चकोतरा : Grapefruit In Hindi

नींबू की जाति का यह फल है जो खरबूजे के बराबर तक बड़ा होता है। इसका छिलंका नारंगी से मोटा और खुरदरा होता है तथा इसका गूदा लाल होता है जो स्वाद में खट-मीठा होता है। फल के भीतर संतरे की तरह किन्तु बड़ी-बड़ी सफेद रंग की फाकें होती हैं। इसके बीज विजौरे नींबू जैसे ही, किन्तु उनके कुछ छोटे होते हैं। यह कच्ची अवस्था में हरा तथा पकने पर पीले रंग का हो जाता है।
यह मलेशिया और इन्डोनेशिया से सर्वत्र आया है। भारतवर्ष में अब यह प्रायः सर्वत्र पाया जाता है। हुगली (पं० बंगाल) का चकोतरा सबसे उत्तम होता है। उत्तराखण्ड, उ०प्र०, पंजाब, महाराष्ट्र, तमिलनाडु में भी यह लगाया जाता है। इस फल में शर्करा तथा साइट्रिक एसिड (निम्बुकाम्ल) होता है और छिलकों में एक उत्पत् तैल पाया जाता है।
यह समस्त भारत में पाया जाता है। इसको संस्कृत में मधु कर्कटी, हिन्दी मेंचकोतरा, गगरिया नींबू तथा लेटिन में- साइट्रस मेक्सिमा (Citrus Maxima Mer.) कहा जाता है तथा यह जम्बीर कुल का होता है।

चकोतरा के औषधीय गुण :

✦यह गुरु, शीतल, रुचिकर, वृष्य, रक्तपित्तशामक है।
✦यह क्षय, श्वास, खांसी, हिक्का और भ्रम (चक्कर) आदि रोगों में लाभदायक कहा गया है।
✦आचार्य चरक ने जिसका फलवर्ग में अम्लवेत के नाम से वर्णन किया गया है। वह इससे अलग है। कई व्यक्ति चकोतरे के सुखाये हुए गूदे को ही अम्लवेत के नाम से उपयोग में लाते हैं। वस्तुतः अम्लवेत तो बहुत खट्टा होता है इसलिए इसे ‘अम्लनामक’ नाम से जाना जाता है। जबकि चकोतरा खट्टा-मीठा होता है।
✦चकोतरा का वर्णन भावमिश्र ने मधु कर्कटी के नाम से किया है। द्रव्यगुण संग्रह के रचयिता चक्रपाणिदत्त ने भी मधुकर्कटी कहा है। इसकी टीका में शिवदास ने स्पष्ट किया है कि यह बिजौरा नींबू की अपेक्षा बड़ा और गूदे वाला होता है। इसके फल केशर बड़े और एक दूसरे से अलग होते हैं।
✦इन आचार्यों के वर्णन के अनुसार यह मधुर, पचने में भारी, ठण्डी तासीर वाला, रुचिकारक और पौरुष शक्ति वर्द्धक होता है। यह मूत्रल, अनुलोमक एवं आमदोषहर भी है।
✦कहते हैं कि जापान और जर्मनी में काली गाय को गुंवार, करेला, जामुन, चकोतरा; चना, बेलपत्र, आमपत्र, नीम-पत्र आदि खिलाकर उस दूध को मधुमेहारि दूध के नाम से मधुमेहियों के उपचार हेतु उपयोग में लाया जाता है।

विभिन्न रोगों के उपचार में चकोतरा के फायदे :

१. पित्त प्रकोप में-
चकोतरे के रस में शक्कर मिलाकर सेवन करने से पित्त प्रकोप शांत होता है।

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२. पागलपन में –
गर्मी के कारण उत्पन्न पागलपन में इसके रस को प्रात:काल पिलाना हितकर होता है।

३. कटिशूल में –
कमर के दर्द को दूर करने के लिए इसके रस में ५०० मि.ग्राम जवाखार और दो चम्मच शहद मिलाकर प्रयोग में लाते हैं।

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४. जुकाम में-
फल के अंदर की फाकों का ऊपरी सफेद छिलका और बीजों को निकालकर ऊपर थोड़ी शक्कर बुटक कर उसे आग पर सेक कर चूसने से जुकाम दूर होती है।

५. अरुचि में-
इसके रस में नमक एवं काली मिर्च का चूर्ण मिलाकर पिलाने से अरुचि रोग दूर होता है।

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६. मूत्राघात में-
पेशाब नहीं उतरने पर इसके रस में जवाखार और कलमी शोरा एक-एक ग्राम मिलाकर सेवन कराते हैं।

७. मेद वृद्धि में-
चर्बी के अधिक बढ़ने पर इसके रस में बराबर पानी और २-३ चम्मच शहद मिलाकर नियमित पिलायें।

८. प्लीहा वृद्धि में-
इसके रस में आलू बुखारे का रस मिलाकर दें।

९. जी मिचलाने में-
इसके छिलकों का शर्बत बनाकर प्रयोग में लें।

१०. उल्टी में-
इसके छिलकों को गर्म पानी में पीसकर छानकर पिलाने से उल्टी बंद होती है।

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११. आमाशय विकारों में-
इसके छिलकों के टुकड़ों का मुरब्बा बनाकर सेवन करायें।

१२. सिर दर्द में-
वायु के कारण उत्पन्न सिरदर्द में इसके छिलकों को पीस ललाट पर लगाने से लाभ होता है।

१३. कीड़ों में-
आंत में रहने वाले कीड़े इसके छिलकों के क्वाथ पीने से मर जाते है।

१४-मलेरिया में –
एक पका हुआ चकोतरा लें। बीच से काटें। आधा चकोतरा का गूदा निकालें। एक गिलास पानी में उबालें। निचोड़-छानकर रोगी को दें। जब तक जरूरत हो देते रहें।

चकोतरा के नुकसान : Grapefruit Side Effects

इसकी अधिक मात्रा यकृत को नुकसान पहुँचाती है, इसके निवारण के लिए मधु और चीनी का सेवन हितकारी है।