निर्गुण्डी के 55 चमत्कारी फायदे व आयुर्वेदिक नुस्खे | Nirgundi ke Fayde

निर्गुण्डी क्या है ? :

निर्गुण्डी के पौधे पूरे भारत में अपने आप उग आते हैं। इसके पौधे उष्ण (गर्म) प्रदेशों में बहुत ज्यादा मात्रा में पाये जाते हैं। इसे खेतों की मेंड़ों पर, बाग-बगीचों में तथा घरों में भी इसे लगाया जाता है।

निर्गुण्डी का पौधा कैसा होता है ? :

निर्गुण्डी के पौधे की ऊंचाई 180 से 360 सेमी होती है। तने से पतली-पतली अनेक शाखाएं निकलती हैं। सारे पौधे पर छोटे रोम लगे रहते हैं। पत्तियों के वृत्त 3 से 5 पत्तों से युक्त होते हैं। निर्गुण्डी के झाड़ीदार पौधों से एक प्रकार की तेज अपंसद बदबू आती है। इसके पत्ते 5 से 15 सेमी लंबे, सफेद और भूरे रोएदार होते हैं। फूल छोटे-छोटे, गोल, एक इंच से छोटे और पकने पर काले रंग के होते हैं।

निर्गुण्डी की तासीर : 

इसकी तासीर गर्म होती है।

सेवन की मात्रा : 

निर्गुण्डी के पत्तों का रस 10 से 20 मिलीलीटर, जड़ की छालों का चूर्ण 1 से 3 ग्राम, बीज और फलों का चूर्ण 3 से 6 ग्राम तक ले सकते हैं।

निर्गुण्डी के औषधीय गुण : Nirgundi ke Gun

  • निर्गुण्डी कफवात को शान्त करती है।
  • यह दर्द को दूर करती है और बुद्धि को बढ़ाती है।
  • सूजन, घाव, बालों के रोग और हानिकारक कीटाणुओं को नष्ट करती है। 
  • यह पाचन शक्ति वर्द्धक, आम पाचन, यकृत उत्तेजक, कफ-खांसी नाशक और मूत्रवर्द्धक है। 
  • निर्गुण्डी गर्म होने के कारण माहवारी साफ लाती है।
  • इसका उपयोग कोढ़, खुजली, बुखार, कान से मवाद आना, सिर में दर्द, लिंग की कमजोरी, साइटिका, अजीर्ण, मूत्राघात (पेशाब में धातु का आना.), कमजोरी, आंखों की बीमारी तथा स्त्री के स्तनों में दूध की वृद्धि के लिए किया जाता है। 

निर्गुण्डी के फायदे और उपयोग : Nirgundi ke Fayde aur Upyog in Hindi

1. वात रोग :

  •  श्वास, खांसी और ठंड़ में वात रोग होने पर 10 ग्राम निर्गुण्डी को गोमूत्र (गाय के मूत्र.) में पीसकर खाने से लाभ होता है।
  •  10 ग्राम निर्गुण्डी और मीठा तेल मिलाकर मालिश करने से सभी तरह के वात रोग दूर हो जाते हैं।
  •  निर्गुण्डी के पत्तों को गरम करके बांधने से वादी की गांठें बैठ जाती हैं।

2. सभी रोगों के लिए : निर्गुण्डी को शिलाजीत के साथ सेवन करने से लाभ मिलता है।

3. घाव :

  •  निर्गुण्डी के पत्तों से बनाये हुए तेल को लगाने से पुराने से पुराना घाव भरने लगता है।
  •  निर्गुण्डी की जड़ और पत्तों से निकाले हुए तेल को लगाने से दुष्ट घाव, पामा, खुजली और विस्फोटक (चेचक.) आदि से उत्पन्न घाव ठीक हो जाता है।

4. बन्द गांठ : निर्गुण्डी के पत्तों को गर्म करके बन्द गांठ पर बांधने से गांठ बिखर जाती हैं।

5. टिटनेस : निर्गुण्डी का रस 3 से 5 मिलीलीटर दिन में तीन बार शहद के साथ देने से टिटनेस में लाभ मिलता है।

6. बुखार :

  •  निर्गुण्डी के 20 ग्राम पत्तों को 400 मिलीलीटर पानी में उबालें, जब 100 मिलीलीटर के लगभग शेष बचे तो इस काढ़े को उतार लें। इस काढे़ में 2 ग्राम पीपल का चूर्ण बुरककर सुबह-शाम 10-20 मिलीलीटर पिलायें। इससे जुकाम (प्रतिश्याय.), बुखार और सिर के भारीपन में लाभ होता है।
  •  निर्गुण्डी के 10 ग्राम पत्तों को 100 मिलीलीटर पानी में उबालकर सुबह-शाम पीने से लाभ होता है।
  •  14 से 28 मिलीलीटर निर्गुण्डी के पत्तों के रस को शहद के साथ दिन में 2 बार देने से लाभ मिलता है।

