो जाता है।
जब बच्चा उम्र की बाढ़ की अवस्था में होता है तब उसके शरीर के हर एक अंग को लोह तत्व की ज़रूरत होती है। स्कूल जाना शुरू करने से पहले और स्कूल जाने की अवस्था में यह ज़रूरत और बढ़ जाती है । इस समय बच्चे को तले हुए पदार्थ या ब्रेड बिस्कुट आदि जैसे तैयार भोज्य पदार्थों का प्रयोग कराने से भी बच्चा रक्ताल्पता से ग्रस्त हो जाता है। उसका पेट, पोषक गुण युक्त आहार से भरने की बजाय साधारण खाद्य पदार्थों से भरता है इससे भी रक्ताल्पता की स्थिति बन जाती है। बच्चा सुस्त और उदास रहता है तथा उसकी त्वचा की चमक कम होती है। नाखून, होंठ, हथेली और आंखों का रंग सफ़ेद होता जाता है। भूख कम हो जाती है जिससे शरीर का विकास रुक जाता है।
उपाय – इस स्थिति से बचने के लिए शुरू से ही शिशु को पोषक आहार देना चाहिए। उसको नरम, सुपाच्य, अंकुरित अनाज, पत्तीदार सब्ज़ियां, दूध व दूध से बने पदार्थ शक्कर की जगह गुड़ का सेवन कराना चाहिए।

किशोरावस्था में आयरन की कमी के कारण ,लक्षण और दूर करने के उपाय :

इस अवस्था में लड़कियों को दो कारणों से, खून की कमी होने की शिकायत होती है। पहला कारण तो यह कि इस उम्र में लड़कियों में सौन्दर्य बोध पैदा हो जाता है। शरीर को यथास्थिति रखने के लिए और फिगर मेन्टेन करने के लिए वे भरपेट भोजन नहीं करतीं और कम खाना खाती हैं क्योंकि फैशन परस्ती के इस युग में, दुबलेपन को सुन्दरता का प्रमुख लक्षण मान कर लड़कियां दुबली पतली रहना पसन्द करती हैं। दूसरा कारण मासिक धर्म शुरू हो जाना होता है, इसी समय शरीर की बढ़त का समय भी होता है और शारीरिक वृद्धि और विकास के लिए इस समय शरीर के लिए लोह तत्व का होना ज़रूरी होता है। इसके लिए ही इस आयु में पौष्टिक आहार लेना ज़रूरी हो जाता है।यदि ऐसा न हो तो बालिका को एनीमिया हो जाएगा।

गर्भावस्था में आयरन की कमी के कारण ,लक्षण और दूर करने के उपाय :

हमारे देश में 70% से अधिक महिलाएं, गर्भकाल में रक्ताल्पता से ग्रस्त रहती हैं। यही हाल शिशु को दूध पिलाने वाली महिलाओं का होता है। गर्भावस्था में भ्रूण के शरीर में रक्त निर्माण के लिए लोह तत्व की बहूत आवश्यकता होती है। यदि यह आवश्यकता पूरी न की जाए तो गर्भवती महिला को चक्कर आना, थकावट व कमज़ोरी मालूम देना, सांस लेने में परेशानी होना, त्वचा में पीलापन, पैर के टखनों व एडी पर सूजन आना आदि लक्षण प्रकट होते हैं। यह स्थिति ठीक न की जाए तो स्थिति गम्भीर हो जाती है और कभी-कभी गर्भपात हो जाने की सम्भावना भी बन जाती है। एनीमिया की स्थिति में सुधार लाने के लिए आहार में परिवर्तन करना आवश्यक है। शारीरिक वृद्धि और विकास के समय में आहार पर विशेष ध्यान देना चाहिए। लोह तत्व की पर्याप्त मात्रा शरीर को उपलब्ध कराने के लिए सूखे मेवे जैसे अंजीर, खूबानी, किशमिश, छुआरा, ताज़े फल जैसे केला, सेवफल, पका लाल टमाटर, गाजर, हरी पत्तीदार सब्ज़ियां, अंकुरित अनाज का पर्याप्त मात्रा में सेवन करना चाहिए। नियमित सेवन से स्थिति में सुधार हो जाता है। विटामिन सी की उपस्थिति में लोह का शोषण बढ़ जाता है अतः आहार में विटामिन सी से युक्त पदार्थों को भी शामिल कर लेना चाहिए। यदि आहार द्वारा स्थिति में सुधार न हो तो चिकित्सक से परामर्श करके दवाई का सेवन कर लोह तत्व की पूर्ति कर लेना चाहिए।

आयरन की आयुर्वेदिक दवा :

अच्युताय हरिओम फार्मा द्वारा निर्मित आयरन की कमी दूर करने वाली लाभदायक आयुर्वेदिक औषधियां ।

1) स्पेशल च्यवनप्राश केशर युक्त(Chayawanprash Kesar)
2) अश्वगंधा पाक (Ashwagandha Pak)

प्राप्ति-स्थान : सभी संत श्री आशारामजी आश्रमों( Sant Shri Asaram Bapu Ji Ashram ) व श्री योग वेदांत सेवा समितियों के सेवाकेंद्र से इसे प्राप्त किया जा सकता है ।
(वैद्यकीय सलाहनुसार सेवन करें)

2018-09-21T17:24:21+00:00By |Ayurveda|0 Comments

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