बकुल (मौलसरी) के औषधीय गुण और फायदे – Bakul in Hindi

बकुल क्या है ? (What is Bakul in Hindi)

संस्कृत काव्यों में बकुल का श्रंगारी एवं उदीपक वृक्ष के रूप में वर्णन मिलता है। इन काव्यों में इसके केसर” नाम का अधिक प्रयोग हुआ। श्रृंगारी, सांस्कृतिक एवं धार्मिक परिप्रेक्ष्य में इसके पुष्पों का ही प्रधान महत्व होने से इन काव्यों में बकुल की मान्यता मुख्यतः पुष्पवृक्ष के ही रूप में है। इसके पुष्प पर्युषित होने पर भी गन्धयुक्त बने रहते हैं और प्रयोग के सर्वथा योग्य रहते हैं ।

महाकवि कालिदास ने अपनी कृति मालविकाग्निमित्र में मालविका की एक सहेली का नाम बकुलावलिका रखा है यह नाम ही उसके चरित्र का परिचायक है। जिस प्रकार बकुलपुष्प मर्दित होने या उपेक्षित होकर सूखने पर भी अपनी स्वाभविक सुरभि सम्पदा को नहीं छोड़ता, उसी प्रकार वह भी कष्टग्रस्त होने पर भी अपने स्वाभाविक गुणों को नहीं छोड़ती है।

बकुल का विभिन्न भाषाओं में नाम (Name of Bakul in Different Languages)

Bakul in –

  • संस्कृत (Sanskrit) – बकुल, मधुगन्ध, चिरपुष्प, स्थिरपुष्प (पुष्पों की सुगन्ध सूखने पर भी स्थिर रहती है), भ्रमरानन्द
  • हिन्दी (Hindi) – मौलसरी, मौलसिरी, मौलश्री
  • गुजराती (Gujarati) – बोलसरी
  • मराठी (Marathi) – बकुल
  • बंगाली (Bangali) – बकुल
  • पंजाबी (Punjabi) – मौस, बकुल
  • तामिल (Tamil) – बलगुम, केषारम
  • तेलगु (Telugu) – पगादामानु, केसारी
  • असमिया (Asamiya) – गोकुल
  • अंग्रेजी (English) – सुरीनाम मेडलकर
  • लैटिन (Latin) – मिम्युसोप्स एलेन्सी (Mim usops elengi)

बकुल का पेड़ कहां पाया या उगाया जाता है ?

बकुल का पेड़ पश्चिमी घाट के जंगलों में तथा अण्डमान द्वीप में पाया जाता है। सिलोन और ब्रह्मा में भी यह पाया जाता है। वैसे समस्त भारत में बगीचों के अन्दर, सड़कों के किनारे व घरों के बाहर इसके पेड़ लगाये जाते हैं। उत्तर प्रदेश में इसे अधिक लगाते हैं।

बकुल का पेड़ कैसा होता है ? (Description of Bakul Tree in Hindi)

  • बकुल का पेड़ – इसका वृक्ष सदाहरित सघन झोपड़ाकर 40-50 फीट तक ऊंचा होता है। काण्डत्वक (छाल) गहरे धूसर वर्ण की कुछ फटी हुई रहती है। इसके ऊपर कटे हुए छोटे-छोटे टुकड़े दिखाई देते हैं। कटी जगह पर गहरी गहरी सीतायें पड़ी रहती हैं आभ्यन्तर भाग में तन्तुसंयोग लम्बाई में होता है। काण्डसार बाहर की ओर रक्ताभ धूसर तथा भीतर की ओर गहरे लाल रंग का होता है।
  • बकुल के पत्ते – बकुल के पत्ते अण्डाकार या लटवाकार, भालाकार, चमकीले चिकने होते हैं। जो जामुन के पत्तों के समान लगते हैं। ये ढाई से चार इंच लम्बे 1-2 इंच चौड़े लम्बाग्र तथा लहरदार होते हैं। पत्रदण्ड पौन इंच लम्बा होता है।
  • बकुल के पुष्प – बकुल के फूल पीताभ, श्वेतवर्ण, सुगन्धित एक इंच व्यास के, अक्षीय, समूहबद्ध या एकल, पत्रवृन्त जितने लम्बे पुष्पदण्ड पर आते हैं। वहिर्दल 8 (4+4) अन्तर्दल प्रायः 24 व पुंकेशर 8 होते हैं। पुष्पों से अति मोहक मादक सुगन्ध आती है। भ्रमर इसकी सौरभ के पीछे पागल से रहते हैं। सूख जाने पर भी इनमें यह सुगन्ध चिरकाल तक बनी रहती है। इन पुष्पों से इत्र भी बनाया जाता है ।
  • बकुल के फल – बकुल के फल अण्डाकार, एक इंच, लम्बे, कच्ची अवस्था में हरे कषाय और क्षीरयुक्त होते हैं। ये ही पक जाने पर पीतवर्ण एवं कषायमधुर हो जाते हैं। इनमें लुआवदार गूदी से लिपटे हुए कभी-कभी दो अथवा एक बड़ा अण्डाकार भूरे रंग का चमकीला बीज होता है यह बीज खिरनी के बीज जैसा होता है। इस पर अप्रैल मई में पुष्प तथा वर्षा में फल लगते हैं।