7. तालु (गलशुण्डी.) रोग :

  •  तालु रोग को दूर करने के लिए निर्गुण्डी की जड़ चबाने से रोग ठीक हो जाता है।
  •  तालु रोग दूर करने के लिए निर्गुण्डी और हारसिंगार की जड़ चबाने से गलशुण्डी (तालु.) रोग में लाभ मिलता है।

8. वीर्य रोग : निर्गुण्डी, सालममिश्री, तालमखाना, शतावरी और विदारीकन्द 40-40 ग्राम लेकर पीस लें। फिर इसके 20 ग्राम चूर्ण को 250 मिलीलीटर दूध में मिलाकर इलायची के साथ सुबह-शाम पीने से वीर्य में वृद्धि होती है।

9. जोड़ों के दर्द में (सन्धिवात, गठिया, आमवात, सन्धिशोथ के रोग) :

  •  निर्गुण्डी, लहसुन और सोंठ 25-25 ग्राम लेकर 1 लीटर पानी में काढ़ा बनाकर पीने से गठिया का दर्द दूर होता है।
  •  निर्गुण्डी के पत्तों से निकाला हुआ तेल हल्का गर्म करके मालिश करने तथा कपड़ा बांधने से जोड़ों का दर्द, (सन्धिवात, गठिया, आमवात, सन्धिशोथ.) में बहुत आराम मिलता है।
  •  निर्गुण्डी के पत्तों के काढ़े को 14 से 28 मिलीलीटर सुबह, दोपहर और शाम देने से लाभ मिलता है।
  •  10 से 20 मिलीलीटर सिनुआर के पत्तों का रस सुबह-शाम लेने से रोगी को लाभ मिलता है। साथ ही सिनुआर, करंज, नीम, और धतूरे के पत्तों को एक साथ पीसकर गर्म-गर्म लेप करने से भी लाभ मिलता है।

10. फोड़ा : निर्गुण्डी और करंज के पत्तों को पीसकर फोडे़ पर बांधने से फोड़ों की सूजन खत्म हो जाती है।

11. उच्च रक्तचाप (हाई ब्लड प्रेशर) : निर्गुण्डी 10 ग्राम, लहसुन 10 ग्राम और सोंठ का चूर्ण 10 ग्राम मिलाकर 400 मिलीलीटर पानी में उबालकर काढ़ा बना लें। इस काढ़े को 50-60 मिलीलीटर प्रतिदिन पीने से उच्चरक्तचाप (हाई ब्लड प्रेशर.) सामान्य होता है।

12. हाथ-पैरों की जलन : हाथ-पैरों की जलन होने पर सिनुआर (निर्गुण्डी.) के पत्तों को अच्छी तरह से पीसकर हाथ-पैरों पर लेप करने से हाथ-पैरों की जलन समाप्त होती है।

13. उरूस्तम्भ (जांघों का सुन्न होना) : निर्गुण्डी के पत्तों का काढ़ा बनाकर उसमें पीपल का चूर्ण डालकर पीने से जांघों की सुन्नता एवं हड्डियों में कफ का जमाव दूर होता है।

14. हृदय के ऊपर की झिल्ली की सूजन : निर्गुण्डी के पत्तों का रस 10 से 20 मिलीलीटर सुबह-शाम सेवन करने से हृदय के आवरण की सूजन में लाभ होता है।

15. कुष्ठ (कोढ़) : 10 ग्राम निर्गुण्डी के ताजे कोमल पत्तों को पीसकर 200 मिलीलीटर पानी में मिलाकर पीने से कुष्ठ (कोढ़.) रोग में बहुत जल्दी आराम आता है।

16. चोट, सूजन : निर्गुण्डी के पत्तों को पीसकर लेप बना लें। इस लेप को चोट या सूजन पर लेप करने से या चोट, सूजन वाले अंग पर इसकी पट्टी बांधने से दर्द में आराम मिलता है और घाव जल्दी ठीक हो जाता है।

17. अपस्मार (मिर्गी) : निर्गुण्डी के पत्तों के 5 से 10 बूंदों को दौरे के समय नाक में डालने से मिर्गी में आराम होता है।

