पूज्य बापू जी का संदेश

ऋषि प्रसाद सेवा करने वाले कर्मयोगियों के नाम पूज्य बापू जी का संदेशधन्या माता पिता धन्यो गोत्रं धन्यं कुलोद्भवः। धन्या च वसुधा देवि यत्र स्याद् गुरुभक्तता।।हे पार्वती ! जिसके अंदर गुरुभक्ति हो उसकी माता धन्य है, उसका पिता धन्य है, उसका वंश धन्य है, उसके वंश में जन्म लेने वाले धन्य हैं, समग्र धरती माता धन्य है।""ऋषि प्रसाद एवं ऋषि दर्शन की सेवा गुरुसेवा, समाजसेवा, राष्ट्रसेवा, संस्कृति सेवा, विश्वसेवा, अपनी और अपने कुल की भी सेवा है।"पूज्य बापू जी

यह अपने-आपमें बड़ी भारी सेवा है

जो गुरु की सेवा करता है वह वास्तव में अपनी ही सेवा करता है। ऋषि प्रसाद की सेवा ने भाग्य बदल दिया

मेहनत की रोटी …(बोध कथा)| motivational stories in hindi

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मेहनत की रोटी …(बोध कथा)| motivational stories in hindi

प्रेरणादायक हिंदी कहानि : Inspirational Hindi story

★ अपने आसपास में देखें, शायद अपने से कोई ज्यादा दुःखी दीन हो । अपने पास दो रोटियाँ हों और वह बिल्कुल भूखा हो तो एकाध रोटी उसे दे दें । उससे शायद हमें थोडा भूखा रहना पडेगा, मगर वह बाहर की भूख अंदर में तृप्ति देगी |

★ गाँव में कोई गरीब हो, व्यसनी और दुराचारी न हो, दुःखी हो तो उसकी सेवा करना, उसकी सहायता करना, इससे अन्तर्यामी परमात्मा प्रसन्न रहता है ।
अपना पेट भरने के लिए कुत्ता भी पूँछ हिला देता है, इसमें क्या बडी बात है ? कौआ भी काँ-काँ कर लेता है ।

बैष्णवजन तो तेने रे कहिये,
जे पीड पराई जाणे रे ।
पर दुःखे उपकार करे तोये मन अभिमान न आणे रे ।।

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★ शंकरजी महाराज दुष्काल के समय में गाँव-गाँव जाकर गरीब कुटुम्बों में अनाज और गुड का वितरण कर रहे थे । वे एक किसान के घर पहुँचे । बारह तेरह साल की लडकी बाहर आयी । उससे पूछा- ‘‘घर में कोई नहीं है ?

★ लडकी बोली – ‘‘मेरी माँ मजदूरी करने खेत में गयी है और मेरे पिता को दो साल हुये स्वर्गवास हो गया है ।
शंकरजी महाराज बोले-‘‘ले बेटा, यह गुड ले ले ।
उनको हुआ, यह विधवा का घर है । दूसरों को देते हैं उससे जरा ज्यादा इनको देना चाहिए ।
मगर वह लडकी कहती है-‘‘हमें नहीं चाहिए ।

★ ‘‘क्यों ?
‘‘मेरी माँ बताती है कि हमने मेहनत न की हो ऐसा किसी का मुफ्त नहीं लेना चाहिए । हराम का खाने से बुद्धि कुण्ठित होकर हलके विचार करती है ।
‘‘तेरी माँ मजदूरी ही करती है और कुछ है तुम्हारे पास ?
‘‘हमारे पास चार बीघा जमीन थी । मगर गाँव में पानी की बहुत कमी थी तो मेरी माँ ने जमीन बेचकर गाँव में पानी का कुँआ खुदवाया, जिससे कि गाँववालों को सुविधा से पानी मिल सके । अब मेरी माँ मेहनत करती है ।हमें गुड नहीं चाहिए ।

★ यह संस्कृति अब भी भारत के गाँवों में है और यही भारत की आध्यात्मिकता के दर्शन कराती है ।
परहित में अपना देने में देर न करें । मगर मुफ्त का, दान का लेने में संकोच करें ।

श्रोत – ऋषि प्रसाद मासिक पत्रिका : Hindi Storie with Moral

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