बकुल वृक्ष का उपयोगी भाग (Beneficial Part of Bakul Tree in Hindi)

प्रयोज्य अंग – त्वक(छाल), पुष्प, फल।

बकुल वृक्ष के प्रकार :

बकुल का वृक्ष स्त्री और पुरुष संज्ञक दो जाति के होते हैं। जिस वृक्ष पर फूल फल दोनों आते हैं वह स्त्री जाति का तथा जिस पर केवल फूल आते हैं वह पुरुष जाति का बकुल होता है। स्त्री जाति की अपेक्षा पुरुष जाति के फूल कुछ बड़े और अधिक श्वेत होते हैं। स्त्री जाति के फूल कुछ लालीयुक्त होते हैं पुरुष जाति को लोक में मौलसिरा और स्त्री जाति को मौलसिरी कहते हैं।

बकुल वृक्ष के औषधीय गुण (Bakul ke Gun in Hindi)

  • रस – कषाय, कटु।
  • गुण – गुरु।
  • वीर्य – शीत
  • विपाक – कटु
  • प्रभाव – अस्थिवहस्रोतस पर इसका विशेष प्रभाव।
  • दोषकर्म – पित्तकफ शामक।
  • प्रतिनिधि – बबूल की छाल।

रासायनिक संगठन :

  • बकुल वृक्ष की छाल में 3-7 प्रतिशत टैनिन, गोंद, सैपोलिन तथा क्षाराभ होते हैं ।
  • पुष्पों में एक सुगन्धित तैल होता है।
  • बीजों में 16 से 25 प्रतिशत एक स्थिर तैल होता है जिसका व्यवहार जलाने एवं खाने में किया जाता है।

सेवन की मात्रा :

  • त्वक क्वाथ (छाल का काढा) – 50 से 100 मिली.,
  • त्वक चूर्ण – 2 से 4 ग्राम,
  • पुष्प चूर्ण – 1 से 2 ग्राम,

संग्रह एवं संरक्षण :

इसकी छाल व पुष्पों को मुखबन्द पात्रों में अनार्द्र शीतल स्थान पर रखना चाहिए।

वीर्यकालावधि – एक वर्ष

शुद्धाशुद्ध परीक्षा – इसकी छाल बाहर से खाक स्तरीरंग की तथा अन्तराल पर लाल रंग की ओर रेखांकित होती है। अन्तर्वस्तु लाल रंग की होती है। ताजी छाल तोड़ने पर खट से टूट जाती है, तथा टूटे तल पर जगह जगह सफेद बिन्दु से पाये जाते हैं।

बकुल का उपयोग (Uses of Bakul in Hindi)