18.) अरुंषिका (वराही) : निर्गुण्डी के काढ़े से सिर को धोना चाहिए।

19. कान के रोग : निर्गुण्डी के पत्तों के रस को शुद्ध तेल में, शहद के साथ मिलाकर 1 से 2 बूंद कान में डालने से कान के रोग में लाभ मिलता है।

20. खांसी : 12 से 24 मिलीलीटर निर्गुण्डी के पत्तों के रस को शुद्ध दूध के साथ दिन में 2 बार लेने से खांसी दूर हो जाती है।

21. घेंघा:

  •  14 से 28 मिलीलीटर निर्गुण्डी के पत्तों का रस दिन में 3 बार सेवन करें।
  •  निर्गुण्डी की जड़ों के पीसकर नाक में डालना चाहिए।

22. बच्चों के दांत निकालने के लिए :

  •  निर्गुण्डी की जड़ को बालक के गले में लटकाने से दांत जल्दी निकल जाते हैं।
  •  निर्गुण्डी (सम्भालु.) की जड़ के छोटे-छोटे टुकड़े को काले या लाल धागे में माला बनाकर बच्चे के गले में बांध दें।

23. कफज्वर (बुखार) :

  •  निर्गुण्डी के पत्तों का रस या निर्गुण्डी के पत्तों का 10 मिलीलीटर काढ़ा, 1 ग्राम पीपल के चूर्ण के साथ मिलाकर देने से कफज्वर और फेफड़ों की सूजन कम होती है।
  •  निर्गुण्डी के पत्तों के 30-40 मिलीलीटर काढ़े की एक मात्रा में लगभग आधा ग्राम कालीमिर्च का चूर्ण मिलाकर पीने से कफ के बुखार में आराम होता है।
  •  nirgundi oil benefits :निर्गुण्डी के तेल में अजवाइन और लहसुन की एक से दो कली डाल दें तथा तेल हल्का गुनगुना करके सर्दी के कारण होने वाले बुखार, न्यूमोनिया, छाती में जकड़न होने पर इस बने तेल की मालिश करने से लाभ होता है।

24. सूतिका बुखार : निर्गुण्डी का इस्तेमाल करने से सूतिका का बुखार में लाभ मिलता है तथा गर्भाशय का संकोचन होता और आंतरिक सूजन मिट जाती है।

25. सुख से प्रसव (प्रजनन) : निर्गुण्डी को पीसकर नाभि, बस्ति (नाभि के नीचे का भाग.) और योनि पर लेप करने से प्रसव आसानी से होता है।

26. सूजाक (गिनोरिया) : निर्गुण्डी के पत्तों का काढ़ा बनाकर सूजाक की पहली अवस्था में ले सकते हैं। यदि रोगी का पेशाब बन्द हो गया हो तो उसमें 20 ग्राम निर्गुण्डी के पत्तों को 400 मिलीलीटर पानी में उबाल लें। जब चौथाई काढ़ा शेष बचे तो इसे उतारकर ठंड़ा कर लें। इस काढे़ को 10-20 मिलीलीटर प्रतिदिन सुबह, दोपहर और शाम पिलाने से पेशाब आने लगता है।

27. श्लीपद (पीलपांव) : धतूरा, एरण्ड की जड़, निर्गुण्डी (सम्भालू.), पुनर्नवा, सहजन की छाल और सरसों को एक साथ मिश्रित कर लेप करने से श्लीपद में आराम मिलता है।

28. स्लिपडिस्क में : सियाटिका, स्लिपडिस्क और मांसपेशियों को झटका लगने के कारण सूजन हो तो निर्गुण्डी की छाल का 5 ग्राम चूर्ण या पत्तों के काढ़े को धीमी आग में पकाकर 20 मिलीलीटर की मात्रा में दिन में 3 बार देने से लाभ मिलता है।

29. नपुसकता : निर्गुण्डी 40 ग्राम और 40 ग्राम शुंठी को एक साथ पीस लें। इसकी 8 खुराक बना लें। रोजाना इसकी एक खुराक दूध के साथ सेवन करने से नपुसकता दूर होती है।

30. नारू (गंदा पानी पीने से होने वाला रोग) : निर्गुण्डी के पत्तों के 10-20 मिलीलीटर रस को सुबह-शाम पिलाने से और पत्तों से सेंक करने से लाभ होता है।

31. साइटिका (गृध्रसी.) :

  •  nirgundi juice benefits : साइटिका रोग में 20 ग्राम निर्गुण्डी के पत्तों को 375 मिलीलीटर पानी में मन्द आग पर पकायें तथा चौथाई पानी रह जाने पर छान लें। इस काढ़े को 2 सप्ताह तक पीने से रोगी को लाभ होता है।
  •  सिनुआर (सम्हालू, निर्गुण्डी) के पत्तों का काढ़ा रोजाना सुबह-शाम पीने से साइटिका का रोग दूर हो जाता है।

