जाति, संस्कृति और समाजवाद – Jati Sanskriti Or Samajavad
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शीर्षक-पृष्ठ पर पुस्तक का नाम जाति, संस्कृति और समाजवाद अंकित है और लेखक के रूप में स्वामी विवेकानन्द का नाम स्पष्ट रूप से छपा है। शीर्षभूमि में श्रीमद्विग्विजय बाह्य और श्रीमद्राज शर्मा का नाम दिया गया है तथा मद्रास प्रेस, चेन्नै का उल्लेख मिलता है। यह भाग एक है। प्रकाशन स्वामी भानेन्द्रनाथ सेवा संस्थान, अलवर के माध्यम से श्रीरामभूमि अश्रम, गणगौर, वाराणसी से हुआ है। प्राक्कथन में स्वामी दयानन्द सरस्वती, जैन दर्शन, सनातन धर्म तथा जाति-पांति संबंधी विवादों का विस्तृत उल्लेख मिलता है।
पुस्तक का मूल प्रश्न यही है कि समाज में जाति और पांति का आधार क्या होना चाहिए। लेखक ने दर्शाया है कि श्रम और योग्यता के आधार पर बनी व्यवस्था कैसे बेहतर हो सकती है और पहले की सामाजिक बंधनों के स्थान पर क्या आ सकता है। साथ ही यह भी बताया गया है कि धर्म और सम्प्रदायों की अलग-अलग पहचान क्यों होती है और इससे समाज में सामंती किस प्रकार उत्पन्न होता है। पाठ में पुराने शास्त्रों और समकालीन समाज-शास्त्र दोनों से उद्धरण मिलते हैं, जिससे विषय अध्ययन के लिए सामग्री उपयोगी बनती है।
यह पुस्तक उन पाठकों के लिए उपयोगी है जो समाजशास्त्र, धर्मनीति और भारतीय इतिहास के बीच संबंध समझना चाहते हैं। सवाल उठाने वाला साहित्य होने के कारण इसे केवल अपनाने या अस्वीकार करने के लिए नहीं बल्कि तर्क और साक्ष्य के आधार पर पढ़ना उचित है। राजनीतिक या सामाजिक निर्णय लेने से पहले इन विचारों को समझ लेना और स्वयं सोचने की जगह मिलाना आवश्यक है।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
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- जाति तथा समाज पर विचार
- संस्कृति तथा समाजवाद
- स्वामी जी की दृष्टि
- प्रेरक व्याख्या
पुस्तक की मुख्य बातें
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