  1. बकुल की कोमल शाखाओं से दातुन कर , इसकी छाल के चूर्ण से मंजन कर तथा इसकी छाल के क्वाथ से गण्डूष (कुल्ला) कर हम कई दन्तरोगों से बचे रह सकते हैं ।
  2. जो दांतों की दुर्बलता, दांतों का हिलना, दांतों की पूयमयता से आक्रान्त हो चुके हैं वे बकुल को उपयोग में लाकर इन विपदाओं को भगा सकते हैं।
  3. दन्तचाल (दांतों का ढीलापन) में बकुल के कच्चे फल भी चबाना हितकारी हैं इससे दांत मजबूत होते हैं, और उनसे रक्त, पूय आदि आना बन्द हो जाता है। इसकी बात को प्रायः सभी आचार्यों ने अपनी-अपनी भाषा में कहा है।
  4. जो द्रव्य मन को प्रसन्न किंवा आनन्दित करने वाले है उन्हें आयुर्वेद में सौमनस्यजनन कहते हैं। बकुल के पुष्प मन को प्रसन्न करने के कारण सौमनस्य जनन हैं जिसका वर्णन पूर्व में किया जा चुका है।
  5. इसके फल एवं छाल ग्राही होने से अतिसार, प्रवाहिका में उपयोगी है। फल पथ्य रूप में सेवन किये जाते हैं तो छाल का क्वाथ बनाकर उपयोग में लाया जाता है।
  6. कृमिघ्न होने से छाल को कृमिरोग में भी उपयोगी कहा गया है।
  7. इसी प्रकार बकुल के पुष्प हृद्य होने से हृदयरोगी के लिए लाभदायक है ।
  8. बकुल की छाल व फल रक्तस्तम्भन होने से रक्तस्रावों में हितकारी है। रक्तप्रदर, श्वेतप्रदर और शुक्रमेह में भी यह हितावह है क्योंकि इसकी छाल गर्भाशय की शिथिलता, शोथ एवं योनिस्राव को दूर करती है।
  9. बकुल के फल शुक्र स्तम्भन भी हैं
  10. बकुल की छाल ज्वरघ्न होने से ज्वर में तथा विषघ्न होने से विषों में लाभप्रद है।
  11. फल स्निग्ध मधुर होने से पौष्टिक है अतः यह दौर्बल्य को दूर करने वाले हैं।
  12. वस्तिशोथ (मूत्राशय की सूजन) एवं पूयमेह में भी इसकी छाल उपादेय है।
  13. बकुल के शुष्क पुष्पों के चूर्ण का नस्य शिरःशूल को समाप्त करता है।

यूनानी मत –

  1. यूनानी मतानुसार इसके पुष्प गरम और खुश्क (रुक्ष) तथा फल तथा छाल शीत और खुश्क है।
  2. इसकी जड़ कुछ मीठी,खट्टी, कामोद्दीपक, मूत्रल आंतों का संकोचन करने वाली और सुजाक में लाभदायक है।
  3. इसकी छाल के काढ़े से कुल्ले करने से दांतों के मसूढों के रोग दूर होते हैं।
  4. इसके फल कफनिस्सारक और पित्त विकार, यकृत की शिकायतों, नाक की बीमारियों और मस्तकशूल में लाभदायक है।
  5. इनका धूम्रपान करने से दमे में लाभ होता है।
  6. इसके फल और इसके बीज खट्टे, मीठे, कामोद्दीपक, मूत्रल, आंतों का संकोचन करने वाले और सुजाक में लाभदायक होते हैं।
  7. इसके फूलों का स्वरस शिर की पीड़ा को मिटाने वाला है।
  8. इसकी छाल का स्वरस का नस्य मस्तिष्क के लिए बलदायक और प्रसन्नता जनक है।

रोगोपचार में बकुल के फायदे (Benefits of Bakul in Hindi)