32. नाड़ी का दर्द : 100 मिलीलीटर निर्गुण्डी के रस को गाय के घी के साथ 3 दिनों तक सेवन करने से रोग में जल्द आराम मिलता है।

33. कण्ठमाला की सूजन :

  •  10 से 20 मिलीलीटर सिनुआर के पत्तों का रस सुबह और शाम पीने से कण्ठमूल ग्रंथि शोथ (गले मे सूजन.) में आराम होता है।
  •  नागदन्ती की मूलत्वक (जड़ का रस.) सुबह-शाम सिनुआर के पत्तो के रस और करंज के साथ सेवन करने से पूरा आराम मिलता है।
  •  nirgundi oil benefits : निर्गुण्डी के पत्तों का तेल बनाकर लगाने से हड्डी की लचक (हड्डी खिसक जाना.) और कण्ठमाला रोग (गले की गांठे.) मिट जाती हैं।

34. टांसिल का बढ़ना : निर्गुण्डी की जड़ चबाने से, नीम के काढ़े से कुल्ला करने से या थूहर का दूध टांसिल पर लगाने से टांसिल समाप्त हो जाती हैं।

35. अपच : निर्गुण्डी के पत्तों के 10 मिलीलीटर रस को 2 पिसी हुई कालीमिर्च और अजवायन के साथ सुबह-शाम सेवन करने से पाचन शक्ति ठीक हो जाती है और दर्द कम होकर पेट की वायु बाहर निकल जाती है।

36. मासिक-धर्म का कष्ट के साथ आना : निर्गुण्डी के बीजों के 2 ग्राम चूर्ण की फंकी सुबह-शाम लेने से मासिक-धर्म ठीक समय पर बिना किसी कष्ट के आता है।

37. यकृत (लीवर.) वृद्धि :

  •  निर्गुण्डी के पत्तों का रस 2 मिलीलीटर और गाय का पेशाब लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग मिलाकर देना चाहिए।
  •  निर्गुण्डी के पत्तों के 2 ग्राम चूर्ण को काली कुटकी व रसोत लगभग आधा ग्राम के साथ सुबह-शाम देना चाहिए।

38. सिर के रोग :

  •  निर्गुण्डी के पत्तों को पीसकर उसकी टिकिया बना लें, फिर इस टिकिया को कनपटी पर बांधने से सिर के दर्द में राहत मिलती है।
  •  निर्गुण्डी के फल के 2-4 ग्राम चूर्ण की फंकी दिन में 3 बार देने से स्नायु (नाड़ी.) और मस्तक के रोग कम होते हैं।

39. कमजोरी : निर्गुण्डी के तेल की मालिश करने से पैरों की बीमारी और कमजोरी दूर होती है।

40. कंठ (गले) का दर्द और मुख पाक (जीभ के छाले.) :

  •  निर्गुण्डी के पत्तों का काढ़ा बनाकर कुल्ला करने से लाभ होता है।
  •  निर्गुण्डी के तेल को मुंह, जीभ तथा होठों में लगायें अथवा इसके तेल को हल्के गर्म पानी में मिलाकर मुंह में थोड़ी देर रखने से लाभ पहुंचता है।
  •  गले की खराश में, गले के पक जाने पर तथा गले की सूजन होने पर हल्के गुनगुने पानी में निर्गुण्डी के तेल को मिलाकर तथा थोड़ा पिसा हुआ नमक मिलाकर कुल्ला करने से लाभ मिलता है।
  •  फटे होठों पर निर्गुण्डी के तेल को लगाने से आराम मिलता है।

41. टी.बी. (राज्यक्ष्मा.) : निर्गुण्डी के पंचांग (फल, फूल, तना, पत्ती और जड़.) का रस 12-14 मिलीलीटर को शुद्ध घी में मिलाकर दूध के साथ सुबह-शाम प्रयोग करना चाहिए।

42. लम्बी आयु के लिए : निर्गुण्डी के 1 लीटर रस को धीमी आग पर तब तक पकायें जब तक यह गुड़ की चाशनी के समान गाढ़ा न हो जाये। बाद में इस अवलेह (मिश्रण.) को 7 दिनों तक लें। इसे 3 महीने तक सेवन करने से बुढ़ापा देर से आता है और आयु लम्बी होती है। खाने में केवल दूध का ही प्रयोग कर सकते हैं। ध्यान रहे कि इस प्रयोग को करने से पहले अपने आप को दमा, खांसी, क्षय (टी.बी..), वमन (उल्टी.), विरेचन (दस्त.) आदि रोगों से बचाकर रखना जरूरी है।

