Premi Bhakt By Gita Press
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प्रेमी भक्त के लेखक हस्ताक्षरपाल पौर हैं, जिन्होंने अपनी पहचान नोतनमैस, गोरखपुर के रूप में दी है। पुस्तक के मुद्रण-पृष्ठ के अनुसार इसका मुद्रक और प्रकाशक घनश्यामदास जालान, गीताप्रेस, गोरखपुर है। इस प्रति में प्रेमी भक्त नाम से अंकित शीर्षक पृष्ठ मिलता है, जो इस पुस्तक की मूल पहचान है।
लेखक ने निवेदन में स्वयं बताया है कि यह पुस्तक भक्तचरितमाला का आठवाँ भूषण है और इसमें दी गई सभी कथाएँ अद्भुत प्रेम और आनन्दस भरी हैं। पुस्तक में दो सूचियाँ हैं। निबन्ध-सूची में भक्त ब्रह्मभट्ट, भक्त जयदेव, श्रीरूप-सनातन, यवन हरिदास भक्त और भक्त रघुनाथदास जैसे विषयों पर लेख दिए गए हैं, जबकि चिन्तन-सूची में भक्त जयदेव का गीतगोविन्ददर्शन, भक्त ब्रह्मभट्ट, भक्त जयदेव परासर और भावानन, श्रीचैतन्य का प्रेमानुदय, श्रीसनातन और चैतन्य, तथा यवन हरिदास पर विचार प्रस्तुत किए गए हैं।
लेखक ने यह भी बताया है कि ये कथाएँ बंगला ग्रन्थों के आधार पर लिखी गई हैं, और यह कि वे किसी बड़े कथाकार की रचना मानी नहीं जा सकतीं।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
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- भक्तों की कथाएँ तथा प्रसंग
- प्रेम-भक्ति का महत्व
- प्रेरक प्रसंग
- जीवन-शिक्षा
पुस्तक की मुख्य बातें
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