जो रोग शरीर में वायु के कारण पैदा होता है उसे वातरोग कहते हैं। वायु का दोष त्रिदोषों (वात, पित्त और कफ) में से एक मुख्य दोष हैं। यदि इसमें किसी प्रकार का विकार पैदा होता है तो शरीर में तरह-तरह के रोग पैदा हो जाते हैं जैसे- मिर्गी, हिस्टीरिया, लकवा, एक अंग का पक्षाघात, शरीर का सुन्न होना आदि।

लक्षण :

वायु के कुपित होने पर संधियों (हडि्डयों) में संकुचन, हडि्डयों में दर्द, शरीर में कंपन, सुन्नता, तीव्र शूल, आक्षेप (बेहोशी), नींद न आना, प्रलाप, रोमांच, कूबड़ापन, अपगन्ता, खंजता (बालों का झड़ जाना), थकान, शोथ (सूजन), गर्भनाश, शुक्रनाश, सिर और शरीर के सारे भाग कांपते रहते हैं, नाक, लकवे से आधा मुंह टेढ़ा होना और गर्दन भी टेढ़ी होना या अन्दर की ओर धंस जाने जैसे लक्षण प्रकट होते हैं।

वातरोग में रोगी का पेट फूल जाता है, शरीर का रंग बदल जाता है। दांतों का भिंच जाना, बेहोशी और पसीना आना, मुंह से आवाज नहीं निकलना तथा आंख, नाक, भौहे और गालों में दर्द होता है। कूल्हे की हड्डी, कमर, पीठ, जांघ और पांवों में सुई चुभने जैसा दर्द होता है। यह बीमारी कमर से लेकर पांवों के टखनों तक फैल जाती है।

भोजन तथा परहेज :

गेहूं की रोटी, घी और शक्कर (चीनी) डाला हुआ हलुवा, साठी चावल-पुनर्नवा के पत्तों का साग, अनार, आम, अंगूर, अरण्डी का तेल और अग्निमान्द्य (पाचनक्रिया का मन्द होना) न हो तो उड़द की दाल ले सकते हैं।

वातरोग में चना, मटर, सोयाबीन, आलू, मूंग, तोरई, कटहल, ज्यादा मेहनत, रात में जागना, व्रत करना, ठंड़े पानी से नहाना जैसे कार्य नहीं करने चाहिए। रोगी को उड़द की दाल, दही, मूली आदि चीजें नहीं खानी चाहिए क्योंकि यह सब चीजें कब्ज पैदा करती है।
आइये जाने गठिया वात(Gathiya Vat)रोग दूर करने के अनुभूत घरेलू उपाय

Home Remedies for Gout in Hindi

वातरोग Vat rog(Gout)

पहला प्रयोगः दो तीन दिन के अंतर से खाली पेट अरण्डी का 2 से 20 मि.ली. तेल पियें। इस दौरान चाय-कॉफी न लें। साथ में दर्दवाले स्थान पर अरण्डी का तेल लगाकर, उबाले हुए बेल के पत्तों को गर्म-गर्म बाँधने से वात-दर्द (Vat rog)में लाभ होता है।

दूसरा प्रयोगः निर्गुण्डी के पत्तों का 10 से 40 मि.ली. रस लेने से अथवा सेंकी हुई मेथी का कपड़छन चूर्ण तीन ग्राम, सुबह-शाम पानी के साथ लेने से वात रोग में लाभ होता है। यह मेथीवाला प्रयोग घुटने के वातरोग में भी लाभदायक है। साथ में वज्रासन करें।

तीसरा प्रयोगः सोंठ के 20 से 50 मि.ली. काढ़े में 5 से 10 ग्राम अरण्डी का तेल डालकर सोने के समय लेने से खूब लाभ होता है। यह प्रयोग सायटिका एवं लकवे में भी लाभदायक है।

संधिवात (Arthritis)-

पहला प्रयोगः निर्गुण्डी के 30-40 पत्तों को पीसकर नाभि पर लगाने से एवं 10 से 40 मि.ली. पिलाने से संधिवात(sandhi vata) में आराम मिलता है।