43. वात रोग, कमर दर्द : 14 से 28 मिलीलीटर निर्गुण्डी के पत्तों का रस सुबह-शाम वात की बीमारी और कमर के दर्द में इस्तेमाल करें।

44. अण्डकोष की सूजन : निर्गुण्डी के पत्तों को गर्म करके बांधने से तथा पत्तों का लेप करने से अण्डकोष की सूजन, सिर दर्द, जोड़ों की सूजन और आमवात आदि रोगों में लाभ होता है।

45. शरीर से खून का निकलना : निर्गुण्डी के तेल को घाव या कटे हुए भाग पर लगा सकते हैं। यदि घाव बन जाये तो पिसी हुई हल्दी बुरककर पट्टी बांध देनी चाहिए।

46. श्वास रोग : निर्गुण्डी के पत्तों के रस को हल्की आग पर चढ़ाकर गाढ़ा कर लें। इसे 7 दिनों तक लगातार देने से खांसी, दमा और टी.बी. का रोग मिट जाता है।

47. पुनरावर्तक ज्वर :

  •  सिनुआर (निर्गुण्डी) के पत्ते और हरीतकी को गाय के पेशाब में पीसकर सुबह-शाम सेवन करने से पुनरावर्त्तक बुखार के साथ प्लीहा में होने वाली वृद्धि में लाभ होता है।
  •  सिनुआर के पत्तों का रस, कुटकी और रसौत के साथ सुबह-शाम सेवन करने से पुनरावर्तक बुखार में लाभ होता है।

48. कफ-पित्त ज्वर :

  •  निर्गुण्डी का रस या पत्तों का काढ़ा पीपल के साथ लेने से कफ के बुखार में लाभ मिलता है।
  •  निर्गुण्डी के पत्तों को गर्म करके फेफड़ों पर लगाने से फेफड़ों की सूजन कम हो जाती है।

49. चातुर्थक ज्वर (चौथे दिन आने वाला बुखार.) : निर्गुन्डी के ताजे पत्तों का रस 14 से 28 मिलीलीटर को 5-10 ग्राम शहद के साथ दिन में 3 बार देना चाहिए। इससे चातुर्थक ज्वर दूर हो जाता है।

50. जीभ की जलन और सूजन : मूसली और निर्गुण्डी के फल को मिलाकर चबाने से जीभ का दर्द, छाले और जीभ का फटना बन्द हो जाता है।

51. गर्भधारण (गर्भ ठहराने के लिए) : निर्गुण्डी 10 ग्राम लेकर लगभग 100 मिलीलीटर पानी में रात को भिगोकर रख दें। सुबह उसे उबालते हैं जब यह एक चौथाई रह जाए तो इसे उतारकर छान लें। इसके बाद इसमें 10 ग्राम पिसा हुआ गोखरू मिलाकर मासिक-धर्म खत्म होने के बाद पहले दिन से लगभग एक सप्ताह तक सेवन करते हैं। इससे स्त्री गर्भधारण के योग्य हो जाती है।

52. कान के कीड़े : निर्गुण्डी के ताजे पत्तों के रस को कान में डालने से कान के कीड़े समाप्त हो जाते हैं।

53. कान का बहना : निर्गुण्डी के तेल की 2-2 बूंदे कान में डालने से कान में से मवाद बहने के रोग से छुटकारा मिलता है।

54. पेट में पानी का भरना (जलोदर.) : सिनुआर (निर्गुण्डी.) के पत्तों का रस 10 से 20 मिलीलीटर सुबह-शाम देने से लाभ होता है। सिनुआर, करंज, नीम और धतूरे के पत्तों को पीसकर ठंड़ा-ठंड़ा पेट पर लगाने से पेट की सूजन में लाभ होता है।

55. आधासीसी (माइग्रेन) अधकपारी : काली निर्गुण्डी के ताजे पत्तों के रस को हल्का सा गर्म करके 2-2 बूंद कान में डालने से आधेसिर का दर्द खत्म हो जाता है।

निर्गुण्डी के दूसप्रभाव : nirgundi ke nuksan

निर्गुण्डी को अधिक मात्रा में सेवन करने से सिर में दर्द, जलन व किडनी पर विपरीत बुरा प्रभाव पड़ सकता है।

(अस्वीकरण : दवा, उपाय व नुस्खों को वैद्यकीय सलाहनुसार उपयोग करें)

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