1) दन्तरोग की उपयोगी औषधि बकुल

  • बकुल की छाल 5 ग्राम, + खड़िया मिट्टी 5 ग्राम + सेंधानमक 1 ग्राम को पीस इसमें कुछ लवंग तैल की बूंद मिलाकर मंजन करने से दन्तशूल मिटकर दांत साफ होते हैं।
  • बक्कुल छाल 5 ग्राम + सुहागे का फूला + फिटकरी का फूला + समुद्रफेन के चूर्ण का मंजन करने से दन्तशूल मिटता है। इसमें 2-3 बूंद अमृतधारा की मिला दें।
  • बकुल छाल , माजूफल, चिकनी सुपारी, कत्था जनकपुरी समान भाग लेकर मंजन तैयार कर उपयोग में लाने से दांत मजबूत होते हैं।
  • बकुल छाल, सुहागा, बायविडंग और सेंधा नमक मिलाकर मंजन करने से दांतों के कीड़े नष्ट होकर दांत स्वच्छ और मजबूत होते हैं।
  • बकुल छाल 5 ग्राम, अकरकरा 2 ग्राम, गोल मिरच एक ग्राम का मंजन करने से दांतों की अनेक शिकायतें मिटकर लाभ होता है।
  • बकुल छाल, सोंठ, मिर्च, लौंग, नेपाली धनियां, भुना हुआ त्रिफला समान मात्रा में लेकर चूर्ण बनालें और मंजन करें इससे दांतों के समस्त रोग दूर होकर दांत मजबूत होते हैं।
  • बकुल छाल, शीतलचीनी 10-10 ग्राम, सफेद कत्था, माजूफल, 5-5 ग्राम, लवंग छोटी इलायची के दाने 3-3 ग्राम, कपूर 2 ग्राम मिलाकर मंजन करने से दांतों के विविध कष्ट मिटते हैं।
  • बकुल छाल, जामुन की छाल के क्वाथ से कुल्ले करने से समूढ़े मजबूत होकर दांत दृढ़ होते हैं।
  • बकुल छाल को अपामार्ग की संजरी के रस में मिलाकर दांतों पर मलने से दांत मजबूत होते हैं। 10. बकुल छाल, फुलाया हुआ सुहागा और मिश्री के बारीक चूर्ण से मंजन करने से दांत दृढ़ होते हैं।
  • बकुल छाल 10 ग्राम, एक कच्चा मांजूफल, एक जलाया हुआ माजूफल औ एक जली हुई सुपारी को पीस मंजन करने से मसूड़े मजबूत होते हैं और दांतों से खून आना बन्द होता है।
  • बकुल छाल, सफेद कत्था, हरड़ को समान ले सूक्ष्म चूर्ण बना मंजन करने से भी दन्तरोग मिटकर मजबूत होते हैं।
  • बकुल छाल, नागरमोथा, जटामांसी, त्रिकटु पांचों लवण पीस मंजन बनाकर उपयोग में लाना भी इस हेतु लाभप्रद है।
  • बकुल छाल, मेंहदी के पत्ते, बड़ की छाल और लोध्र का क्वाथ बनाकर कुल्ले करने से मसूड़ों का ढीलापन मिटता है।
  • बकुल छाल 125 ग्राम, हल्दी 12 ग्राम, नागरमोथा 12 ग्राम, अकरकरा 25 ग्राम, फिटकरी फूली हुई 25 ग्राम, कपूर 10 ग्राम मंजन बनाकर उपयोग में लाने से दांत मजबूत एवं साफ होते हैं।

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2) सरदर्द (शिरःशूल) में बकुल के लाभ

सूखे फलों का चूर्ण बनाकर उसका नाक में नस्य लेने से शिरःशूल शांत होता है। शुष्क पुष्पों के चूर्ण का नस्य भी शिरःशूल को मिटाता है।

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3) व्रण (घाव) ठीक करे बकुल

  • छाल का क्वाथ बनाकर ब्रणों को धोने से शोधन रोपण होता है।
  • फूल, फल, छाल को सुखाकर उसका खूब बारीक चूर्ण बनाकर वैसलीन या पुराने घी में मिलाकर मरहम बना लें, दक्षिण भारत में कोंकण प्रान्त के लोग इस मलहम का अधिक उपयोग करते हैं।

4) मुख रोग की लाभदायक औषधि है बकुल

  • बकुल छाल का क्वाथ बनाकर इस क्वाथ से गण्डूष (कुल्ला) करने से मुखपाक (मुँह में छोटे छोटे घाव) , कण्ठ रोग दूर होते हैं।
  • बकुल, आंवला और खैर इन तीनों वृक्षों की छाल का क्वाथ बनाकर इस काढ़े से दिन में 10-20 कुल्ले करने से मुंह के छाले, मसूढ़ों की सूजन और अन्य मुख रोग नष्ट होते हैं तथा दांत बहुत मजबूत हो जाते हैं।

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5) हृदय रोग में फायदेमंद बकुल

  • बकुल पुष्पों को सूंघना तथा इन पुष्पों से बनी माला को धारण करना हृदय रोगी के लिए हितकारी है।
  • बकुल की छाल का क्वाथ, हृदयरोग, ज्वर, कृमि एवं विषरोग आदि में लाभप्रद है।

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6) श्वित्र (सफेद दाग) में बकुल का उपयोग