दूसरा प्रयोगः अडूसे की छाल का 2 ग्राम चूर्ण लेने से तथा महानिंब के पत्तों को उबालकर बाँधने से संधिवात में लाभ होता है।

तीसरा प्रयोगः सोंठ के साथ गुडुच का काढ़ा 20 से 50 मि.ली. पीने से संधिवात(sandhi vata) दूर होता है।

कमर का वातरोग-

निर्गुण्डी के 20 से 50 मि.ली. रस में अरण्डी का 2 से 10 मि.ली. तेल मिलाकर पीने से कमर के दर्द में राहत मिलती है। कमर से पाँव तक शरीर को हल्के हाथ से दबाकर सेंक करना, सुप्तवज्रासन, धनुरासन, उत्तानपादासन, अर्धमत्स्यासन आदि करना भी अत्यधिक लाभदायक है। यदि बुखार न हो और भूख अच्छी लगती हो तो मालिश भी कर सकते हैं।

पैरों का वात (सायटिका)-

पहला प्रयोगः सरसों के तेल में सोंठ व कायफल की छाल गर्म करके मालिश करने से अथवा पीड़ित भाग पर अरण्डी का तेल लगाकर ऊपर से थोड़े गर्म किये हुए अरण्डी के पत्ते रखकर पट्टी बाँधने से लाभ होता है।

दूसरा प्रयोगः लहसुन की 10 कलियों को 100 ग्राम पानी एवं 100 ग्राम दूध में मिलाकर पकायें। पानी जल जाने पर लहसुन खाकर दूध पीने से सायटिका में लाभ होता है।

तीसरा प्रयोगः निर्गुण्डी के 40 ग्राम हरे पत्ते अथवा 15 ग्राम सूखे पत्ते एवं 5 ग्राम सोंठ को थोड़ा कूटकर 350 ग्राम पानी में उबालें। 60-70 ग्राम पानी शेष रहने पर छानकर सुबह-शाम पीने से सायटिका में लाभ होता है।

आमवात (गठिया) (Gout)-

इसमें जोड़ों में दर्द व सूजन रहती है। शरीर में संचारी वेदना होती है अर्थात दर्द कभी हाथों में होता है तो कभी पैरों में । इस रोग में अधिकांशतः उपचार के पूर्व लंघन आवश्यक है तथा प्रात: पानी प्रयोग एवं रेत या अँगीठी (सिगड़ी) का सेंक लाभदायक है। 3 ग्राम सोंठ को 10 से 20 मि.ली. (1-2 चम्मच) अरण्डी के तेल के साथ खायें।

पहला प्रयोगः 250 मि.ली. दूध एवं उतने ही पानी में दो लहसुन की कलियाँ, 1-1 चम्मच सोंठ और हरड़ तथा 1-1 दालचीनी और छोटी इलायची डालकर पकायें। पानी जल जाने पर वही दूध पीयें।

दूसरा प्रयोगः ‘पानी प्रयोग’ के अलावा निम्नलिखित चिकित्सा करें।

पहले तीन दिन तक उबले हुए मूँग का पानी पियें। बाद में सात दिन तक सिर्फ उबले हुए मूँग ही खायें। सात दिन के बाद पंद्रह दिन तक केवल उबले हुए मूँग एवं रोटी खायें।

सुलभ हो तो एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति अपनायें।

औषधियाँ- सिंहनाद गुगल की 2-2 गोली सुबह, दोपहर व शाम पानी के साथ लें।

‘चित्रकादिवटी’ की 2-2 गोली सुबह-शाम अदरक के साथ 20 मि.ली. रस व 1 चम्मच घी के साथ लें।

विशेष : अच्युताय हरिओम संधिशूल हर योगअच्युताय हरिओम रामबाण बूटी ” व “अच्युताय हरिओम गौझरण अर्क” सभी प्रकार के वात रोग को दूर करता है .