इसकी छाल को गोमूत्र में पीसकर लेप करने से श्वेत कुष्ट में आराम होता है।

7) प्रदर रोग में बकुल के औषधीय गुण फायदेमंद

बकुल के ताजा फल या पुष्प 15 ग्राम बादाम का मगज तीन दाने और 3 ग्राम मिश्री इन तीनों चीजों को मिलाकर सुबह-शाम दोनों समय लेने से और ऊपर ठण्डा पानी पीने से प्रदर में लाभ होता है। जिस व्यक्ति के दांत हिलने लग गये हों उन्हें यह योग देने से उसके दांत मजबूत होते हैं।

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8) रक्तमेह की औषधि है बकुल

छाल का क्वाथ पीने से पेशाब में जाता हुआ रक्त बन्द हो जाता है। बकुल की छाल का हिम बनाकर पीने से मूत्राशय के बहुत से रोगों में लाभ होता है।

9) अतिसार (दस्त) में लाभकारी है बकुल का प्रयोग

  • छाल का क्वाथ अतिसार में लाभप्रद है।
  • बीजों को ठंडे पानी में पीसकर देना भी अतिसार में हितकारी है।
  • पके हुये फल का गूदा पुराने अतिसार में उपयोगी है।
  • फलों की मिंगी का तैल 20-40 बूंद की मात्रा में दो या तीन दिनों तक प्रयोग में लाने से आंव के दस्त बन्द हो जाते हैं।
  • रक्तातिसार एवं रक्तमूल जीर्ण प्रवाहिका में इसके फल खाने चाहिए।

10) खांसी (कास) दूर करने में बकुल फायदेमंद

बकुल के ताजा फूल 25 ग्राम को पानी में भिगोकर रातभर रखना चाहिये। सुबह उस पानी को छानकर पिला देने से बालकों की खांसी मिट जाती है। यह प्रयोग 5-7 दिनों तक सेवन कराना चाहिये।

( और पढ़े – कैसी भी खांसी और कफ हो दूर करेंगे यह रामबाण उपाय )

11) कमजोरी (दौर्बल्य) दूर करने में बकुल करता है मदद

बकुल के फल दुर्बलता को दूर करते हैं।

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12) कृमिरोग मिटाता है बकुल

बकुल के पत्तों को चबाकर खाना कृमिरोग में हितकारी है।

बकुल के अन्य लाभदायक अनुभूत प्रयोग :

1) दन्तरोगहर मंजन- बकुल का छिलका 50 ग्राम, रूमीमस्तंगी 50 ग्राम, संगजराहत भस्म 50 ग्राम, अकरकरा 12 ग्राम, छोटी इलायची बीज 6 ग्राम, कत्था सफेद 25 ग्राम, सबको पीसकर कपड़छानकर शीशी में रख लें, इस मंजन के नियमित करने से दातों के समस्त विकार दूर होते हैं। – श्री प्रतापमल गाविन्दराम (अपना इलाज खुद करो)

2) पायोरियाहर मंजन – छाल बकुल, छाल नीम, छाल कीकर, सेलखड़ी सभी 100-100 ग्राम । संगजराहत भस्म 20 ग्राम, फिलफिल स्याह 20 ग्राम, रुमीमस्तंगी 20 ग्राम, गेरु 30 ग्राम, कपूर 10 ग्राम । सबको पीसकर सूक्ष्म चूर्ण बनालें। यह मंजन पायोरिया के लिए बहुत उपयोगी है। – कविराज श्री पी.एस. द्विवेदी

3) पायोरियाहर दन्तमंजन – बकुल की छाल, अनार के फूल की कलिया सूखी हुई, बबूल की छाल, अखरोट की छाल, फिटकरी सफेद भुनी हुई, दालचीनी, लौग सभी दवाओं को समान मात्रा में लेकर अलग-अलग कूट पीसकर कपड़छन करके मिलालें।

इसे प्रतिदिन मंजन के रूप में प्रयोग करें। इसके सेवन से जहां दांत मोतियों की तरह चमकने लगते हैं, वहीं पायोरिया का नाम निशान भी नहीं रहता। – स्वामी श्री जगदीश्वरानन्द सरस्वती (चमत्कारी औषधियां)

4) अर्श में बकुल का उपयोग – बकुल के गिनकर 21 बीज ला उनके अन्दर की गिरी निकाल लें, कालीमिर्च ग्यारह अदद लाकर दोनों को एकत्र कर चूर्ण कर लें। ऐसी एक मात्रा प्रातः काल नित्य कर्म के अननन्तर जल के अनुपान से फांक लें। यह दवा लेने के पूर्व कुछ भी खाना, पीना न चाहिये औषधि सेवन के पश्चात 6 घंटे तक रोगी को बैठाना नहीं चाहिये। वह खड़ा रहे अथवा चलता रहे परन्तु किसी भी रूप में बैठना नहीं चाहिये।

घंटे घंटे से एक मौसमी चूस लें। अधिक भी ली जाये तो कोई क्षति नहीं। छ : घंटे के बाद, रोगी मुक्त है। उसे मूंग की दाल की खिचड़ी चौलाई की भांजी का सूप, अथवा घिया जैसा हल्का शाक, अनम्ल छाछ आदि लघु अन्नपान दें सायंकाल से नित्य का आहार ले सकते हैं। यह मुष्टियोग केवल एक दिन और एक बार ही करने से बहुतों को अर्श की व्याधि से मुक्त हुआ देखा है। – वैद्य श्री नवीन भाई ओझा

बकुल से निर्मित आयुर्वेदिक दवा (कल्प) :

1) बकुलकान्ति मंजन –

बकुल के फल 80 ग्राम, फूल कत्था 20, इलायची के दाने 10 ग्राम को लेकर कपड़छन कर लें,

लाभ – इसका मंजन करने से दांत अत्यन्त दृढ़ एवं चमकीले होते हैं। – सि.भै. म. मा.

2) बकुलाद्य तैल –

मौलसिरी के फल, लोध्र पठानी, बज्रबल्ली (हाड़जोड़), नील झिण्टीमूल, अमलतास की छाल, बबूल की छाल, शालवृक्ष की छाल, इरिमेद (दुर्गन्ध खैर) और असनकाष्ठ समान-समान 4 किलो लेकर इन्हें 32 लीटर जल में पकावें इसे पकाकर 8 लीटर शेष रखें दो लीटर तिल तैल लेकर उक्त औषधियों का 500 ग्राम कल्क मिलाकर तैल पाक विधि से तैल शोधन करें।

लाभ – इस तैल को रुई की फुरेरी से रात्रि के समय लगावें। पायोरिया को नष्ट करने में यह अद्वितीय योग है। यह हिलते दांतों को जमाने वाला योग है। दन्तवेष्ट (पायोरिया) दन्तपुप्पुट आदि रोगों की उग्र अवस्था में 50 मिली. यह तैल लेकर उसमें गरम करने के पश्चात ठण्डा हुआ सरसों का तेल 350 मिली. मिलाकर प्रातः काल गण्डूष धारण करें। इसके कुछ देर बाद मौलसिरी की छाल एवं बबूल का क्वाथ बनाकर उसमें थोड़ी शुभ्रा डालकर कुल्ले करें। पथ्य पेय रूप में ही सेवन करें। यह दन्तरोगी के लिए उत्तम उपाय निर्दिष्ट किया है। – भै. र.

3) बकुल अर्क –

बकुल के एक किलो 125 ग्राम पुष्पों को दस लीटर पानी में भिगो दें, प्रात: नाडिकायंत्र से यथाविधि दस बोतल अर्क खींच लें। यह अर्क उत्तेजक एवं सुगन्धित होता है।

लाभ – यह हृद्य एवं प्रदरहर है।

4) बकुल पानक (शर्बत) –

बकुल पुष्प 50 ग्राम वाष्प जल 1.5 लीटर, मिश्री एक किलो 500 ग्राम। पुष्प की पंखुरियों को 12 घंटे जल में भिगोकर फूलने दें। इन्हें महीन वस्त्र से छानकर मृदु आंच पर चढ़ाकर गर्म करें कुछ देर बाद मिश्री डालकर शर्बत बना लें।

लाभ – यह पथरी एवं मूत्र विकार में हितकारी है।

बकुल के दुष्प्रभाव (Bakul ke Nuksan in Hindi)

  • बकुल लेने से पहले अपने चिकित्सक से परामर्श करें ।
  • बकुल को डॉक्टर की सलाह अनुसार ,सटीक खुराक के रूप में समय की सीमित अवधि के लिए लें।
  • बकुल का अत्यधिक सेवन पेट फूलने और कब्जियत जैसी समस्या उत्पन्न कर सकता है ।

निवारण – मधु एवं स्नेह।

(अस्वीकरण : दवा ,उपाय व नुस्खों को वैद्यकीय सलाहनुसार उपयोग करें)

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